आखिरकार बाज़ार ने खुद को संभाल लिया। तेल की टेंशन में उतार-चढ़ाव भरे पूरे हफ्ते के बाद बुधवार को सेंसेक्स 130.49 अंक चढ़कर 77,185.43 पर और निफ्टी 50 26.45 अंक बढ़कर 24,078.50 पर बंद हुआ। भले बढ़त छोटी रही और सुबह की तेज़ी बाज़ार ने काफी हद तक गंवा दी, लेकिन दिशा सही रही। बैंक, कैपिटल गुड्स, कंज्यूमर ड्यूरेबल और तेल-गैस शेयरों की खरीदारी ने मेटल, आईटी और एफएमसीजी की कमज़ोरी को ढंक दिया।
पूरे खेल के पीछे वजह वही रही — कच्चा तेल। ईरान पर ताज़ा हमलों और होर्मुज के पास फिर से नौसैनिक घेराबंदी के बाद ब्रेंट क्रूड लगातार तीसरे दिन 85 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर टिका रहा। यही तंग रास्ता दुनिया का करीब पांचवां हिस्सा तेल और गैस ढोता है। इसी दबाव में रुपया डॉलर के मुकाबले एक महीने के सबसे निचले स्तर पर आ गया, हालांकि रिज़र्व बैंक ने बीच में दखल देकर गिरावट थाम ली।
जो बाज़ार तेल के असली झटके पर, अपनी तेज़ी गंवाकर भी, हरे निशान में बंद हो — वह अपना काम कर रहा है। नींव नीचे है, तेल ऊपर।
ऊपर की टेंशन के नीचे घर की कहानी अपनी रफ्तार से चलती रही। भारत–ब्रिटेन समझौता लागू हुआ, एक बड़ा म्यूचुअल फंड IPO दूसरे दिन भी जमकर पैसा खींच रहा है, और जून तिमाही के नतीजों का सिलसिला तेज़ हो रहा है। हर बात यही याद दिलाती है कि दूर की कोई जलसंधि सुर्खियों में भले छाई रहे, भारत की दिशा वह तय नहीं करती। नज़र बस कच्चे तेल पर रखिए — लंबा उछाल महंगाई बढ़ाएगा, और टेंशन घटते ही माहौल तेज़ी से सुधर जाएगा।
सीधी बात यह है कि विदेश की किसी घटना से आया एक कमज़ोर हफ्ता भारत की बुनियाद नहीं बदल देता — तेज़ ग्रोथ, काबू में महंगाई, रिकॉर्ड निर्यात और घर के निवेशकों का बढ़ता भरोसा कायम है। ऐसे दिन एक खुली, तेल खरीदने वाली इकॉनमी की आम बात हैं; और इनका जवाब है — सब्र, अच्छे शेयर और घरेलू निवेशकों की मजबूत पकड़।














