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खोखले आंकड़े

भारत में मोबाइल फोन बनाने की असलियत तेजी के दावों को झूठा साबित करती है

by ब्लिट्ज़ इंडिया
July 4, 2026
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खोखले आंकड़े

ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।
जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने भारत को दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन बनानेाला देश घोषित किया, तो इस घोषणा का स्वागत जायज गर्व के साथ किया गया।

एक दशक में, देश अपने हैंडसेट का 75 प्रतिशत आयात करने की स्थिति से लगभग शून्य आयात की स्थिति में आ गया। मोबाइल प्रोडक्शन की वैल्यू 2014 में ₹18,900 करोड़ से बढ़कर 2024 में ₹4,22,000 करोड़ हो गई है। अकेले एपल के सप्लायर्स ने 2024 में भारत से 12.8 बिलियन डॉलर कीमत के आईफोन भेजे — जो एक साल में 42 प्रतिशत की बढ़ोतरी है।

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फॉक्सकॉन ने ₹9,100 करोड़ का निवेश किया, जो सरकार के अपने लक्ष्य से कहीं ज्यादा था। सितंबर 2025 तक, भारत ने अमेरिका को स्मार्टफोन एक्सपोर्ट करने के मामले में चीन को पीछे छोड़ दिया, जिसमें वॉल्यूम में 240 प्रतिशत की जबरदस्त बढ़ोतरी हुई।

ये असाधारण उपलब्धियां हैं लेकिन इंडस्ट्री के जानकारों के बीच एक आम होती जा रही बात के अनुसार, यह एक ‘खोखला उछाल’ है।

प्रोडक्शन मॉडल असल में सिर्फ फाइनल असेंबली का है जिसे इंडस्ट्री ‘बॉक्स-बिल्डिंग’ कहती है। भारत में फोन के पार्ट्स को जोड़ा (स्क्रू किया) जाता है, उनकी पैकेजिंग की जाती है और उन्हें भेजा जाता है। लेकिन हर डिवाइस का दिमाग ‘सेमीकंडक्टर चिपसेट’ कहीं और डिजाइन और बनाया जाता है।

पीएलआई स्कीम से 33 अरब डॉलर का निवेश आया है और सिर्फ 2025 की पहली छमाही में ही एपल का भारत से एक्सपोर्ट बढ़कर 4.4 अरब डॉलर हो गया है। लेकिन यह कामयाबी सिर्फ़ बड़ी कंपनियों तक ही सीमित है: सिर्फ फॉक्सकॉन, टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स और कुछ गिनी-चुनी कंपनियां ही तरक्क ी कर रही हैं। छोटी मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों को बंद पड़े प्लांट और बढ़ते नुकसान का सामना करना पड़ रहा है।

डिस्प्ले, कैमरा सेंसर, एडवांस्ड प्रिंटेड सर्किट बोर्ड: ये सभी आयात किए जाते हैं, और ज़्यादातर चीन से आते हैं। भारत में बने स्मार्टफोन की हर रुपये की वैल्यू में, असल में सिर्फ 23 पैसे की वैल्यू यहीं जोड़ी जाती है। बाकी हिस्सा विदेशी सप्लाई चेन का होता है।

लगभग 40 प्रतिशत इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट चीनी सप्लाई चेन से आते हैं, जिससे एक रणनीतिक कमजोरी पैदा होती है जिसे फाइनल असेंबली से नहीं छिपाया जा सकता।

पीएलआई स्कीम ने 33 बिलियन डॉलर का निवेश आकर्षित किया है और 2025 की पहली छमाही में ही एपल के भारत से एक्सपोर्ट को 4.4 बिलियन डॉलर तक पहुंचा दिया है लेकिन यह सफलता कुछ बड़ी कंपनियों तक ही सीमित है, सिर्फ़ फॉक्सकॉन, टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स और कुछ अन्य कंपनियां ही आगे बढ़ रही हैं।

India Mobile Boom: Box Building Success vs E-waste Crisis

छोटी मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों को बंद पड़े प्लांट और बढ़ते नुकसान का सामना करना पड़ रहा है। यह स्कीम औपचारिक रूप से मार्च में खत्म हो गई, जिससे यह जरूरी सवाल उठ खड़ा हुआ है कि अब इस इकोसिस्टम को क्या चीज बनाए रखेगी, क्योंकि सब्सिडी खत्म हो गई है और क्या भारत ‘बॉक्स-बिल्डर’ से एक असली टेक्नोलॉजी मैन्युफैक्चरर बन पाएगा। 2024-25 में भारत ने 38.56 अरब डॉलर के इलेक्ट्रॉनिक्स का एक्सपोर्ट किया, जबकि 36.8 अरब डॉलर के कंपोनेंट्स इम्पोर्ट किए। इससे होने वाला नेट फायदा असली तो है, लेकिन बहुत मामूली है और यह पूरी तरह से विदेशी सद्भावना और जियोपॉलिटिकल स्थिरता पर निर्भर है।

चीन पर अनकही निर्भरता

चीन के इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स के साथ भारत का रिश्ता उसकी मैन्युफैक्चरिंग महत्वाकांक्षा के केंद्र में एक ‘खुला रहस्य’ है। सभी इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट इम्पोर्ट का लगभग 40 प्रतिशत चीन से आता है और 16 प्रतिशत हांगकांग के रास्ते आता है। यह सिर्फ आर्थिक निर्भरता नहीं है, यह एक रणनीतिक कमजोरी भी है, ऐसे समय में जब बीजिंग ने पहले ही दिखा दिया है कि वह जरूरी सामानों के एक्सपोर्ट पर कंट्रोल का इस्तेमाल जियोपॉलिटिकल दबाव बनाने के लिए कर सकता है।

सरकार की इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (ईसीएमएस) और सेमीकॉन इंडिया प्रोग्राम घरेलू क्षमता बनाने की सच्ची कोशिशें हैं। भारत ने 2025 में सेमीकंडक्टर से जुड़े अपने पहले सात प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी लेकिन उन मंजूरियों की कुल वैल्यू 626 मिलियन डॉलर उस निवेश का एक छोटा सा हिस्सा है जो चीन, दक्षिण कोरिया या ताइवान ने दशकों में चिप बनाने में किया है।

इंडस्ट्री के जानकार साफ कहते हैं कि सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग के मामले में भारत कम से कम एक पीढ़ी पीछे है। इसकी बराबरी करने के लिए सिर्फ पैसे की ही नहीं, बल्कि दशकों के इंस्टीट्यूशनल ज्ञान, खास हुनर और ऐसे इंफ्रास्ट्रक्चर की ज़रूरत है जो अभी मौजूद ही नहीं है।

इंडस्ट्री के एनालिस्ट साफ कहते हैं,भारत सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग में कम से कम एक पीढ़ी पीछे है, और बराबरी करने के लिए सिर्फ़ पैसे की नहीं, बल्कि दशकों के इंस्टीट्यूशनल ज्ञान, खास टैलेंट और ऐसे इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत है जो अभी मौजूद ही नहीं है।

फेज़्ड मैन्युफैक्चरिंग प्रोग्राम ने आसान कंपोनेंट्स — जैसे बैटरी, चार्जर और प्रिंटेड सर्किट बोर्ड के मामले में अच्छे नतीजे दिए हैं, जो अब ज़्यादातर देश में ही बनते हैं लेकिन इनसे एडवांस डिस्प्ले, चिपसेट और कैमरा मॉड्यूल की ओर बढ़ना एक गुणात्मक छलांग है, न कि कोई सीधी प्रगति। हर कदम के लिए क्लीनरूम माहौल, सटीक ऑटोमेशन और सप्लायर इकोसिस्टम की जरूरत होती है, जिसे भारत अभी शुरू से बना रहा है।

ग्राहक परेशान

आम भारतीय ग्राहक के लिए, मैन्युफैक्चरिंग में तेजी से सस्ते डिवाइस और ज्यादा घरेलू नौकरियां मिली हैं और राष्ट्रीय तकनीकी गर्व की भावना भी बढ़ी है लेकिन इससे कुछ ऐसी लगातार परेशानियां भी आई हैं जिनकी चर्चा कम ही होती है।

भारत के बड़े शहरों में हर चार में से एक स्मार्टफोन मालिक खरीदने के छह महीने के अंदर सर्विस सेंटर जाता है, यह आंकड़ा क्वालिटी से जुड़ी उन समस्याओं को दिखाता है जिन्हें ब्रांड मार्केटिंग बहुत सावधानी से छिपाती है। टियर-1 शहरों के बाहर बिक्री के बाद की सर्विस की क्वालिटी तेजी से गिरती है, जिससे टियर-2 और टियर-3 शहरों के करोड़ों ग्राहक अनधिकृत रिपेयर शॉप्स पर निर्भर हो जाते हैं, जिनके पास अक्सर स्पेयर पार्ट्स, ट्रेंड टेक्नीशियन या जवाबदेही की कमी होती है।

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ग्रे और नकली सामान का बाजार एक गंभीर समस्या बना हुआ है। ऑनलाइन खरीदार अक्सर अनधिकृत रीसेलर्स से पहले से एक्टिवेट किए गए या छेड़छाड़ किए गए हैंडसेट मिलने की शिकायत करते हैं। नकली फोन जो घटिया पुर्जों से बने होते हैं और जिनसे आग लग सकती है या बिजली का झटका लग सकता है, अभी भी ग्रामीण और अर्ध-शहरी बाजारों में बिकते हैं। इन जगहों पर ग्राहकों की अधिकृत रिटेल चैनलों तक पहुंच सीमित होती है और उनके पास डिवाइस की असलियत जांचने के साधन भी कम होते हैं।

ई-वेस्ट की इमरजेंसी

अगर भारत की मैन्युफैक्चरिंग की कहानी ऐसी है जिसमें महत्वाकांक्षा इंफ्रास्ट्रक्चर से आगे निकल गई है, तो ई-वेस्ट की कहानी ऐसी है जिसमें पॉलिसी लागू करने (एनफोर्समेंट) से आगे निकल गई है और इसके नतीजे इंसानों पर बहुत बुरे पड़ते हैं।

भारत हर साल लगभग 2.3 मिलियन टन इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट पैदा करता है और चीन और अमेरिका के बाद दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ई-वेस्ट पैदा करने वाला देश है। छह साल में यह आंकड़ा 150 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ गया है और फिर भी, हर भरोसेमंद अनुमान के मुताबिक, इस कचरे का 90 से 95 प्रतिशत हिस्सा कभी भी लाइसेंस वाले रीसाइक्लर तक नहीं पहुंचता।

इसके बजाय, यह कबाड़ीवालों के नेटवर्क यानी हर भारतीय शहर की हर गली के कोने पर मौजूद अनौपचारिक स्क्रैप व्यापारियों के ज़रिए उन अनरेगुलेटेड वर्कशॉप तक पहुंचता है जहां असल में रीसाइक्लिंग होती है। इन वर्कशॉप में, सर्किट बोर्ड को एसिड बाथ में डुबोकर सोना निकाला जाता है। तांबा निकालने के लिए तारों को जलाया जाता है।

पुर्जों को हथौड़े से पीटकर अलग किया जाता है। मजदूर जिनमें से कई महिलाएं और बच्चे हैं बिना दस्ताने और बिना वेंटिलेशन के यह काम करते हैं, और उन्हें यह भी पता नहीं होता कि जहरीला धुआं और बचा हुआ कचरा उनके शरीर पर क्या असर डाल रहा है। दिल्ली में ई-वेस्ट क्लस्टर पर हुई स्टडीज़ से पता चलता है कि यहां नियमित रूप से काम करने वाले मजदूरों की औसत उम्र 27 साल से भी कम है। अनुमान है कि पूरे भारत में 10 से 15 साल की उम्र के 4,00,000 से 5,00,000 बच्चे खतरनाक ई-वेस्ट गतिविधियों में शामिल हैं।

ई-वेस्ट (मैनेजमेंट) रूल्स 2022 कागज पर तो एक व्यापक कानून है। इसमें रीसाइक्लिंग के बड़े लक्ष्य तय किए गए हैं, ‘एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी’ (ईपीआर) सिस्टम बनाया गया है जिसके तहत मैन्युफैक्चरर्स को अपने प्रोडक्ट्स के इस्तेमाल के बाद उनके निपटान (डिस्पोजल) के लिए फंड देना और हिसाब रखना जरूरी है और सर्टिफिकेट ट्रेडिंग के लिए सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (सीपीसीबी) का पोर्टल बनाया गया है।

2025-26 के लिए लक्ष्य यह है कि सारा ई-वेस्ट फॉर्मल चैनलों के जरिए प्रोसेस हो। असलियत यह है कि फॉर्मल चैनल सिर्फ 5 से 10 प्रतिशत कचरे को ही प्रोसेस करते हैं।

सर्टिफिकेट फ्रॉड जिसने सिस्टम की पोल खोल दी

पिछले दो सालों में सबसे चौंकाने वाली बात यह पता चली है कि फॉर्मल कंप्लायंस सिस्टम असल में एक दिखावा है। सीपीसीबी की ऑडिट में 7,00,000 नकली ईपीआर सर्टिफिकेट मिले, ऐसे कागज के टुकड़े जिनमें दावा किया गया था कि रीसाइक्लिंग हुई है, जबकि कई मामलों में ऐसा होना असल में नामुमकिन था। यह धोखाधड़ी इतनी बेबाक थी कि सर्टिफिकेट में रीसाइक्लिंग की मात्रा, उन्हें जारी करने वाले रीसाइक्लर की वेरिफाइड क्षमता से 38 गुना ज्यादा बताई गई थी।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने नोटिस जारी किए। जुर्माना भी लगाया गया। फिर भी, इंडस्ट्री बॉडीज लगातार चेतावनी दे रही हैं कि दिखावटी अनुपालन (फ़ैंटम कंप्लायंस) बड़े पैमाने पर जारी है; इसमें ‘घोस्ट’ रीसाइक्लिंग प्लांट सर्टिफिकेट तो हासिल कर लेते हैं, जबकि असल कचरा खुले मैदानों में जला दिया जाता है।

इस विफलता के आर्थिक नतीजे चौंकाने वाले हैं। अनुमान है कि भारत हर साल ₹80,000 करोड़ से ज्यादा कीमत की ज़रूरी धातुएं जैसे लिथियम, कोबाल्ट, सोना, तांबा, पैलेडियम गंवा देता है; ये धातुएं उन पुराने फोन और लैपटॉप में होती हैं जिन्हें गली-मोहल्लों की वर्कशॉप में जला दिया जाता है।

इस बीच, भारत अपनी जरूरत का 100 प्रतिशत लिथियम, कोबाल्ट और निकेल विदेशों से आयात करता है और उन खनिजों के लिए अरबों की विदेशी मुद्रा खर्च करता है जिन्हें वह खुद नष्ट भी कर रहा है। जरूरी खनिजों की रीसाइक्लिंग के लिए सरकार का 170 मिलियन डॉलर का प्रोग्राम और सितंबर 2025 में घोषित ₹1,500 करोड़ की ‘नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन’ इंसेंटिव स्कीम, इस बात को देर से समझने का नतीजा है कि ई-वेस्ट सिर्फ कचरा निपटाने की समस्या नहीं है, बल्कि यह संसाधनों की सुरक्षा से जुड़ी समस्या है।

आगे की चुनौती

2026 में भारत का मोबाइल फोन उद्योग एक अहम मोड़ पर खड़ा है। पीएलआई स्कीम ने अपने मकसद को पूरा किया है: निवेश लाना, असेंबली की क्षमता बढ़ाना और भारत को ग्लोबल स्मार्टफ़ोन सप्लाई चेन में एक भरोसेमंद खिलाड़ी बनाना। भारत पर एपल का दांव दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद रहा है। एक्सपोर्ट तेज़ी से बढ़ रहा है। फॉर्मल सेक्टर में रोजगार बढ़ रहा है।

लेकिन सफर के अगले चरण में कुछ कड़वी सच्चाइयों का सामना करना होगा। ऐसा मैन्युफ़ैक्चरिंग इकोसिस्टम जो घरेलू स्तर पर सिर्फ 23 प्रतिशत वैल्यू जोड़ता है, वह असल में आत्मनिर्भर नहीं है।

एक ऐसा रीसाइक्लिंग सिस्टम जहां 95 प्रतिशत कचरे का निपटान अनौपचारिक रूप से होता है, जहाँ कंप्लायंस सर्टिफिकेट अक्सर फर्जी बनाए जाते हैं और जहां जहरीली वर्कशॉप में बच्चे कम उम्र में ही मर जाते हैं, वह सर्कुलर इकॉनमी नहीं है, यह एक सर्कुलर विफलता है।

और एक ऐसा कंज्यूमर मार्केट जहां चार में से एक खरीदार खरीदारी के कुछ महीनों के भीतर ही सर्विस सेंटर जाता है, जहां नकली फोन से अभी भी आग लगने और बिजली का झटका लगने की घटनाएं होती हैं, और जहां ‘राइट टू रिपेयर’ (मरम्मत का अधिकार) सिर्फ एक पॉलिसी की इच्छा बनकर रह गया है, वह एक परिपक्व बाजार नहीं है, यह अभी भी अपने रेगुलेटरी ढांचे को मजबूत कर रहा है।

अच्छी बात यह है कि असली तरक्क ी के लिए जरूरी चीजें मौजूद हैं। कबाड़ीवाला नेटवर्क को अपराधी मानने के बजाय, उन्हें रजिस्टर्ड एग्रीगेटर के तौर पर फॉर्मल बनाया जा सकता है जिससे अनौपचारिक वर्कर सुरक्षा, उचित वेतन और कानूनी जवाबदेही वाले सिस्टम का हिस्सा बन सकें।
अगर सही तरीके से व्यवस्थित किया जाए, तो अर्बन माइनिंग भारत की जरूरी मिनरल की जरूरतों को पूरा कर सकती है और साथ ही लाखों फॉर्मल नौकरियां भी पैदा कर सकती है।

अगर सेमीकंडक्टर मिशन सफल होता है, तो कंपोनेंट के लोकल स्तर पर उत्पादन को और बढ़ाने से भारत आखिरकार सिर्फ ‘बॉक्स-बिल्डर’ (असेंबलर) से हटकर एक असली टेक्नोलॉजी मैन्युफैक्चरर बन सकता है।

भारत ने साबित कर दिया है कि वह फैक्टरियां बना सकता है। ज्यादा मुश्किल सवाल यह है कि क्या वह ऐसी संस्थाएं, एनफोर्समेंट और राजनीतिक इच्छाशक्ति बना सकता है जो मैन्युफैक्चरिंग को सचमुच टिकाऊ बना सकें और 2026 भारत को इसी सवाल का जवाब देने के लिए मजबूर करेगा।

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