इलेक्ट्रिक गाड़ियों की तरफ भारत का रुख अब उस मुकाम पर पहुंच गया है जो कुछ साल पहले तक दूर लगता था। जून में बिकी हर तरह की गाड़ियों में इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) का हिस्सा रिकॉर्ड 12.5% रहा, और बिक्री अब तक के सबसे ऊंचे स्तर करीब 3.06 लाख गाड़ियों तक पहुंच गई — यानी पिछले साल से 63% ज्यादा। डीलरों की संस्था फाडा (FADA) के मुताबिक, यह पहली बार हुआ कि शोरूम से निकली हर 8 में से 1 से ज्यादा गाड़ी बिजली से चलने वाली थी।
बढ़त सिर्फ किसी एक तरह की गाड़ी तक सीमित नहीं है। बाज़ार की रीढ़ इलेक्ट्रिक दोपहिया 75% बढ़कर करीब 1.94 लाख हो गए; इलेक्ट्रिक कारें दोगुनी से ज्यादा होकर 31,823 पर पहुंच गईं, जिनमें सबसे बड़ा हिस्सा टाटा मोटर्स का रहा; और इलेक्ट्रिक कमर्शियल गाड़ियां भी तेज़ी से बढ़ीं। पूरा ऑटो बाज़ार भी मजबूत रहा — कुल बिक्री 21.8% बढ़कर 25.6 लाख गाड़ियों पर पहुंची, जो इंडस्ट्री के इतिहास का सबसे अच्छा जून है।
बदलाव किसी चमक-दमक वाले शो से नहीं आना था। वह एक आम महीने में आना था, जब हर आठ में से एक खरीदार ने बस चुपचाप प्लग लगाना चुन लिया।
इस रफ्तार को बनाए रखना आसान नहीं। बड़े शहरों से बाहर चार्जिंग की सुविधा अब भी कम है, खरीदार गाड़ी की रीसेल कीमत और बैटरी की उम्र को लेकर सोचते हैं, और यह बदलाव उन छोटे शहरों तक भी पहुंचना चाहिए जहां रोज़ का काम दोपहिया से चलता है। लेकिन रास्ता साफ दिख रहा है — जगह-जगह चार्जिंग पॉइंट, पहली बार ईवी खरीदने वालों के लिए आसान लोन, और देश में ही बनने वाली बैटरी और पुर्ज़े, जो आयात की जगह भारत की कमाई बनें।
असली समझदारी हर रिकॉर्ड महीने को आखिरी शिखर नहीं, बल्कि अगली छलांग की सीढ़ी मानने में है। हर नया चार्जिंग पॉइंट, देश में बनी हर बैटरी और ट्रेनिंग पाया हर मैकेनिक अगली लहर के खरीदारों के लिए रास्ता चौड़ा करता है। भारत की ईवी कहानी अब यह साबित करने से आगे बढ़ चुकी है कि मांग है या नहीं — अब बात चार्जिंग, सप्लाई और हुनर का वह ढांचा बनाने की है, जो पहिये चुपचाप और साफ-सुथरे ढंग से घुमाता रहे।












