नई दिल्ली। जर्मनी भारत के साथ प्रस्तावित पनडुब्बी सौदे पर हस्ताक्षर करने के लिए तैयार है। जर्मन राजदूत-मनोनीत डॉ. जैस्पर वीक ने विगत दिवस यह जानकारी दी। उन्होंने कहा कि जर्मन पक्ष ने सरकारी समझौते समेत सभी दस्तावेजों को मंजूरी दे दी है। अब प्रस्ताव भारतीय मंजूरी प्रक्रियाओं के पूरा होने का इंतजार कर रहा है। इसमें कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी यानी सीसीएस की मंजूरी भी शामिल है। यह बयान दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग को आगे बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत है। प्रस्तावित सौदा प्रोजेक्ट 75 (I) के अंतर्गत है। इसके तहत भारत में छह एडवांस पारंपरिक पनडुब्बियों का निर्माण होना है।
निर्माण का काम मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड यानी एमडीएल जर्मन शिपबिल्डर थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स यानी टीकेएमएस के साथ साझेदारी में करेगा। प्रोजेक्ट का अनुमानित खर्च 70,000 से 90,000 करोड़ रुपये के बीच बताया जा रहा है। यह आंकड़ा रिपोर्टेड मूल्यांकन पर निर्भर करता है।
प्रोजेक्ट 75(1) की विशेषताएं और महत्व
प्रोजेक्ट 75(1) भारतीय नौसेना का लंबे समय से लंबित कार्यक्रम है। इसका उद्देश्य एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन यानी एआईपी से लैस छह अगली पीढ़ी की पारंपरिक पनडुब्बियां हासिल करना है। एआईपी तकनीक पनडुब्बी को बैटरी रिचार्ज के लिए सतह पर आए बिना लंबे समय तक पानी के अंदर रहने में सक्षम बनाती है।
इससे युद्ध क्षमता और गुप्तचर क्षमता, दोनों बढ़ती है। एमडीएल और टीकेएमएस ने जून 2023 में सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। औपचारिक डील की बातचीत सितंबर 2025 में शुरू हुई। यह कार्यक्रम नौसेना की पानी के अंदर की क्षमताओं को मजबूत करेगा। साथ ही घरेलू पनडुब्बी निर्माण विशेषज्ञता का विस्तार करेगा।
प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, स्वदेशी विनिर्माण और संयुक्त विकास के अवसर पैदा होंगे। विशेषज्ञों ने रक्षा-औद्योगिक सहयोग को भारत-जर्मनी रणनीतिक साझेदारी का जरूरी हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि पनडुब्बी कार्यक्रम व्यापक औद्योगिक सहयोग पैदा कर सकता है। ड्रोन, मानवरहित सिस्टम और एडवांस सेंसर जैसे क्षेत्रों में भी सहयोग की संभावना है।
सौदे की वर्तमान स्थिति और आगे की राह
जर्मन पक्ष की तैयारी पूरी हो चुकी है। अब गेंद भारतीय पक्ष के पाले में है। सीसीएस समेत आंतरिक मंजूरी प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद समझौते पर हस्ताक्षर हो सकते हैं। यह सौदा दोनों देशों के सैन्य और औद्योगिक संबंधों को गहरा करेगा। भारत के लिए यह स्वदेशी रक्षा उत्पादन क्षमता बढ़ाने का मौका है।
जर्मनी के लिए एशिया में रणनीतिक साझेदार के साथ सहयोग मजबूत करने का अवसर है। पनडुब्बी निर्माण एक जटिल और लंबी प्रक्रिया है। टेक्नोलॉजी ट्रांसफर सफल होने पर भारत भविष्य में और अधिक आत्मनिर्भर बन सकेगा। एमडीएल जैसे शिपयार्ड की क्षमता का उपयोग होगा और रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे।
लागत 70 से 90 हजार करोड़ रुपये के बीच होने से यह भारतीय रक्षा बजट का बड़ा हिस्सा होगा। इसलिए मंजूरी प्रक्रिया में सावधानी बरती जा रही है। भारत-जर्मनी संबंधों में रक्षा सहयोग बढ़ रहा ह। प्रोजेक्ट 75 (I) इसी दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकता है।














