ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।यह वैसा हादसा है जो पूरे देश को ठहरा देता है और उसकी नज़र उन लोगों की ओर मोड़ देता है जो देश को बनाते हैं। सोमवार दोपहर दक्षिण सिक्किम के समरडुंग में तीस्ता चरण-6 पनबिजली परियोजना की निर्माणाधीन सुरंग का मुंह एक भूस्खलन ने बंद कर दिया, जिससे भीतर मज़दूर फंस गए और एक संदिग्ध गैस रिसाव ने बचाव को और भी ख़तरनाक बना दिया। मंगलवार और बुधवार को एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, पुलिस और अग्निशमन दल पारियों में जुटे रहे — पूरी संवेदना के साथ शव निकाले और जीवित लोगों को बाहर लाए।
इंसानी क़ीमत भारी रही है। बुधवार तक कम से कम एक दर्जन मज़दूरों की मौत की पुष्टि हुई है, फंसे हुए बाक़ी लोगों को बाहर निकाला जा रहा है और अंतिम संख्या अभी तय की जा रही है — और यह सावधानी हम जानबूझकर बरत रहे हैं, क्योंकि एक मज़दूर की जान सही आंकड़े की हक़दार है, जल्दबाज़ी वाले आंकड़े की नहीं। मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तमांग ने हर मृतक परिवार के लिए 4 लाख रुपये और घायलों के लिए 50 हज़ार रुपये की अनुग्रह राशि की घोषणा की; प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय राहत कोष से 2 लाख रुपये और 50 हज़ार रुपये और जोड़े। इन आंकड़ों के पीछे पहाड़ी गांवों और दूर के राज्यों में ख़बर का इंतज़ार करते परिवार हैं।
कठिन भूगोल में निर्माण: तीस्ता-6 की जिस सुरंग में सोमवार के भूस्खलन ने मज़दूरों को फंसाया, वह दक्षिण सिक्किम के खड़े और भूगर्भीय रूप से नाज़ुक इलाक़े में है — जहां बचावकर्मियों को अंदर पहुंचने के लिए संदिग्ध गैस से जूझना पड़ा।
किसी देश की परख इससे नहीं कि वह क्या बनाता है, बल्कि इससे भी है कि बनाने वाले हाथों की रक्षा वह कितनी मज़बूती से करता है। इस दुख की असली नाप वही सुरक्षा है जो इसके बाद आए।
एक नज़र में
• घटना: सोमवार को भूस्खलन ने तीस्ता चरण-6 की सुरंग (समरडुंग, सिक्किम) का मुंह बंद किया
• ख़तरा: संदिग्ध गैस ने फंसे मज़दूरों और बचावकर्मियों दोनों को जोखिम में डाला
• क्षति: बुधवार तक कम से कम एक दर्जन की मौत की पुष्टि; अंतिम संख्या तय हो रही है
• राहत: हर मृतक परिवार को 4 लाख (राज्य) + 2 लाख (केंद्र); घायलों को 50 हज़ार
तुरंत का काम है संवेदना, पर कुशलता के साथ: बचाव पूरा करना, घायलों का इलाज, परिवारों को शोक की काग़ज़ी कार्यवाही में सहारा, और देश को यह ईमानदार व पुष्ट हिसाब देना कि सुरंग के भीतर हुआ क्या। बचाव दलों को सच्चा श्रेय मिलना चाहिए — बारिश में गैस भरी सुरंग में उतरकर अनजान लोगों को घर लौटाना ख़ामोश वीरता है, और इसे नाम से पुकारा जाना चाहिए। बिना शोर के, तेज़ी से पहुंचाई गई देखभाल ही वह पहला कर्तव्य है जो राज्य उन मज़दूरों को देता है जो उसके ढांचे पर अपनी जान लगाते हैं।
बड़ा और सकारात्मक सबक इस ओर इशारा करता है कि भारत अपने युवा, चंचल पहाड़ों में सुरंग कैसे खोदे। हिमालय धरती के सबसे नाज़ुक भूभागों में है, और वहां हर पनबिजली और सड़क परियोजना अस्थिर चट्टान, भूकंपीय दबाव और तीखे होते मानसून के साथ एक समझौता है। आगे का रास्ता निर्माण रोकना नहीं — इस इलाक़े को बिजली, सड़कें और रोज़गार चाहिए — बल्कि ज़्यादा सुरक्षित निर्माण है: लगातार भूगर्भीय और गैस निगरानी, बनाए गए बचाव-मार्ग और शरण-कक्ष, अभ्यास की गई आपात मॉक-ड्रिल, और सचमुच अधिकार वाले स्वतंत्र सुरक्षा ऑडिट। भारत के पास अपनी पहाड़ी परियोजनाओं को दुनिया की मिसाल बनाने की इंजीनियरिंग प्रतिभा है। इस शोक को उस मानक में बदलना ही इन मज़दूरों की सबसे सच्ची श्रद्धांजलि है।












