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खाना पकाने के लिए ईंधन नहीं? एटीएम जाएं

किचन में इस्तेमाल होने वाले एथेनॉल के लिए जल्द आ रहीं रिटेल वेंडिंग मशीनें

by ब्लिट्ज़ इंडिया
August 10, 2026
in ऊर्जा
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एथेनॉल का इस्तेमाल

ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।भारत की एथेनॉल कहानी एक नए दौर में प्रवेश कर रही है। एक दशक से ज़्यादा समय से, ध्यान पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने और आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने पर था। आज, नीति निर्माता फ्यूल टैंक से कहीं आगे की सोच रहे हैं। मीडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, सरकार एथेनॉल को मुख्यधारा के खाना पकाने के ईंधन के रूप में पेश करने के लिए एक फ्रेमवर्क पर काम कर रही है और एक ऐसे रिटेल मॉडल पर भी विचार कर रही है जहां उपभोक्ता किचन स्टोव में इस्तेमाल के लिए खास ‘एथेनॉल एटीएम’ के ज़रिए कैनिस्टर में एथेनॉल खरीद सकें। यह प्रस्ताव भविष्य की बात लग सकता है, लेकिन यह भारत की बायोफ्यूल रणनीति में हो रहे बड़े बदलाव की ओर इशारा करता है।

भारत ने तय समय से पहले ही पूरे देश में ई20 को लागू कर दिया है। अब एथेनॉल के नए इस्तेमाल की खोज तेज हो रही है। खाना पकाने का ईंन्धन, फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियांं, सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल और एक्सपोर्ट, ये सभी प्राथमिकता की सूची में ऊपर आ रहे हैं।

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इन सभी पहलों के पीछे यह तथ्य है कि भारत ने एक ऐसा एथेनॉल उत्पादन इकोसिस्टम बनाया है जो इसे खपाने के लिए वर्तमान में उपलब्ध मांग से बड़ा होता जा रहा है। निकट भविष्य में मांग तेजी से बढ़ने की भी उम्मीद है।

सफलता और चुनौती
एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम मोदी सरकार द्वारा शुरू की गई सबसे महत्वाकांक्षी ऊर्जा पहलों में से एक रहा है। पेट्रोल में एथेनॉल ब्लेंडिंग एक दशक पहले के मुश्किल से 1.5 प्रतिशत से बढ़कर 20 प्रतिशत हो गई है, जिससे कच्चे तेल के आयात को कम करने, किसानों की आय में सुधार करने और एक बड़ा घरेलू बायोफ्यूल उद्योग बनाने में मदद मिली है। भारत ने तय समय से कई साल पहले ई20 लक्ष्य हासिल कर लिया और पहले से ही बायोफ्यूल अपनाने के अगले चरण पर चर्चा कर रहा है। 2014-15 के बाद से, एथेनॉल ब्लेंडिंग ने विदेशी मुद्रा में 1.4 लाख करोड़ रुपये से अधिक की बचत करने में मदद की है, साथ ही किसानों और डिस्टिलरी के लिए अतिरिक्त आय भी पैदा की है।

एथेनॉल का इस्तेमाल

उद्योग ने इन नीतिगत संकेतों पर भारी निवेश के साथ प्रतिक्रिया दी। चीनी मिलों ने डिस्टिलेशन क्षमता का विस्तार किया। अनाज आधारित एथेनॉल उत्पादक आक्रामक रूप से बाजार में उतरे। उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और कई अन्य राज्यों में नई परियोजनाएं शुरू हुईं ं। नतीजा यह है कि भारत को अब एथेनॉल क्षमता की अधिकता (ओवरहैंग) का सामना करना पड़ सकता है।

इस्तेमाल का इंतजार
खाना पकाने के ईंन्धन के तौर पर एथेनॉल को बढ़ावा देने की बात क्षमता के नज़रिए से देखें तो ज़्यादा समझ में आती है। केयर एज रेटिंग्स की मई की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की एथेनॉल उत्पादन क्षमता सालाना 20 अरब लीटर से ज्यादा हो चुकी है। चालू वित्त वर्ष में 4 अरब लीटर की और क्षमता जुड़ने की उम्मीद है, जिससे कुल क्षमता लगभग 24 अरब लीटर हो जाएगी।

इसके मुकाबले, सरकार के ई20 ब्लेंडिंग प्रोग्राम में सालाना लगभग 11 अरब लीटर एथेनॉल की खपत होती है। शराब, दवा और केमिकल बनाने वाली कंपनियां भी 3 से 3.5 अरब लीटर की मांग करती हैं। इसके बाद भी लगभग 7 अरब लीटर क्षमता बिना इस्तेमाल के रह जाती है। इंडस्ट्री के अधिकारी नेपाल, बांग्लादेश और इंडोनेशिया जैसे देशों में निर्यात के मौकों पर भी विचार कर रहे हैं, जहां ब्लेंडिंग के लक्ष्य तो हैं लेकिन घरेलू उत्पादन क्षमता कम है।

सच तो यह है कि भारत में एथेनॉल की बहुत ज़्यादा अधिकता नहीं है। यहां ऐसी डिस्टिलरी और निवेश मौजूद हैं जो मौजूदा बाज़ार की जरूरत से कहीं ज़्यादा एथेनॉल पैदा कर सकते हैं। इसीलिए अब बातचीत ब्लेंडिंग लक्ष्यों से हटकर खपत लक्ष्यों पर आ गई है। इससे पहले मीडिया ने रिपोर्ट दी थी कि ई20 प्रोग्राम के तहत बढ़ती मांग की तुलना में डिस्टिलरी क्षमता बहुत तेज़ी से बढ़ रही थी। ब्लेंडिंग की सीमा को 20 प्रतिशत से ज़्यादा बढ़ाने पर बातचीत धीमी गति से चल रही है, इसलिए प्रोड्यूसर और पॉलिसी बनाने वाले पेट्रोल से आगे की सोच रहे हैं।

किचन बन सकता है मददगार
खाना पकाने के ईंन्धन के तौर पर इस्तेमाल का प्रस्ताव एथेनॉल के लिए मांग का एक बहुत बड़ा नया ज़रिया बन सकता है। भारत घरेलू खाना पकाने के लिए एलपीजी पर बहुत ज्यादा निर्भर है। हालांकि घरेलू उत्पादन बढ़ा है, फिर भी मांग का एक बड़ा हिस्सा आयात से पूरा होता है। ग्लोबल एनर्जी की कीमतों में हर उछाल का असर देश के आयात बिल और सरकार की सब्सिडी की गणना पर पड़ता है।

नीति बनाने वालों के नज़रिए से एथेनॉल एक आकर्षक विकल्प है। इसका उत्पादन देश में ही होता है और यह किसानों और ग्रामीण उद्योगों को सहारा देता है। इससे आयातित ईंन्धन पर निर्भरता कम होती है। इसे पूरी तरह से एलपीजी सिलेंडरों पर निर्भर रहने के बजाय, एक विकेंद्रीकृत रिटेल मॉडल के जरिए भी बांटा जा सकता है।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, नीति निर्माता खास डिस्पेंसिंग पॉइंट या एथेनॉल एटीएम पर विचार कर रहे हैं, जहां ग्राहक खास तौर पर डिजाइन किए गए कुकिंग स्टोव के लिए अपने कैनिस्टर रिफिल कर सकें। ऐसा सिस्टम एथेनॉल के लिए एक बिल्कुल नया रिटेल इकोसिस्टम बनाएगा। भले ही शुरुआत में इसका इस्तेमाल सीमित रहे, लेकिन इसकी अहमियत कहीं ज्यादा है। यह प्रस्ताव दिखाता है कि एथेनॉल को अब सिर्फ पेट्रोल में मिलाने वाले एजेंट के तौर पर नहीं देखा जा रहा है। इसे एक स्वतंत्र ऊर्जा स्रोत के तौर पर पेश किया जा रहा है।

एक्सपोर्ट भी एक और जरिया
घरेलू खपत ही एकमात्र समाधान नहीं है जिस पर विचार किया जा रहा है। भारत पड़ोसी देशों को एथेनॉल एक्सपोर्ट करने पर तेज़ी से विचार कर रहा है, जहां ब्लेंडिंग के नियम तो हैं लेकिन पर्याप्त फीडस्टॉक या डिस्टिलेशन क्षमता नहीं है। नेपाल, बांग्लादेश और इंडोनेशिया संभावित बाजार के तौर पर उभरे हैं। जिस देश को कुछ समय पहले तक एथेनॉल की कमी की चिंता थी, उसके लिए क्षेत्रीय एथेनॉल सप्लायर बनने का विचार एक बड़ा बदलाव है।
एक्सपोर्ट का विकल्प इसलिए भी अहम होता जा रहा है क्योंकि एथेनॉल वैल्यू चेन में पहले ही बड़ा निवेश किया जा चुका है। तेज़ी से बढ़ते ब्लेंडिंग प्रोग्राम के लिए बनाई गई डिस्टिलरीज को अब इस बात का भरोसा चाहिए कि मांग बढ़ती रहेगी।

एविएशन हो सकता है अगला बड़ा क्षेत्र
खाना पकाने का ईंन्धन भले ही सबसे नया विचार हो, लेकिन एविएशन आखिरकार भारतीय एथेनॉल के लिए सबसे अहम नए बाज़ारों में से एक बन सकता है। इस साल अप्रैल में, सरकार ने एविएशन फ्यूल के नियमों में बदलाव किया ताकि पारंपरिक एविएशन टर्बाइन फ्यूल के साथ सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (एसएएफ) को मिलाया जा सके। सरकार ने एक रोडमैप को भी मंज़ूरी दी है, जिसके तहत 2027 तक इंटरनेशनल उड़ानों में 1% एसएएफ मिलाने, 2028 में इसे बढ़ाकर 2% करने और 2030 तक 5% करने का लक्ष्य रखा गया है। यह कदम एविएशन से होने वाले उत्सर्जन को कम करने और घरेलू एसएएफ इंडस्ट्री बनाने की भारत की कोशिश का हिस्सा है। एथेनॉल इंडस्ट्री के लिए यह बात इसलिए अहम है क्योंकि कई कंपनियां इसके प्रोडक्शन के तरीके को अपना रही हैं। सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल बनाने के पहचाने गए तरीकों में से एक है ‘अल्कोहल-टू-जेट’ प्रोसेस, जो एथेनॉल को जेट फ्यूल में बदलता है। दूसरे शब्दों में, एथेनॉल को अब सिर्फ़ ट्रांसपोर्ट फ्यूल में मिलाने वाली चीज़ के तौर पर नहीं देखा जा रहा है। इसे तेज़ी से एक बिल्कुल नई कैटेगरी के फ्यूल के लिए रॉ मैटीरियल (फीडस्टॉक) के तौर पर पेश किया जा रहा है।

इंडस्ट्री ने इस सोच के आधार पर निवेश करना शुरू भी कर दिया है। भारत का पहला इथेनॉल-टू-जेट फ्यूल प्लांट एनटीपीसी ग्रीन एनर्जी और जीपीएस रिन्यूएबल्स द्वारा विशाखापत्तनम के पास बनाया जा रहा है। उम्मीद है कि यह प्लांट इथेनॉल-बेस्ड टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके हर साल लगभग 1,800 टन सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल का प्रोडक्शन करेगा।

भारत ने तय समय से पहले ही पूरे देश में ई20 लागू कर दिया है। फिर भी, इसकी रफ्तार कम होने के बजाय, एथेनॉल के नए इस्तेमाल की खोज तेज हो रही है। खाना पकाने का ईंधन, फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियां, सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल और एक्सपोर्ट, ये सभी प्राथमिकता की सूची में ऊपर आ रहे हैं।

पॉलिसी बनाने वालों के लिए, एसएएफ कुछ ऐसा देता है जो पेट्रोल ब्लेंडिंग और खाना पकाने वाले फ्यूल से नहीं मिलता। दुनिया भर की एयरलाइंस पर एमिशन कम करने का दबाव बढ़ रहा है और वे सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल के लिए ज़्यादा कीमत चुकाने को तैयार हैं। अगर एथेनॉल बड़े पैमाने पर एविएशन सेक्टर में जगह बना पाता है, तो यह प्रोड्यूसर्स के लिए एक हाई-वैल्यू मार्केट बना सकता है, खासकर ऐसे समय में जब घरेलू क्षमता मांग से ज़्यादा है।

कैफे -III से शुरू होगा अगला चरण
सरकार के हाल ही में जारी किए गए ड्राफ्ट ‘कॉर्पोरेट एवरेज फ्यूल एफिशिएंसी’ (कैफे)-III नॉर्म्स पॉलिसी की दिशा के बारे में एक और संकेत देते हैं। पहली बार, इस फ्रेमवर्क में एथेनॉल और दूसरे बायोफ्यूल से जुड़े इंसेंटिव का प्रस्ताव दिया गया है। आम तौर पर, फ्यूल-एफिशिएंसी नॉर्म्स पर चर्चा इलेक्टि्रक वाहनों के इर्द-गिर्द होती रही है। ताज़ा प्रस्ताव बताते हैं कि पॉलिसी बनाने वाले एक बड़े इकोसिस्टम को बनाने में ज़्यादा दिलचस्पी ले रहे हैं, जिसमें इथेनॉल, फ्लेक्स-फ्यूल वाहन और दूसरे बायोफ्यूल बड़ी भूमिका निभाएं।

इस बदलाव के महत्व को कम करके नहीं आंका जाना चाहिए। एक बार जब ई20 हकीकत बन गया, तो अगली चुनौती हमेशा मांग पैदा करने की ही होनी थी। कैफे-III को कम से कम कुछ हद तक इस तरह डिजाइन किया गया है कि भविष्य की वाहन टेक्नोलॉजी ज़्यादा एथेनॉल का इस्तेमाल कर सकें।

चीनी पॉलिसी से एनर्जी स्ट्रैटेजी तक
शायद सबसे अहम बात यह है कि एथेनॉल अब सिर्फ़ चीनी इंडस्ट्री का बाई-प्रोडक्ट नहीं रह गया है। अनाज-आधारित एथेनॉल का तेज़ी से विस्तार हुआ है और मक्क ा एक प्रमुख फीडस्टॉक के तौर पर उभरा है। इंडस्ट्री के आंकड़ों के मुताबिक, अब एथेनॉल की ज़्यादातर सप्लाई अनाज-आधारित स्रोतों से होती है। एथेनॉल इकोसिस्टम में अब पारंपरिक चीनी मिलों के साथ-साथ अनाज प्रोसेसर्स, डिस्टिलरी, टेक्नोलॉजी प्रोवाइडर्स और फ्यूल रिटेलर्स भी शामिल हो रहे हैं। गन्ने से हटकर दूसरे विकल्पों की ओर बढ़ने से पर्यावरण संबंधी चिंताएं भी कम हो सकती हैं।

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