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सतत विकास लक्ष्य 6: स्वच्छ और सुरक्षित पानी से कितना दूर है भारत?

हर व्यक्ति तक पानी की उपलब्धता ही नहीं, बल्कि जल संसाधनों का टिकाऊ प्रबंधन व गुणवत्ता सुनिश्चित करना भी है जरूरी

by ब्लिट्ज़ इंडिया
May 23, 2026
in the blitz
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एस राधाकृष्णन

नई दिल्ली। संयुक्त राष्ट्र ने लगातार होने वाले विकास के लिए साल 2015 में कुल 17 लक्ष्य तय किए थे जिन्हें सतत विकास लक्ष्य यानी सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल (एसडीजी) कहा जाता है। इन सभी लक्ष्यों को सतत विकास के 2030 एजेंडा के तहत अपनाया गया था। इनका मकसद गरीबी खत्म करना, पृथ्वी की सुरक्षा और सभी लोगों के लिए बेहतर व समृद्ध जीवन सुनिश्चित करना है।

इन लक्ष्यों में से लक्ष्य 6 का संबंध पानी और साफ-सफाई से है। इसका उद्देश्य ‘सभी के लिए स्वच्छ जल और स्वच्छता सुनिश्चित करना है।’ इसमें केवल हर व्यक्ति की पानी तक पहुंच नहीं, बल्कि जल संसाधनों का टिकाऊ प्रबंधन व गुणवत्ता सुनिश्चित करना भी शामिल है।

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1000 ब्लॉक गंभीर भूजल संकट का सामना कर रहे

एनवायरनमेंटल ट्रैकिंग रिपोर्ट (2023) के अनुसार, भारत के लगभग 1000 ब्लॉक गंभीर भूजल संकट का सामना कर रहे हैं।

हालांकि, एसडीजी-6 के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए भारत में जल जीवन मिशन, अटल भूजल योजना, वर्षा जल संचयन अभियान, कैच द रेन अभियान, राष्ट्रीय जल मिशन, राष्ट्रीय एक्विफर मैपिंग और मैनेजमेंट के अलावा जल शक्ति अभियान जैसी योजनाओं को शुरू किया गया है। लेकिन, इन तमाम प्रयासों के बावजूद, देश में भूजल संकट गहराता जा रहा है। तेज़ी से बढ़ रही जनसंख्या, शहरीकरण और औद्योगिक विस्तार ने जल संसाधनों पर दबाव डाला है, जिससे जल की गुणवत्ता और उपलब्धता में भी कमी आई है।

जल में रासायनिक, औद्योगिक या जैविक प्रदूषण के स्तर को कम करना और गंदे पानी को साफ़ करके उसके पुनः उपयोग को बढ़ावा दिया गया है।

Water

लक्ष्यों को पूरा करने में आने वाली बाधाएं

जल संसाधनों की घटती उपलब्धता: अत्यधिक भूजल दोहन, नदियों का सूखने और वर्षा पर बहुत अधिक निर्भरता के कारण जल स्रोत लगातार कम हो रहे हैं। सीजीडब्लूबी के अनुसार भारत के 70 प्रतिशत भूजल-ब्लॉक “अतिदोहित क्षेत्र” बन चुके हैं।

भारत दुनिया का सबसे बड़ा भूजल उपभोक्ता देश है। देश की 70 प्रतिशत सिंचाई और 85 प्रतिशत पेयजल की ज़रूरत भूजल से ही पूरी होती है। पिछले कुछ दशकों में तेजी से बढ़ती आबादी, कृषि और उद्योगों की मांग को पूरा करने के लिए भूजल पर निर्भरता की वजह से भूजल का स्तर लगातार घट रहा है।

अलग-अलग सरकारी और गैर सरकारी स्रोत बताते हैं कि भारत में सिंचाई के लिए उपयोग में लाए जाने वाले कुल पानी का लगभग 60 से 62 प्रतिशत हिस्सा भूजल से आता है। इसके अलावा भारत के गांवों में पीने के पानी का भी ज्यादातर हिस्सा भूजल के ही भरोसे है। यह निर्भरता भूजल पर तत्काल दबाव बनाती है।

एनवायरनमेंटल ट्रैकिंग रिपोर्ट (2023) के अनुसार, भारत के लगभग 1000 ब्लॉक गंभीर भूजल संकट का सामना कर रहे हैं।
सीजीडब्लूबी के आंकड़े के अनुसार तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों में 42 प्रतिशत ब्लॉकों में भूजल का अत्यधिक दोहन हो रहा है।

कई राज्यों जैसे राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में जल तालिकाएं तेजी से घट रही हैं, जिससे कृषि उत्पादन और पेयजल आपूर्ति पर बुरा प्रभाव पड़ा है।

तेज़ी से बढ़ रही जनसंख्या, शहरीकरण और औद्योगिक विस्तार ने जल संसाधनों पर दबाव डाला है, जिससे जल की गुणवत्ता और उपलब्धता में भी कमी आई है।

तेज़ी से बढ़ रही जनसंख्या, शहरीकरण और औद्योगिक विस्तार ने जल संसाधनों पर दबाव डाला है, जिससे जल की गुणवत्ता और उपलब्धता में भी कमी आई है।

सरकारी दावे बनाम ज़मीनी हकीकत

सीजीडब्लूबी की साल 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में वार्षिक भूजल पुनर्भरण क्षमता 449.08 बिलियन क्यूबिक मीटर (बीसीएम) है, जबकि वार्षिक भूजल दोहन 241.34 बीसीएम है। सरकार का दावा है कि अटल भूजल योजना, जल जीवन मिशन और ‘कैच द रेन’ अभियान जैसी पहलों के कारण भूजल प्रबंधन में सुधार हुआ है।

इसी रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि औसतन भूजल दोहन (किसी क्षेत्र में भूजल के पुनर्भरण यानी रिचार्ज की तुलना में निकाले जाने वाले पानी की मात्रा) का आंकड़ा 59.26 प्रतिशत है। लेकिन भूजल के अत्यधिक दोहन की यह स्थिति देश के कई राज्यों में गंभीर है और उनकी वास्तविक स्थिति इस सरकारी दावे से मेल खाती नज़र नहीं आती।

पंजाब का उदाहरण

अगर हम केवल पंजाब राज्य का उदाहरण लें तो, पंजाब में भूजल दोहन का आंकड़ा 156.87 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। जिसका सीधा मतलब है ज़मीन पुनर्भरण के माध्यम से जितना पानी जमा कर सकती है उससे लगभग डेढ़ गुना ज़्यादा पानी हर साल निकाला जा रहा है। इस असंतुलन ने जालंधर, लुधियाना, संगरूर और पटियाला जैसे कई इलाकों को “अत्यधिक दोहन वाले क्षेत्र” की श्रेणी में ला दिया है।

हरियाणा के हाल

ऐसी ही स्थिति हरियाणा की भी है। सीजीडब्लूबी की साल 2023 की ही रिपोर्ट के अनुसार इस राज्य का भूजल दोहन 134.37 प्रतिशत है, जिसमें गुरुग्राम, फरीदाबाद, करनाल और कैथल जैसे ज़िले हैं। खेती के बढ़ते दबाव और तेज़ी से हो रहे शहरीकरण के कारण इन ज़िलों में जलस्तर तेजी से नीचे जा रहा है।

दावे और जल दोहन की वास्तविक स्थिति में भारी अंतर

राजस्थान, दिल्ली, उत्तर प्रदेश के नोएडा, गाजियाबाद, मेरठ और आगरा ज़िलों में भूजल के पुनर्भरण के दावे और उसके दोहन की वास्तविक स्थिति में अंतर स्पष्ट दिखाई पड़ता है।

रेगिस्तानी भूभाग होने के बावजूद, राजस्थान के जयपुर, झुंझुनूं और नागौर में भूजल के अत्यधिक दोहन के कारण जलस्तर हर साल औसतन 1 मीटर तक नीचे जा रहा है।

देश की राजधानी की स्थिति

देश की राजधानी दिल्ली में भूजल दोहन की दर 120 प्रतिशत से अधिक है। विशेषकर दक्षिण और पश्चिम दिल्ली के नज़फ़गढ़, द्वारका, जनकपुरी, उत्तम नगर, मोती नगर आदि इलाकों में बोरवेलों से जल निकासी ने पुनर्भरण की संभावनाओं को लगभग खत्म कर दिया है।

दरअसल, हजारों गहरे बोरवेलों से लगातार पानी खींचा जा रहा है। भूजल निकालने की गति, वर्षा से मिलने वाले पुनर्भरण से कई गुना अधिक हो गई है। जिसका नतीजा यह हुआ है कि ज़मीन के नीचे पानी का स्तर इतनी गहराई तक चला गया है कि सामान्य वर्षा से उसकी कमी पूरी नहीं हो पा रही है। दिल्ली जल बोर्ड (डीजेबी) के अनुसार, शहर का जलस्तर लगभग 300 मीटर तक गिर चुका है।

लगातार गिर रहा जलस्तर

उत्तर प्रदेश के नोएडा, गाज़ियाबाद, मेरठ और आगरा जैसे जिलों में औद्योगिक और आवासीय विकास के चलते जलस्तर लगातार गिर रहा है। राज्य के कुल 823 विकासखंडों में आगरा के बिचपुरी, अकोला, बरौली अहीर, खंडौली जैसे लगभग 165 ब्लॉक ओवर-एक्सप्लॉइटेड यानी अति-दोहन वाले क्षेत्र घोषित किए जा चुके हैं। जबकि, उत्तर प्रदेश उन 7 राज्यों की सूची में शामिल है जहां अटल भूजल योजना को प्राथमिकता दी गई है और इसके अंतर्गत यहां भूजल स्तर के पुनर्भरण के प्रयास किए जा रहे हैं।

दक्षिण राज्यों में भी हालात चिंताजनक

तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे दक्षिण भारतीय राज्यों की स्थिति भी चिंताजनक है। चेन्नई, कोयंबटूर और बेंगलुरु जैसे शहरी इलाकों में अत्यधिक भूजल दोहन के कारण गर्मियों में जल-संकट सामान्य हो चुका है।

एसडीजी 6 के अलग-अलग पहलू

संयुक्त राष्ट्र ने एसडीजी 6 को केवल साफ़ जल-आपूर्ति तक ही सीमित न रखकर इसमें जल की गुणवत्ता, जल के प्रबंधन, पारिस्थितिकी और साझेदारी जैसे पहलुओं को भी शामिल किया है। इनका उद्देश्य जल और स्वच्छता को मानव अधिकार के रूप में स्थापित करने के साथ ही, जल-संसाधनों का प्रबंधन कुछ इस तरह से करना है कि वर्तमान और भविष्य दोनों के लिए साफ पानी की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके।

इस लक्ष्य के मुख्य तत्वों में शामिल हैं:
सुरक्षित और सुलभ जल: इसके तहत हर व्यक्ति को पर्याप्त मात्रा में सुरक्षित पानी मुहैया करवाने के साथ ही उसके किफ़ायती और पहुंच में होने को भी शामिल किया गया है। यह एसडीजी-6 का मूल तत्व है।

स्वच्छता: इस तत्व में सभी के लिए शौचालय की सुविधा, खुले में शौच की आदत का अंत, माहवारी के दौरान स्वच्छता, हाथ धोने जैसी आदतों को बढ़ावा देने की बात की गई है। इसके अलावा दूषित घरेलू पानी और मल निस्तारण की व्यवस्था भी इस लक्ष्य का हिस्सा है।

जल-गुणवत्ता और प्रदूषण-नियंत्रण: इसमें जल में रासायनिक, औद्योगिक या जैविक प्रदूषण के स्तर को कम करना और गंदे पानी को साफ करके उसके पुनः उपयोग को बढ़ावा दिया गया है।

जल संसाधनों का सतत प्रबंधन: कृषि, उद्योग और घरेलू उपयोग में जल-उपयोग की दक्षता को बढ़ाने पर ज़ोर दिया गया है ताकि जल-स्रोतों पर पड़ने वाले बोझ को कम किया जा सके। इसमें पाइपलाइन लीकेज जैसी कमियों को कम करने और एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन के विस्तार पर ज़ोर दिया गया है।

भूजल और जल-पारिस्थितिकी की रक्षा: इसमें नदियों, झीलों, आर्द्रभूमियों सहित भूजल के तमाम स्रोतों का संरक्षण और उनके पुनर्स्थापन को सुनिश्चित करने की बात कही गई है। इसमें आर्द्रभूमियों, बाढ़-मैदानों और जलग्रहण क्षेत्रों का पुनर्जीवन, जल जैव-विविधता की रक्षा और नदी किनारे के जंगलों और पारिस्थितिकी का संरक्षण शामिल है।

एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन: स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक जल-संसाधनों की समग्र योजना और नीति-निर्माण पर विशेष ध्यान केंद्रित करने पर बल देने के साथ ही इसमें नदी बेसिन और भूजल प्रबंधन योजनाएं, अंतर्राज्यीय और अंतर्राष्ट्रीय जल-साझेदारी और डेटा साझा करने और संस्थागत समन्वय की व्यवस्था शामिल है।

सामुदायिक स्तर पर भागीदारी और सहयोग : इसके तहत जल और स्वच्छता से जुड़ी योजनाओं में स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी के साथ ही राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मिलने वाले सहयोग और आर्थिक सहायता को सुनिश्चित किया जाना है।

कैग की रिपोर्ट

उधर कैग (सीएजी) की साल 2024 की रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि कई राज्यों में निगरानी प्रणाली और डेटा-अपडेटिंग में हुई देरी से योजना का प्रभाव उम्मीद से कम रहा। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 31 राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों में से सिर्फ कुछ ही (आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा, केरल, मध्य प्रदेश, ओडिशा, पंजाब, राजस्थान) राज्यों में स्थानीय-स्तर और राज्य सरकारों के बीच मॉनिटरिंग मैकेनिज्म प्रभावी रूप से स्थापित हैं। साथ ही, पुनर्भरण के लिए तरह-तरह के प्रयास, जैसे नए तालाबों का निर्माण, पुराने जल-स्रोतों जैसे रिचार्ज कुएं, परकोलेशन टैंक (वर्षा या सतही जल को रोककर धीरे-धीरे ज़मीन में रिसने में मदद करने वाला ढांचा) आदि की मरम्मत और देखरेख जैसे कदम उठाए तो गए लेकिन बरती गई अनियमितता के कारण कारगर साबित नहीं हुए। इसका एक उदाहरण अमृत सरोवर योजना ही है, जिसके उत्तर प्रदेश में सफल होने के प्रमाण हैं।

एसडीजी 6 के लिए यूपी ने उठाए हैं कई सकारात्मक कदम

यूपी ने खुले में शौच के अंत की स्थिति का दावा किया है और व्यक्तिगत घरेलू शौचालय निर्माण में अपने शहरी लक्ष्य को आवश्यकता से अधिक प्राप्त किया है।

सतत लक्ष्य 6, सभी के लिए जल और स्वच्छता की उपलब्धता और उसके सतत प्रबंधन को सुनिश्चित करने का प्रयास करता है और वैश्विक राजनीतिक मंच पर जल और स्वच्छता पर बढ़े हुए फोकस को दर्शाता है। सभी को स्वच्छ पीने का पानी प्रदान करने से लेकर स्वच्छता सुनिश्चित करने तक के लिए स्कूलों में महिला शौचालय होने तक, लक्ष्य 6 जल प्रबंधन को भी देखता है। इस लक्ष्य के तहत 8 एसडीजी लक्ष्य हैं जो जल और स्वच्छता की उपलब्धता और सतत प्रबंधन को सुनिश्चित करने के लिए हैं। इस एसडीजी की प्रगति का मापन और मॉनिटर करने के लिए राज्य सामान्य सूचक रूपरेखा में कुल 11 सूचक हैं।

उत्तर प्रदेश ने हाल के वर्षों में एसडीजी 6 के तहत लक्ष्यों की प्राप्ति की दिशा में कई सकारात्मक कदम उठाए हैं। राज्य ने खुले में शौच के अंत की स्थिति का दावा किया है और व्यक्तिगत घरेलू शौचालय निर्माण में अपने शहरी लक्ष्य को आवश्यकता से अधिक प्राप्त किया है। यह शिक्षण संस्थानों में महिला शौचालय प्रदान करने में भी उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रहा है।

राज्य को सार्वभौमिक रूप से जल और स्वच्छता सुविधाओं तक पहुँचने और उसके सतत प्रबंधन को बेहतर बनाने के लिए बहुत कुछ करना है। एसडीजी 6 के संकेतांकों को पाने की दिशा में किए गए उत्तर प्रदेश के लक्ष्यों की प्रगति, विशेषकर स्वच्छता के क्षेत्र में संतोषजनक और पर्याप्त स्तरों को प्राप्त करने के लिए एक लम्बी यात्रा की आवश्यकता है। स्वच्छता का सीधा संबंध गरीबी उत्थान और सार्वजनिक स्वास्थ्य परिणामों से होता है।

2021-22 के लिए नीति आयोग के एसडीजी सूची रैंकिंग में, उत्तर प्रदेश को समय एसडीजी रैंकिंग में 28 राज्यों में 25वें स्थान पर रैंक किया गया था और एसडीजी 6 के संदर्भ में 20वें स्थान पर था। हालांकि, राज्य ने अपनी समग्र स्थिति को राष्ट्रीय औसत के 66 की तुलना में कुल स्कोर को 60 पर ला कर सुधारा और ‘परफॉर्मर’ राज्य के रूप में रैंक किया, जो कि बिहार, झारखंड और असम से आगे है, और एसडीजी 6 के संदर्भ में फ्रंट रनर राज्य भी है। यद्यपि राज्य ने स्वच्छ भारत मिशन के तहत 100 प्रतिशत ओपन डिफेकेशन फ्री (ओ.डी.एफ.) लक्ष्य को हासिल किया है, जिनमें से 12 प्रतिशत ग्रामीण घरों को शौचालय की सुविधा पहुंचाने को एल. ओ.बी. (लेफ्ट आउट ऑफ बेसलाइन) में वर्गीकृत किया है जो कि सभी राज्यों और संघ राज्यों के में सबसे अधिक है। समान रूप से, हालांकि राज्य ने अगस्त 2019 में सिर्फ 1.95 प्रतिशत से ग्रामीण घरों को नल से पानी प्रदान करने में कई कदम बढ़ाए हैं और इस समय के बाद से यह 13.51 प्रतिशत तक पहुंचा है, लेकिन 2024 तक दो करोड़ घरों को अब भी कवर करना बाकी है।

सी.आई.एफ. में प्रगति

सूचकों के साथ उनको प्राप्त करने की दर एक मिश्रित परिदृश्य प्रस्तुत करती है। राज्य ने साबित किया है कि 100% जिलों में ओ.डी.एफ. प्राप्त किया गया है। हालांकि, केवल 53.63% ग्रामीण जनसंख्या को संशोधित पीने का पानी का स्रोत मिला है। व्यक्तिगत घरेलू शौचालय (आई.आई.एच.एल.) का निर्माण वार्षिक लक्ष्य की तुलना में शहरी क्षेत्रों में 100% से अधिक हो गया है और अब भी बढ़ रहा है। ग्रामीण उत्तर प्रदेश के लिए वार्षिक लक्ष्य के समक्ष आई.आई. एच.एल. निर्माण केवल 43.2% है। एक क्षेत्र जहां राज्य अच्छा प्रदर्शन कर रहा है, वह है ऐसे विद्यालयों का प्रतिशत अथवा संख्या बढ़ना जहां बालिकाओं के लिए अलग शौचालय सुविधाएं उपलब्ध हो गई हैं। इस सूचक के लिए राज्य लगभग 100% कवरेज तक पहुंचने की कोशिश कर रहा है, फिर चाहे बुनियादी हो या उच्चतर शैक्षिक सुविधाएं हों। 2023 में 44.4% के लक्ष्य और राष्ट्रीय औसत 59.91% के समक्ष केवल 35.85% ग्रामीण जनसंख्या को उनके परिसर में पाइप्ड वाटर सिस्टम (पी.डब्लू.एस. पाइप जलप्रबंधन) के माध्यम से सुरक्षित और पर्याप्त पीने का पानी मिल रहा था। शहरी के लिए यह 26.58% है। लगभग 54% सीवेज को सतह जलस्रोतों में डिस्चार्ज करने से पहले उपचारित किया जा रहा है।

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