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एक सदी से अधिक के सबसे सूखे जून में से एक के बाद, दक्षिण-पश्चिम मानसून ने जुलाई में अपनी लय पा ली है। महीने के पहले पखवाड़े में देश के बड़े हिस्सों में वर्षा-गतिविधि तेज़ हुई है, जिससे 6 जुलाई तक दीर्घावधि औसत से करीब 20% रही संचयी कमी घटी है — और अहम बात यह कि इसने किसानों को खेतों में पिछड़ी बुवाई की भरपाई का मौक़ा दिया है।
यह सुधार असमान है, जैसा मानसून अक्सर होते हैं। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) का अनुमान है कि जुलाई की कुल वर्षा 280.4 मिमी के दीर्घावधि औसत के 94% से कुछ कम रहेगी, और कमी पूर्व व पूर्वोत्तर में केंद्रित रहेगी, जबकि उत्तर-पश्चिम और प्रायद्वीप के कुछ हिस्से बेहतर रहेंगे। पर दिशा बदल चुकी है, और बुवाई के मौसम को यही चाहिए था।
मानसून चार हफ़्तों की नहीं, चार महीनों की कहानी है। सूखा जून एक चेतावनी है; लौटता जुलाई उसका जवाब।
भरपाई का काम ज़िला-स्तर पर चल रहा है। कृषि वैज्ञानिक वर्षा-आधारित क्षेत्रों के किसानों को कम-अवधि की दलहन, मोटे अनाज (मिलेट) और तिलहन की ओर मोड़ रहे हैं, कृषि विज्ञान केंद्रों की मौसम-आधारित सलाह मानने और जहाँ वर्षा अब भी कम है वहाँ भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) की आकस्मिक योजनाओं का सहारा लेने का आग्रह कर रहे हैं, साथ ही मल्चिंग व सावधान जुताई से मिट्टी की नमी बचाने का।
रचनात्मक पाठ यह है कि भारत ठीक इसी तरह के वर्ष के लिए बना है। जलाशयों, बफ़र भंडार और एक सघन सलाह-तंत्र के साथ, समय पर लौटी वर्षा एक धीमी शुरुआत को भी पूरी फ़सल में बदल सकती है — और व्यावहारिक प्राथमिकता यही है कि बुवाई-खिड़की खुली रहते ही सही बीज, जल-बचत की सलाह और कम-अवधि के विकल्प किसानों तक पहुँचें।














