ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।भारत और अमेरिका एक द्विपक्षीय व्यापार समझौते के पहले चरण के बेहद करीब हैं — और एक कैलेंडर से होड़ में भी। बातचीत करने वाले कानूनी मसौदे के “आख़िरी 1%” पर बताए जा रहे हैं, जबकि अमेरिका की एक अस्थायी टैरिफ व्यवस्था — सामान्य दरों के ऊपर 10% का अतिरिक्त शुल्क — 24 जुलाई को ख़त्म होने वाली है। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल शुरू से एक ही बात कहते रहे हैं: भारत किसी समयसीमा के दबाव में सौदा नहीं करता, हालांकि सही शर्तों पर जल्दी समझौता उसे मंज़ूर है। फ़ासला अब छोटा है, पर वह उन्हीं सवालों पर टिका है जो निर्यातकों के लिए सबसे अहम हैं।
पहला चरण उन्हीं चीज़ों के शुल्क तय करेगा जो भारत के निर्यात को रफ़्तार देती हैं — कपड़ा और गारमेंट, इंजीनियरिंग सामान, रत्न-आभूषण, दवाइयां और इलेक्ट्रॉनिक्स — और ख़बरों के मुताबिक बातचीत बाज़ार-पहुंच, डिजिटल व्यापार और गैर-शुल्क अड़चनों तक फैली है। भारत की असली माँग सिर्फ़ समझौता नहीं, बल्कि प्रतिस्पर्धी शर्तें हैं: कम से कम उतनी अच्छी, जितनी वियतनाम जैसे प्रतिद्वंद्वी एशियाई निर्यातकों को मिलें, ताकि भारतीय सामान अमेरिकी बाज़ार में किसी नुकसान के साथ न पहुंचे। यही उस आख़िरी अड़ियल एक फ़ीसदी के पीछे की असल बात है।
समय से ज़्यादा शर्तें अहम: 24 जुलाई को 10% अतिरिक्त अमेरिकी टैरिफ की खिड़की बंद होते हुए, भारत कपड़ा, इंजीनियरिंग, रत्न, दवा और इलेक्ट्रॉनिक्स पर टिकाऊ, प्रतिस्पर्धी पहुंच के लिए डटा है।
व्यापार वार्ता में आख़िरी एक फ़ीसदी सबसे कठिन होता है — असली पैसा वहीं छिपा होता है। जल्दी करने से ज़्यादा कीमती है उसे सही करना।
एक नज़र में
• चरण: पहले चरण का समझौता कानूनी मसौदे के “आख़िरी 1%” पर
• समयसीमा: अस्थायी अमेरिकी टैरिफ (सामान्य दर पर 10% अतिरिक्त) 24 जुलाई को ख़त्म
• माँग: प्रतिद्वंद्वी एशियाई निर्यातकों जितनी अच्छी शर्तें
• सहारा: हाल में लागू भारत–ब्रिटेन समझौता और यूरोप/खाड़ी की कतार
भारत इस बार असामान्य रूप से मज़बूत स्थिति से बातचीत कर रहा है, और यही असली बात है। यह एक तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था है, जिसके पास अब कई विकल्प हैं: भारत–ब्रिटेन मुक्त व्यापार समझौता इसी महीने लागू हुआ है, और यूरोपीय संघ तथा दूसरों के साथ बातचीत आगे बढ़ रही है। भारत जितने बाज़ारों में तरजीही शर्तों पर बेच सकता है, उतना ही कोई एक समयसीमा नतीजा तय नहीं कर पाती — और उतना ही वह ऐसी शर्तों पर ज़ोर दे सकता है जो पहुंच सचमुच बढ़ाएं, न कि सिर्फ़ सुर्खी बनें।
सीधी बात यह है कि यहां धीरज देरी नहीं, ताक़त का एक रूप है। आगे का रास्ता ऐसी शर्तों पर समझौता करना है जो टैरिफ की दीवार को टिकाऊ ढंग से घटाएं, और फिर उस पहुंच को प्रतिस्पर्धी लॉजिस्टिक्स, गुणवत्ता-प्रमाणन और व्यापार-वित्त के ज़रिए असली ऑर्डर में बदलना, ताकि छोटे निर्यातक भी उसका इस्तेमाल कर सकें। मसौदा इसी हफ्ते तय हो या थोड़ी देर बाद, भारत ने जो विविध समझौतों की कतार खड़ी की है, उसका मतलब है कि यह कहानी अपनी शर्तें चुनते एक देश की है — किसी घड़ी को घबराकर देखते देश की नहीं।












