ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।सोमवार के दो बड़े आँकड़ों को साथ पढ़िए तो एक रणनीति उभरती है। एक ओर, एक दूर की जलसंधि एक ही दोपहर में बैरल पर कुछ डॉलर जोड़कर सीधे भारतीय घर के बजट तक पहुँच जाती है। दूसरी ओर, जून में देश के नए वाहनों का रिकॉर्ड हिस्सा बिजली से चला — भारत की ईवी खुदरा बिक्री करीब 63% बढ़कर रिकॉर्ड लगभग 3.06 लाख इकाई रही, और पहली बार कुल वाहन बिक्री का 12% से अधिक। पहला आँकड़ा विरासत में मिली कमज़ोरी है; दूसरा वह रास्ता है जो भारत ख़ुद चुनकर बना रहा है।
यही स्वच्छ-ऊर्जा प्रयास का गहरा महत्व है, जलवायु की सुर्ख़ियों से परे: यह एक ऊर्जा-सुरक्षा नीति है। हर सौर या पवन इकाई, हर इलेक्ट्रिक स्कूटर और कार, हर लीटर मिश्रित जैव-ईंधन उस आयातित कच्चे तेल की मात्रा घटाता है जो अर्थव्यवस्था को उस दिन की वैश्विक क़ीमत पर ख़रीदना पड़ता है। आपूर्ति-पक्ष पर भी भारत तेज़ चला है — नवीकरणीय क्षमता तेज़ी से बढ़ाकर और ग़ैर-जीवाश्म बिजली के दीर्घकालिक लक्ष्य तय करके।
जलसंधि से मोल-भाव नहीं किया जा सकता। पर वर्षों में उसकी ज़रूरत घटाई जा सकती है। ऊर्जा-संक्रमण वही रास्ता है जिससे आयात-निर्भर देश अपना लचीलापन वापस ख़रीदता है।
यह संक्रमण न मुफ़्त है, न स्वतः पूरा होगा। इसके लिए परिवर्तनशील बिजली सोखने को ग्रिड-उन्नयन, घरेलू बैटरी व सौर-विनिर्माण आधार ताकि एक आयात-निर्भरता दूसरी से न बदल जाए, छोटे शहरों तक पहुँचते चार्जिंग नेटवर्क, और आज की जीवाश्म-अर्थव्यवस्था से जुड़े श्रमिकों व क्षेत्रों के लिए न्यायसंगत राह चाहिए। ये असली इंजीनियरिंग और सामाजिक चुनौतियाँ हैं, नारे नहीं।
रचनात्मक, दीर्घ-दृष्टि वाला पाठ यह है कि भारत के पास इसे पूरा करने का प्रोत्साहन भी है और गति भी। वही कच्चे तेल का झटका जो एक कारोबारी दिन को डिगाता है, विद्युतीकरण और स्वच्छ बिजली के धैर्यवान काम का सबसे स्पष्ट तर्क है। सही ढंग से सँभाला जाए, तो ऊर्जा-संक्रमण एक बार-बार लौटती कमज़ोरी को टिकाऊ ताक़त में बदल देता है — और जो बैरल भारत को कभी आयात ही नहीं करने पड़ते, वही उसकी प्रगति का सबसे सच्चा माप बनते हैं।












