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भूटान नरेश ने संगम में लगाई डुबकी, अक्षयवट के दर्शन किए

by ब्लिट्ज़ इंडिया
February 9, 2025
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Bhutan King took a dip in Sangam, saw Akshayavat
ब्लिट्ज ब्यूरो

महाकुंभनगर। भूटान नरेश जिग्मे खेसर नामग्याल वांगचुक ने त्रिवेणी संगम में आस्था की डुबकी लगाई। उन्होंने डुबकी लगाने से पहले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ सूर्यदेव को अर्घ्य दिया।

सरकार द्वारा जारी बयान के मुताबिक, वांगचुक ‘घो’ परिधान (भूटान में पुरुषों का राष्ट्रीय परिधान) में हवाई अड्डे पर पहुंचे जहां मुख्यमंत्री ने नारंगी रंग का शॉल देकर उनका स्वागत किया। बाद में जब भूटान नरेश वांगचुक स्नान के लिए पानी में उतरे तो उन्हें केसरिया रंग के लंबे कुर्ते-पायजामे में देखा गया।

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सरकार द्वारा जारी तस्वीरों के मुताबिक, वांगचुक के साथ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उनके मंत्रिमंडल के सहयोगी स्वतंत्र देव सिंह और नंद गोपाल गुप्ता नंदी तथा संतोष दास ‘सतुआ बाबा’ ने भी संगम में डुबकी लगाई। संगम में डुबकी लगाने के बाद भूटान नरेश अक्षयवट और बड़े हनुमान मंदिर में भी दर्शन के लिए गये। इसके बाद वांगचुक तथा मुख्यमंत्री, डिजिटल महाकुंभ अनुभूति केंद्र पहुंचे जहां उन्होंने महाकुंभ के डिजिटल स्वरूप का भी अवलोकन किया।

सरकार द्वारा जारी बयान के मुताबिक कलाकारों ने विभिन्न सांस्कृतिक प्रस्तुतियां पेश कर उनका स्वागत किया। बाद में भूटान नरेश राजभवन पहुंचे थे, जहां राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने उनका गरिमापूर्ण स्वागत किया।

वांगचुक ने महात्मा गांधी की प्रतिमा पर श्रद्धांजलि अर्पित की। राज्यपाल और मुख्यमंत्री ने भूटान नरेश के साथ द्विपक्षीय संबंधों पर विस्तृत चर्चा भी की।
बयान में कहा गया कि भूटान नरेश का यह दौरा भारत-भूटान मित्रता एवं सांस्कृतिक संबंधों को और अधिक सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा। भूटान नरेश और महारानी मार्च 2024 और दिसम्बर 2024 में दिल्ली की यात्रा पर आए थे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ऐसे पहले नेता हैं जिन्हें भूटान ने अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘ऑर्डर ऑफ द डुक ग्यालपो’ से सम्मानित किया।

जूना अखाड़े में पांच लाख से ज्यादा नागा साधु
म हाकुंभ नगर। गंगा-यमुना और अदृश्य सरस्वती के पावन संगम तट पर आबाद महाकुंभ का महामेला अब पूरे शबाब पर है। देश-विदेश के करोड़ों श्रद्धालु यहां की दिव्यता-भव्यता का नजारा लेने के साथ त्रिवेणी के संगम में डुबकी लगाकर खुद को कृतार्थ कर रहे हैं तो सालों साल से चल रही कठोर तपस्या को पूर्णता प्रदान करने की चाहत में साधु-संत धर्म-भक्ति की इस धरती पर पहले से ही धूनी रमाये हुए हैं। महाकुंभ में अखाड़े आकर्षण का प्रमुख केंद्र बने हुए हैं।

खासतौर पर इन अखाड़ों के नागा साधु-संतों का दर्शन कर आशीर्वाद पाने के साथ उनके रहस्यमय संसार को जानने समझने की उत्सुकता श्रद्धालुओं में कुछ ही देखी जा रही है। वे यह जानकर खासा हैरान हो रहे हैं कि केवल जूना अखाड़े में पांच लाख से ज्यादा नागा-संन्यासियों की फौज है। यह तो लगभग सभी को पता है कि देश में साध-संतों के कुल तेरह अखाड़े हैं और इनमें शैव सम्प्रदाय का प्रतिनिधित्व करने वाला श्री पंचनाम जूना अखाड़ा सबसे बड़ा है। यह अखाड़ा उत्तराखंड के कर्णप्रयाग में 1145 में स्थापित हुआ था। यह नागा साधुओं के लिए विश्वभर में विशेष रूप से प्रसिद्ध है।
इसमें नागा संत-संन्यासियों की तादाद पांच लाख से ज्यादा मानी जाती है। जूना अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरी हैं। वह एक लाख से ज्यादा नागा संन्यासियों को दीक्षा दे चुके हैं। बेहद अनुशासित माने जाने वाले जूना अखाड़ा के साथ संत-संन्यासियों को कठोर नियमों और परम्पराओं का पालन करना होता है। नागा साधुओं का इतिहास पुराना है। भभूत से

लिपटे हुए, माथे पर तिलक, हाथ पैरों में कड़ा, हाथों में त्रिशूल और हर दम ‘हर हर महादेव’ का उद्घोष करने वाले नागा संन्यासी कठोर तपस्या और कठिन परीक्षा के बाद ही अपने असल रूप को धारण कर पाते हैं। धर्म की रक्षा के लिए नागा साधु-संन्यासी अस्त्र धारण करते हैं। त्रिशूल, तलवार और भाला उनके प्रमुख अस्त्र हैं। त्रिशूल भगवान शिव का प्रिय अस्त्र है और इसे शक्ति, सृष्टि और विनाश का प्रतीक माना जाता है। वहीं तलवार और भाला वीरता व साहस के प्रतीक हैं। नागा साधु-संन्यासी धर्मरक्षा के साथ आत्मरक्षा के लिए भी इन अस्त्रों को साथ रखते हैं।
त्याग-तपस्या के साथ संकल्प- साहस और बलिदान के उनकी कई गाथाएं हैं। महाकुंभ की दिव्यता और भव्यता के साझीदार बन रहे विदेशी श्रद्धालुओं में भी नागा-संन्यासियों के जीवन और उनके कठिन त्याग तपस्या के बारे में जानने की खासी ललक देखी गई। उनकी वीरता और जुझारूपन की कई गाथाएं प्रचलित हैं। बानगी के तौर पर कुछ गाथाओं का जिक्र किया जा सकता है। काबुल और बलूचिस्तान की ओर से आक्रमण कर जोधपुर तक आए आक्रमणकारियों से उस समय नागाओं ने ही इस जगह को बचाया था। कहा जाता है कि उस समय मंदिर तोड़े जा रहे थे और लोग मारे जा रहे थे। मुगल शासकों ने हर व्यक्ति पर भारी कर लगा दिया था। तब अटल संन्यासियों ने उन्हें परास्त किया था।

अखाड़ों के अपने अपने नियम-कानून
अखाड़े अपने अलग-नियम और कानून से संचालित होते हैं। यहां जुर्म करने वाले साधुओं को अखाड़ा परिषद सजा देता है। छोटी चूक के दोषी साधु को अखाड़े के कोतवाल के साथ गंगा में पांच से लेकर 108 डुबकी लगाने के लिए भेजा जाता है। डुबकी के बाद वह भीगे कपड़े में ही देवस्थान पर आकर अपनी गलती के लिए क्षमा मांगता है, फिर पुजारी पूजा स्थल पर रखा प्रसाद देकर उसे दोषमुक्त करते हैं। विवाह, हत्या या दुराचार जैसे मामलों में उसे अखाड़े से निष्कासित कर दिया जाता है। अगर अखाड़े के दो सदस्य आपस में लड़ें भिड़ें, कोई नागा साधु विवाह कर ले या दुराचार का दोषी हो, छावनी के भीतर से किसी का सामान चोरी करते हुए पकड़े जाने, देवस्थान को अपवित्र करे या वर्जित स्थान पर प्रवेश, कोई साधु किसी यात्री या यजमान से अभद्र व्यवहार करे, अखाड़े के मंच पर कोई अपात्र चढ़ जाए तो उसे अखाड़े की ‘अदालत’ सजा देती है। अखाड़े का जो सदस्य इस कानून का पालन नहीं करता उसे निष्काषित कर दिया जाता है।

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