ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।भारत का पहला मानव अंतरिक्ष अभियान इस सप्ताह एक नपे-तुले क़दम और क़रीब आ गया। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने गगनयान के क्रू मॉड्यूल — वह कैप्सूल जो एक दिन भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को निचली कक्षा तक ले जाएगा और, सबसे अहम, सुरक्षित वापस लाएगा — के तीन योग्यता-परीक्षण पूरे किए। इनका केंद्र किसी भी मानव-मिशन का सबसे कम चमकीला पर सबसे ज़रूरी हिस्सा था: सुरक्षित वापसी।
एक परीक्षण ने क्रू मॉड्यूल की सीधा-करने वाली प्रणाली (अपराइटिंग सिस्टम) को परखा — एक संग्रहित शीत-गैस तंत्र जो समुद्र में उतरने के बाद कैप्सूल के उलट जाने पर उसे सीधा कर देता है। दूसरे ने पुनः-प्रवेश के दौरान क्रू मॉड्यूल को सर्विस मॉड्यूल से अलग करने वाली प्रणाली को परखा, और तीसरे ने पैराशूट की रक्षा करने वाले एपेक्स कवर की संरचनात्मक मज़बूती की पुष्टि की। ये 7 जुलाई को मध्य प्रदेश के श्योपुर में हुए एकीकृत मुख्य-पैराशूट एयरड्रॉप परीक्षण के बाद आए।
अंतरिक्ष यात्रा प्रक्षेपण के लिए याद की जाती है, पर जीती वापसी पर जाती है। भारत धैर्य से वही प्रणालियाँ परख रहा है जो उसके यात्रियों को घर लाएँगी।
हर परीक्षण एक ऐसे मिशन का जोखिम घटाता है जिसे भारत मानव-जीवन के साथ उड़ाना चाहता है, और इसका क्रम — किसी भी मानवयुक्त उड़ान से पहले मानवरहित प्रदर्शन और प्रणाली-योग्यता — ठीक वही अनुशासित राह है जिस पर दुनिया की स्थापित अंतरिक्ष-शक्तियाँ चलीं। सफलता भारत को अमेरिका, रूस और चीन के बाद स्वयं अपने यात्री भेजने और लौटाने वाला चौथा देश बना देगी।
रचनात्मक पाठ यह है कि भारत मानव-अंतरिक्ष क्षमता सही तरीक़े से बना रहा है — क्रमबद्ध, परीक्षण-दर-परीक्षण, जहाँ समय-सीमा नहीं बल्कि सुरक्षा संगठक सिद्धांत है। हर सफल योग्यता उस राष्ट्रीय इंजीनियरिंग-आधार को गहरा करती है जिसके लाभ प्रक्षेपण-स्थल से कहीं आगे — पदार्थ-विज्ञान, चिकित्सा और युवा वैज्ञानिकों की एक पीढ़ी की आकांक्षाओं तक — पहुँचते हैं।












