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सख्ती और करुणा, दोनों जरूरी

by ब्लिट्ज़ इंडिया
January 17, 2026
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ब्लिट्ज ब्यूरो

सड़कों से आवारा कुत्ते हटाने पर 26,800 करोड़ रुपये खर्च होंगे तथा उन्हें रखने के लिए बुनियादी ढांचा भी चाहिए और आंकड़ों के मुताबिक पूरे देश में लगभग 91,800 नए डॉग शेल्टर भी बनाने होंगे। अतः समाधान के लिए ठोस, वैज्ञानिक और समन्वित प्रयासों की आवश्यकता है ताकि ‘डर और क्रूरता’ के बजाय ‘तर्क और करुणा’ से आवारा श्वानों की समस्या का हल निकाला जा सके।

देश में आवारा कुत्तों के आतंक और उनसे जुड़ी सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट में घमासान जारी है। आवारा कुत्तों का मुद्दा आज समाज और प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। जहां एक ओर बेजुबानों के प्रति दया और पशु कल्याण है तो वहीं दूसरी ओर इंसानों, खासकर बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा का अहम सवाल भी मौजूद है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सख्त रुख अपनाते हुए कहा है कि कुत्ते के काटने और किसी बच्चे, बड़े या बूढ़े, कमजोर व्यक्ति की मौत या चोट लगने पर वह भारी मुआवजा तय कर सकता है जिसका भुगतान राज्य सरकार करेगी। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने मामले में सुनवाई के दौरान यह कठोर टिप्पणी की। पीठ ने कहा कि 75 साल से सरकारों ने आवारा कुत्तों की समस्या से निपटने के लिए कुछ नहीं किया। अदालत ने कहा कि वह इस लापरवाही के लिए राज्य सरकारों को जिम्मेदार ठहराना चाहती है। राज्य सरकारें मुआवजा दें और खाना खिलाने वालों की भी जिम्मेदारी तय करें। साथ ही एनिमल बर्थ कंट्रोल नियमों को ठीक से लागू करने पर जोर दिया है ताकि इंसानी सुरक्षा और पशु प्रेम के बीच संतुलन कायम किया जा सके क्योंकि सिर्फ भावनात्मक बातें काफी नहीं हैं और समस्या का समाधान वैज्ञानिक और मानवीय तरीकों से ही संभव है। इसमें प्रभावी नसबंदी और जागरूकता महत्वपूर्ण है।
भारत में लाखों आवारा कुत्ते हैं और उनके काटने से होने वाली घटनाएं, खासकर बच्चों और बुजुर्गों की, लगातार बढ़ रही हैं जिससे रेबीज का खतरा भी बढ़ रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में स्वत: संज्ञान लेते हुए कहा कि राज्य सरकारें और स्थानीय प्रशासन इस समस्या से निपटने में विफल रहे हैं। अदालत ने पशु प्रेमियों से भी सवाल किया कि अगर आपको कुत्तों से इतना ही प्यार है तो उन्हें अपने घर क्यों नहीं ले जाते? वे सड़कों पर क्यों घूमते और लोगों को डराते रहें? कोर्ट ने एनिमल बर्थ कंट्रोल (नसबंदी और टीकाकरण) नियमों को प्रभावी ढंग से लागू करने पर जोर दिया है। हालांकि समस्या यह है कि यह काम भी शासन और प्रशासन के स्तर पर प्रभावी ढंग से नहीं किया जा रहा है। अगर सख्त निगरानी तंत्र के तहत नसबंदी और टीकाकरण का काम किया जाए तो पूरे देश में आवारा कुत्तों की जनसंख्या पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है। दरअसल कहीं न कहीं समस्या का मूल यह है कि शहरीकरण और पर्यावास के सिकुड़ने से कुत्तों में आक्रामकता बढ़ी है और वे इंसानों के करीब आ गए हैं। अब आवश्यकता इस बात की है कि इस समस्या को हल करने के लिए मानव सुरक्षा एवं पशु कल्याण के बीच संतुलन स्थापित करना होगा।
वस्तुतः आवारा श्वानों की समस्या के समाधान का रास्ता केवल कानूनी हस्तक्षेप या क्रूरता से नहीं निकलने वाला बल्कि हम तर्कसंगत, मानवीय और वैज्ञानिक तरीकों से ही इस समस्या का समाधान कर पाएंगे पर यहां तथाकथित श्वान प्रेमियों से भी कानूनों का पालन सख्ती से कराना होगा जो इन्हें जगह-जगह खाना खिलाने तो पहुंच जाते हैं किंतु इन बेजुबानों को बेहतर जीवन और वातावरण देने के लिए अपने घर नहीं ले जाना चाहते। आरोप है कि तथाकथित श्वान प्रेमियों को तमाम देशी-विदेशी संस्थाएं आर्थिक लाभ पहुंचा रही हैं। इस लाभ के लालच में ये इन आवारा कुत्तों को जगह-जगह खाना खिला कर आम नागरिकों के जीवन को खतरे में डाल रहे हैं जो एक बड़े अपराध की श्रेणी में आता है। इसलिए इस प्रवृत्ति से सख्ती से निपटा जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त एक अंदेशा यह भी व्यक्त किया जाता है कि भारत में तेजी से बढ़ और विकसित हो रहे पर्यटन उद्योग को भी नुकसान पहुंचाने के लिए तमाम विदेशी संस्थाएं इस समस्या का समाधान निकलने नहीं देना चाहती। अतः सरकार को इस दृष्टि से भी तथ्यों की जांच कर के उन संस्थाओं पर कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए जो इस नापाक इरादे को अंजाम दे रही हैं। इसके साथ ही सरकार, समाज और पशु प्रेमियों के बीच सामूहिक सहयोग से ही प्रभावी नीति बना कर इस समस्या का समाधान निकाला जाना संभव हो सकता है जिसमें सभी की सुरक्षा और जानवरों के प्रति दया, दोनों का ध्यान रखा जाए। यह एक संवेदनशील मुद्दा है जहां एक तरफ बेजुबानों की चिंता है तो वहीं दूसरी तरफ इंसानी जान की सुरक्षा भी सबसे अधिक अहमियत रखती है। सड़कों से आवारा कुत्ते हटाने पर 26,800 करोड़ रुपये खर्च होंगे तथा उन्हें रखने के लिए बुनियादी ढांचा भी चाहिए और आंकड़ों के मुताबिक पूरे देश में लगभग 91,800 नए डॉग शेल्टर भी बनाने होंगे। अतः समाधान के लिए ठोस, वैज्ञानिक और समन्वित प्रयासों की आवश्यकता है ताकि ‘डर और क्रूरता’ के बजाय ‘तर्क और करुणा’ से आवारा श्वानों की समस्या का हल निकाला जा सके।

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