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इन 12 साल और 15 दिन का हासिल

by ब्लिट्ज़ इंडिया
July 4, 2026
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प्रधानमंत्री मोदी

ब्लिट्ज ब्यूरो

चुनाव जीतकर लगातार प्रधानमंत्री रहने के मामले में नरेंद्र मोदी सबसे आगे निकल गए हैं। उनके कार्यकाल और उनकी सफलताओं की हर कोण से समीक्षा होगी, लेकिन आगे बढ़ने के लिए चुनौतियों पर भी गौर करना होगा। पेश है, उनके प्रभावी कार्यकाल की एक संतुलित पड़ताल …

  • 2014 में भारत की जीडीपी: 1,949+ खरब रुपये
  • 2025 में भारत की जीडीपी: 3,965+ खरब रुपये

एन के सिंह वरिष्ठ अर्थशास्त्री एवं पूर्व राज्यसभा सांसद

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इतिहास निर्माताओं को सदा याद रखता है। विरासत उन संस्थानों, विचारों और ढांचों से बनती है, जो हमारे नश्वर जीवन से परे हैं। सत्ता क्षणिक हो सकती है, पर विरासत स्थायी होती है। नेतृत्व का असल आकलन कोई तत्काल हासिल कामयाबी नहीं है, बल्कि यह भविष्य के गर्भ में निहित है।
राष्ट्र दिशाहीन हो सकते हैं। राष्ट्र कई बार निम्न स्तरीय संतुलन से भी संतुष्ट हो जाते हैं। फिर भी हम जानते हैं, इतिहास कभी स्थिर नहीं रहता। भू-राजनीतिक संतुलन बदलता रहता है। नई शक्तियां उभरती रहती हैं। निर्णायक सवाल यह नहीं है कि बदलाव आएगा या नहीं। बदलाव तो हमेशा आता है।

सवाल यह है कि इसे कौन आकार देता है?

भारतीय सभ्यता की स्मृति भी इसका उत्तर देती है। चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में, मौर्य साम्राज्य एक संरचित, डाटा-आधारित राज्य के रूप में संचालित होता था। तब चंद्रगुप्त ने अर्थशास्त्र की रचना के लिए विख्यात कौटिल्य के सिद्धांतों का अनुसरण करते हुए अनेकता को एकता में बदल दिया था।
जैसा इतिहासकार एंगस मैडिसन ने दर्शाया है, पहली सहस्राब्दी की शुरुआत में, वैश्विक जीडीपी में करीब 25 से 30 प्रतिशत योगदान अकेले संपन्न भारत का था। सम्राट अशोक ने शक्ति को नैतिक दायित्व से जोड़ दिया, तो शिवाजी ने दिखाया कि दूरदर्शिता भौतिक अभावों पर कैसे विजय पाती है। ये केवल शासक नहीं, निर्माता भी थे।

ध्यान रहे, वास्तविक राष्ट्रीय परिवर्तन विरल है। सिर्फ आर्थिक तरक्क ी से यह मुमकिन नहीं। सिर्फ चुनावी कामयाबी से इतिहास नहीं बदलता। बदलाव तब होता है, जब कोई राष्ट्र अंदर से मजबूत होता है और बाहर दुनिया में भी आत्मविश्वास दिखाता है। हमें वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक करियर को इसी संदर्भ में समझना चाहिए। पिछले 25 वर्ष में उनका उदय लोकतंत्र के सबसे शक्तिशाली संकल्प का प्रतीक है। सार्वजनिक पद योग्यता के आधार पर तय होता है, विशेषाधिकार के आधार पर नहीं। उनकी शासन शैली इसी भाव से प्रेरित है। पिछले 12 वर्ष से प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने दिखावे के बजाय अनुशासन पर, वाक्पटुता के बजाय क्रियान्वयन पर और आडंबर के बजाय परिणामों पर जोर दिया है। इसके मूल में यह दृढ़ विश्वास है कि शासन प्रदर्शन और उत्तरदायित्व, दोनों है।

कमजोरी से मजबूती तक

एक दशक पहले, भारत एक कमजोर अर्थव्यवस्था था। अस्थिरता, उच्च मुद्रास्फीति और कमजोर बैंकिंग बैलेंस शीट से जूझ रहा था। आज यह दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। भारत 2030 तक 7.3 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की जीडीपी के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है।
संरचनात्मक सुधारों ने इस बदलाव को गति दी है। सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां कई दशकों के निचले स्तर, 3 प्रतिशत से भी नीचे आ गई हैं। सुव्यवस्थित जीएसटी प्रणाली से प्रति माह 1.70 लाख करोड़ रुपये से अधिक का राजस्व मिलता है। 12 लाख रुपये तक की वार्षिक आय वाले लोगों को आयकर से छूट है। लघु कंपनियों के लिए तय सीमा को 100 करोड़ रुपये के कारोबार तक विस्तारित करने से अनुपालन लागत में भारी कमी आई है। बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) ने भी पूंजी प्रवाह को बढ़ाया है।

भविष्य का निर्माण और सुधार

आर्थिक नीति उपभोग से सृजन की ओर स्थानांतरित हुई है। सार्वजनिक पूंजी निर्माण को केंद्र में रखा गया है। भारतमाला परियोजना के तहत 1.22 लाख करोड़ रुपये की 241 राजमार्ग परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं। 1.8 लाख करोड़ रुपये की 234 अन्य परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं। अक्षय ऊर्जा क्षमता 180 गीगावॉट से अधिक हो गई है। डिजिटल सार्वजनिक ढांचा भी इस तरक्क ी को रफ्तार दे रहा है। डिजिटल पहचान, यूपीआई और डिजिलॉकर की तिकड़ी की वजह से वित्त वर्ष 2025-26 में 24,162 करोड़ रुपये का वार्षिक लेनदेन हुआ है। यह वित्त वर्ष 2016-17 की तुलना में 12,000 गुना वृद्धि को दर्शाता है। यह विश्व की सबसे बड़ी लीकेज-प्रूफ प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण प्रणाली का आधार है। इसने 34 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि सीधे लोगों तक पहुंचाई है।

कल्याणकारी और संस्थागत सुधारों ने सख्त राजकोषीय अनुशासन बनाए रखा है। महामारी के समय 80 करोड़ से ज्यादा लोगों को मुफ्त खाद्य सुरक्षा की शुरुआत हुई थी। श्रम सुधारों ने 29 औपनिवेशिक कानूनों को चार संहिताओं में मिला लिया है। इससे नवंबर 2025 तक बेरोजगारी दर घटकर 4.7 प्रतिशत और ग्रामीण महिला बेरोजगारी 3.4 प्रतिशत हो गई थी। गारंटीशुदा रोजगार को 100 दिनों से बढ़ाकर 125 दिन कर दिया गया है। करीब 71 पुराने गैर-जरूरी कानून निरस्त हुए हैं।

सरकार की सफलताओं से अलग, चुनौतियां भी बहुत बड़ी हैं, पर उन पर विजय पाई जा सकती है। पिछले 12 वर्ष का रिकॉर्ड साबित करता है कि आज भारत के पास संस्थागत क्षमता और राजनीतिक इच्छाशक्ति है। प्रधानमंत्री ने देश की क्षमताओं, आत्मविश्वास और प्रतिष्ठा को व्यवस्थित रूप से बढ़ाया है। कहानी अभी जारी है।

12 बड़ी सफलताएं : संकल्प और सेवा के नए कीर्तिमान

यूपीआई की सफलता
11 अप्रैल 2016 को भारत में यूपीआई की आधिकारिक शुरुआत हुई और कैशलेस अर्थव्यवस्था खड़ी हुई।

जनधन खाते साकार हुए
14 अगस्त 2014 को जनधन योजना की शुरुआत हुई। वंचित-गरीब बैंकिंग से जुड़े। उन तक सीधी मदद पहुंची।

रसोई गैस घर-घर सुलभ
1 मई 2016 में उज्ज्वला योजना शुरू। करोड़ों घरों में रसोई बनाना आसान हुआ, महिलाओं की जिंदगी बदली।

स्वच्छ भारत से बदली छवि
गांधी जयंती पर 2 अक्टूबर 2014 को स्वच्छता के लिए अभियान शुरू हुआ। शौचालय सुविधा सुलभ हुई।

मेक इन इंडिया का जयघोष
25 सितंबर 2014, मेक इन इंडिया शुरू। मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक, दवा उत्पादन में अग्रणी हुआ भारत।

महिलाओं की बढ़ी ताकत
12 वर्ष में महिलाओं की ताकत बढ़ी है। विधायिका में भी 33 प्रतिशत आरक्षण मिलना तय हो गया है।

नक्सल हिंसा पर लगाम
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासन के 12वें वर्ष में नक्सल हिंसा पर लगाम लगी। विकास तेज हुआ।

आतंकी हमलों से सुरक्षा
आए दिन होने वाले आतंकी हमले थमे हैं। आतंकियों को ठीक से पता है, नया भारत करारा जवाब देता है।

आसान ऋण
8 अप्रैल 2015 को मुद्रा योजना शुरू। 20 लाख रुपये तक के ऋण लेना हुआ आसान। बैंकिंग लाभ और ऋण ज्यादा सुलभ हुए।

मुख्यधारा में कश्मीर
कश्मीर में विकास योजनाएं लागू हुई ं। अनुच्छेद 370 और 35ए को हटाने में सफलता मिली।

सड़क विस्तार
रोज 34 किलोमीटर नई सड़क बन रही है। एक्सप्रेस-वे ने सड़क परिवहन को पूरी तरह से बदल दिया है।

परिवहन सुविधा
रेल और हवाई सेवा में बहुत सुधार हुआ है। बीते वर्षों में रेलवे स्टेशनों और हवाई अड्डों का कायाकल्प हो चुका है।

सामने 6 बड़ी चुनौतियां

1. हमने काफी लंबा सफर तय किया है, लेकिन छह चुनौतियां हमारी तरक्क ी के लिए खतरा बन सकती हैं। सबसे पहले, भू-राजनीति हमारे आर्थिक जीवन में दखल देती है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक है। ईंन्धन, खाद्य और उर्वरक की कीमतें बाहरी झटकों से प्रभावित होती रहती है। अक्षय ऊर्जा पर जोर देना ही आगे का रास्ता है। फिर भी, कुछ क्षेत्रों (जैसे सीमेंट और इस्पात) में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन तीव्रता, सौर ऊर्जा का सीमित उपयोग और अनिश्चितता हमारे हरित बदलावों के लिए चुनौती बनी हुई है।

2. चीन की विनिर्माण क्षमता अधिक होने से भारत की औद्योगिक महत्वाकांक्षाओं को खतरा है। आज अतिरिक्त उत्पादन से विश्व के बाजार भर रहे हैं, तो कीमतें भी गिर रही हैं और घरेलू उत्पादकों पर दबाव बढ़ रहा है। ज्यादा से ज्यादा देश वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के साथ जुड़ते हुए उद्योगों को अनुचित व्यापार से बचाने की जरूरत पहचान रहे हैं।

3. भारत को विशाल आबादी से फायदा है पर यह फायदा अपने आप नहीं मिलेगा। युवा आबादी तभी ताकत में बदलती है, जब उसके कौशल और रोजगार का मेल हो जाता है। इस दशक में भारत को वैश्विक झटके लग रहे है, पर राजकोषीय दबाव पूंजीगत व्यय को प्राथमिकता देने में बाधक नहीं बनना चाहिए। बुनियादी ढांचा, नवाचार और उद्योग हमारे जीवन में एक बार मिलने वाले जनसांख्यिकीय अवसर का लाभ उठाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण हैं। इसके लिए हमें अपने नीति निर्माण में आर्थिक तर्कसंगतता को बनाए रखना होगा।

4. हमारे कौशल विकास की तुलना में प्रौद्योगिकी कहीं अधिक तेजी से विकसित हो रही है। भारत को 2027 तक 12 लाख एआई पेशेवरों की जरूरत पड़ेगी। एआई हमारी सबसे बड़ी ताकत और सबसे बड़ी चुनौती बन सकती है। हम लाभ लेने में सक्षम हैं और पारंपरिक क्षेत्रों में एआई के व्यापक प्रसार से उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है।

5.विकसित अर्थव्यवस्थाओं की अस्थिरता पूंजी प्रवाह, विनिमय दरों और उत्पाद की कीमतों के माध्यम से फैलती है। कुछ विकसित अर्थव्यवस्थाओं में पूंजी का असमान केंद्रीकरण हुआ है, जिसे भारत ने नकारात्मक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के साथ महसूस किया है। विदेशी मुद्रा भंडार 650 अरब डॉलर से अधिक है, पर पूंजी प्रवाह बढ़ाने के प्रयास करने होंगे। घरेलू निवेश के माहौल में सुधार, नियामक बाधाओं को कम करना जरूरी है, ताकि शून्य-ऋण लक्ष्य और उच्च-विकास वाले भविष्य के लिए पूंजी को आकर्षित किया जा सके।

6. राजनीतिक अर्थव्यवस्था खुद कई दबाव पैदा करती है। बीते 12 वर्ष भारत की राजनीतिक स्थिरता के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। फिर भी, आगे राह चुनौतियों से भरी है। सब्सिडी की मांग, जरूरी सामाजिक सुरक्षा उपाय, समानता और दक्षता का संतुलन इत्यादि बड़े मुद्दे हैं। सबसे बड़े लोकतंत्र की जरूरतों को पूरा करने के साथ वित्तीय अनुशासन रखना बड़ी चुनौती है।

साभार हिन्दुस्तान

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