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राज्य सरकार के कर्मचारी साल में दो बार महंगाई भत्ता क्लेम नहीं कर सकते

by ब्लिट्ज़ इंडिया
February 14, 2026
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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल सर्विसेज (वेतन और भत्ते में संशोधन) नियम, 2009 के तहत महंगाई भत्ते के भुगतान पर निर्देशों को लेकर पश्चिम बंगाल राज्य की चुनौती पर फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राज्य सरकार के कर्मचारियों को अधिकार के तौर पर साल में दो बार डीए के भुगतान का हक नहीं है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की बेंच ने कहा – “इसका कारण यह है कि आरओपीए नियमों में, जिनका हमने ऊपर ज़िक्र किया, कहीं भी यह नहीं कहा गया कि डीए का भुगतान साल में दो बार किया जाएगा या किया जा सकता है। जो कुछ भी नियमों में नहीं दिया गया, जो संबंधित समय अवधि के लिए ‘मौजूदा वेतन’ के वितरण को नियंत्रित करते हैं, उसे किसी भी पक्ष का अधिकार नहीं कहा जा सकता है। कर्मचारियों के साल में दो बार डीए के वितरण के अधिकार की वैध उम्मीद के सिद्धांत पर आधारित तर्क को खारिज करने की जरूरत है, जैसा कि पहले वितरित किया गया था, क्योंकि यह कानूनी पाठ से नहीं निकलता है।”
डीए के साल में दो बार भुगतान का मुद्दा तब उठा, जब ट्रिब्यूनल ने राज्य को आरओपीए नियम, 2009 के तहत डीए के भुगतान के लिए मानदंड विकसित करने का निर्देश दिया और कहा कि डीए का भुगतान साल में कम से कम दो बार किया जा सकता है। जब राज्य ने उस फैसले को चुनौती दी तो कलकत्ता हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल का निर्देश बरकरार रखते हुए कहा कि एक बार जब राज्य ने साल में दो बार डीए तय करने और भुगतान करने का पैटर्न अपना लिया तो अचानक बदलाव को सही नहीं ठहराया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट के सामने राज्य ने तर्क दिया कि आरओपीए, 2009 में डीए के भुगतान के लिए कोई अनिवार्य आवृत्ति निर्धारित नहीं थी और न तो ट्रिब्यूनल और न ही हाईकोर्ट साल में दो बार भुगतान की बाध्यता लागू कर सकते थे, जब वैधानिक नियम इस बारे में चुप थे। राज्य ने कहा कि जारी करने की आवृत्ति प्रशासनिक मामला था और इसे न्यायिक रूप से तय नहीं किया जा सकता था। दूसरी ओर, कर्मचारियों ने तर्क दिया कि साल में दो बार डीए का भुगतान करने की बाध्यता कर्मचारियों को महंगाई से बचाने की ज़रूरत से पैदा होती है। उन्होंने तर्क दिया कि डीए कोई अतिरिक्त लाभ नहीं है, बल्कि न्यूनतम सुरक्षा है और मनमानी के कारण राज्य ने आरओपीए लागू होने के बाद शुरू में किए गए अनुसार साल में दो बार डीए को समायोजित/अपडेट करना बंद कर दिया।
उन्होंने भेदभाव का भी आरोप लगाया, क्योंकि नई दिल्ली और चेन्नई में तैनात कर्मचारियों को सालाना दो बार डीए समायोजित किया जाता रहा। राज्य की दलील को मानते हुए कोर्ट ने कहा कि आरओपीए नियमों में साल में डीए का भुगतान कितनी बार करना है, यह तय नहीं किया गया है। ऐसे किसी प्रावधान के अभाव में कोर्ट ने कहा कि न्यायिक निर्देश के ज़रिए एक तय फ्रीक्वेंसी लागू नहीं की जा सकती। कोर्ट ने पाया कि राज्य के नियमों में अनिवार्य भुगतान चक्र का न होना जानबूझकर था और यह मामला कार्यकारी विवेक पर छोड़ने का इरादा दिखाता है।
कोर्ट ने आगे कहा कि यह कमी इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह मुद्दा सीधे राज्य के वित्तीय मामलों से जुड़ा है, जिसमें बजट योजना, संसाधनों का आवंटन और वित्तीय क्षमता का आकलन शामिल है। कोर्ट ने कहा कि हर छह महीने में भुगतान का निर्देश देना राज्य की वित्तीय स्वायत्तता में दखलंदाजी होगी। इसलिए कोर्ट ने ट्रिब्यूनल का निर्देश रद कर दिया, जिसे हाईकोर्ट ने भी सही ठहराया, जिसमें डीए का भुगतान साल में कम से कम दो बार करने की बात कही गई।

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