नई दिल्ली, 28 अक्टूबर।गांव के जिस घर में पहले एक ही आदमी कमाता था, वहां अब अक्सर दो लोग कमाते हैं। गरीबी घटने की बड़ी वजह यही रही है। विश्व बैंक की अक्टूबर 2026 की इंडिया पॉवर्टी एंड इक्विटी ब्रीफ के मुताबिक, रोज 3 डॉलर से कम पर गुजारा करने वाले लोग 2011 में 27.1 फीसदी थे। 2023 में यह हिस्सा घटकर 2.6 फीसदी रह गया।
विश्व बैंक की नई रिपोर्ट कहती है कि देश में बेहद गरीबी अब सौ में तीन से भी कम लोगों तक सिमट गई है। पर गांव, पूरब के राज्य और लोगों की असल कमाई — यहां रास्ता अभी लंबा है।
यहां डॉलर बाजार भाव से नहीं, खरीदने की ताकत के हिसाब से गिना गया है। अगली रेखा 4.20 डॉलर रोज की है। इस पर गरीबी 57.7 फीसदी से घटकर 16.1 फीसदी पर आ गई। बैंक का अनुमान है कि इन 12 बरसों में 49.6 करोड़ लोग गरीबी से बाहर निकले।
गांव और पूरब में ज्यादा गरीबी
4.20 डॉलर की रेखा पर गांव में गरीबी 19.3 फीसदी है और शहर में 8.6 फीसदी। हमारे हिसाब से गांव में रहने वाले के गरीब होने की आशंका शहर वाले से 2.24 गुना है।
सबसे बड़ी बात इलाके की है। रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश से पश्चिम बंगाल तक फैली एक लगातार पट्टी में देश के करीब 57 फीसदी गरीब रहते हैं। महिलाओं में गरीबी 16.6 फीसदी है, पुरुषों में 15.7 फीसदी।
नीति आयोग का आंकड़ा भी इसी ओर इशारा करता है। उसके 15 जनवरी 2024 के चर्चा-पत्र के मुताबिक 2013-14 से 2022-23 के बीच 24.82 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर आए। इनमें अकेले उत्तर प्रदेश के 5.94 करोड़ थे। हमारे हिसाब से यह करीब 24 फीसदी है, किसी भी राज्य से ज्यादा। यानी जिस राज्य से सबसे ज्यादा लोग गरीबी से निकले, उसी के आसपास सबसे ज्यादा गरीब अब भी बाकी हैं।
कमाने वाले बढ़े, कमाई नहीं
2017 से 2023 के बीच देश में रोजगार करीब 13.4 करोड़ बढ़ा। यह कामकाजी उम्र की आबादी की बढ़त से करीब दोगुना है। रिपोर्ट कहती है कि इसका बड़ा हिस्सा गांव की उन महिलाओं से आया जो कमाई के काम में उतरीं।
पर दूसरी तस्वीर भी है। महंगाई घटाकर देखें तो लोगों की असल कमाई लगभग वहीं की वहीं रही। ज्यादातर नए काम कम उत्पादकता वाले थे। युवाओं में बेरोजगारी 2025-26 की पहली तिमाही के 14.6 फीसदी से बढ़कर 2026-27 की पहली तिमाही में 15.9 फीसदी हो गई। गांव की युवतियों में यह बढ़त सबसे ज्यादा दिखी।
सीधी बात यह है कि बहुत से परिवार घर में एक और कमाने वाला जोड़कर गरीबी से निकले, घंटे की कमाई बढ़ाकर नहीं। इस रास्ते की एक हद है। किसी घर में कमाने वाले एक सीमा तक ही बढ़ सकते हैं।
अगली सीढ़ी ऊंची है
रिपोर्ट में तीसरी रेखा 8.30 डॉलर रोज की है। यह ऊपरी-मध्यम आय वाले देशों का पैमाना है। 2023 में देश के 80 फीसदी लोग इस रेखा से नीचे थे। सबसे निचली सीढ़ी लगभग खाली हो चुकी है, पर अगली सीढ़ी अभी ज्यादातर लोगों की पहुंच से दूर है।
बैंक का अनुमान है कि 4.20 डॉलर वाली गरीबी 2026 के 14.2 फीसदी से घटकर 2028 में 12.1 फीसदी होगी। हमारा हिसाब कहता है कि 2011 से 2023 तक यह हर साल औसतन 3.47 अंक घटी। अनुमान में यह रफ्तार करीब 1.05 अंक सालाना है, यानी पहले की एक तिहाई से भी कम।
रिपोर्ट खुद मानती है कि सर्वे अमीर घरों का खर्च पूरा नहीं पकड़ पाते, इसलिए असमानता असल से कम दिखती है। ऊपर के 10 फीसदी कामगारों की बीच की कमाई नीचे के 10 फीसदी से करीब 13 गुना है।
भारत को इससे यह मिला है कि बेहद गरीबी अब देश में अपवाद बन गई है। अब नीति का अगला निशाना सिर्फ गुजारा नहीं, हर घंटे के काम की बेहतर कमाई हो सकती है।
ब्लिट्ज की सलाह
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) हर उपभोग खर्च सर्वे के साथ राज्यवार गरीबी के आंकड़े और तरीके में हुए बदलाव का नोट जारी कर सकता है। इससे पता चलेगा कि सुधार का कितना हिस्सा बेहतर नाप-जोख से आया और कितना असल खुशहाली से।
श्रम एवं रोजगार मंत्रालय और एनएसओ
पीएलएफएस सर्वे में हर तिमाही क्षेत्रवार असल कमाई का सूचकांक जोड़ सकते हैं। तब सिर्फ कामगारों की गिनती नहीं, हर कामगार की कमाई भी देश का तय लक्ष्य बनेगी।
नीति आयोग का आकांक्षी ब्लॉक कार्यक्रम 329 जिलों के 513 ब्लॉक में चल रहा है। उसके अगले संपूर्णता अभियान में अभी पोषण, आंगनबाड़ी, स्कूल के शौचालय और पशु टीकाकरण के पैमाने हैं। उत्तर प्रदेश से पश्चिम बंगाल वाली पट्टी के ब्लॉकों में रोजी-रोटी और कमाई के पैमाने भी जोड़े जा सकते हैं।
वाराणसी में हजार नौकरियां, ज्यादातर महिलाओं को
नई दिल्ली, 28 अक्टूबर।पूर्वांचल की महिलाओं के लिए अब घर के पास फैक्टरी की नियमित नौकरी का रास्ता खुला है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 25 अक्टूबर 2026 को वाराणसी में अरविंद लिमिटेड की गारमेंट यूनिट का उद्घाटन किया। कंपनी ने उसी दिन नेशनल स्टॉक एक्सचेंज को भेजी जानकारी में बताया कि यहां 1,000 से ज्यादा लोगों को काम मिलने की उम्मीद है, और इनमें ज्यादातर महिलाएं होंगी।
अरविंद लिमिटेड की उत्तर प्रदेश में पहली फैक्टरी उसी इलाके में खुली है जहां देश के सबसे ज्यादा गरीब रहते हैं। यहां बने कपड़े यूरोप और ब्रिटेन के बाजार में जाएंगे।
यूनिट पर करीब 150 करोड़ रुपये लगे हैं। कंपनी के मुताबिक इससे 250 करोड़ रुपये तक की बिक्री हो सकती है। यह अरविंद की उत्तर प्रदेश में पहली फैक्टरी है। यहां ऑटोमैटिक मशीनों पर रोजमर्रा के बुने हुए कपड़े (निटवियर) बनेंगे। कपड़ा कंपनी की अपनी मिलों से आएगा। कामगारों के रहने के लिए हॉस्टल भी बनाए गए हैं।
हमारे हिसाब से यहां हर नौकरी पर करीब 15 लाख रुपये का निवेश हुआ है। कंपनी का कहना है कि यहां बना माल यूरोप और ब्रिटेन के उन बाजारों में जाएगा जो भारत के हाल के व्यापार समझौतों से खुले हैं। उद्घाटन में राज्यपाल आनंदीबेन पटेल और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी मौजूद थे।
भारत को इससे पूर्वी उत्तर प्रदेश में एक हजार से ज्यादा फैक्टरी नौकरियां मिलेंगी, ज्यादातर महिलाओं के लिए, और वह भी निर्यात के लिए बनने वाले माल में।
ब्लिट्ज की सलाह
ग्रामीण विकास विभाग और उत्तर प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन मिलकर काम कर सकते हैं। दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्य योजना के अगले बैच वाराणसी और आसपास के जिलों में इस यूनिट की भर्ती से जोड़े जा सकते हैं। तब प्रशिक्षण पाने वाले सीधे पहले से मौजूद नौकरी तक पहुंचेंगे।
छोटे शहरों से आधे स्टार्टअप
नई दिल्ली, 28 अक्टूबर। देश में नए स्टार्टअप अब बड़े महानगरों के भरोसे नहीं हैं। विज्ञान और प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने सितंबर में कहा था कि 50 से 60 फीसदी स्टार्टअप अब छोटे शहरों से आ रहे हैं। 2014 में देश में करीब 350-400 स्टार्टअप थे, अब इनकी गिनती 2.3 लाख से ज्यादा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 27 अक्टूबर को नई दिल्ली में इमर्जिंग साइंस, टेक्नोलॉजी एंड इनोवेशन कॉन्क्लेव (ईएसटीआईसी) 2026 का उद्घाटन किया। प्रधानमंत्री कार्यालय के मुताबिक उन्होंने कहा कि विज्ञान की असली कामयाबी तब है जब वह लैब से निकलकर आम नागरिक की जिंदगी बेहतर करे। उन्होंने बताया कि बाजार के लिए तैयार तकनीकों में सरकार ने 12,000 करोड़ रुपये लगाए और निजी निवेशकों ने भी इतने ही। देश में हर साल के पेटेंट आवेदन दस साल पहले के 50,000 से कम से बढ़कर करीब 1.5 लाख हो गए हैं। भारत को इससे यह मिला है कि नए काम-धंधे अब छोटे शहरों में भी पैदा हो रहे हैं।
कलपक्कम रिएक्टर से थोरियम की राह
नई दिल्ली, 28 अक्टूबर।तमिलनाडु के कलपक्कम में 500 मेगावाट का प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (पीएफबीआर) बना है। यह जितना ईंधन जलाता है, उससे ज्यादा बना देता है। परमाणु ऊर्जा विभाग की 7 अप्रैल 2026 की विज्ञप्ति के मुताबिक यह 6 अप्रैल 2026 की रात 8:25 बजे पहली बार क्रिटिकल हुआ। प्रधानमंत्री ने 27 अक्टूबर को ईएसटीआईसी में देश की हाल की वैज्ञानिक कामयाबियों में सबसे पहले इसी का नाम लिया।
प्रधानमंत्री ने ईएसटीआईसी में इसका जिक्र किया। जानिए यह रिएक्टर क्या करता है, और अभी क्या नहीं करता।
क्रिटिकल होने का मतलब
क्रिटिकल होने का मतलब है कि रिएक्टर में परमाणु टूटने का नियंत्रित सिलसिला अपने आप चलने लगा। यह रिएक्टर के काम की शुरुआत है, ग्रिड को बिजली देने की नहीं। विभाग के बयान में पूरी क्षमता या ग्रिड से जुड़ने की तारीख नहीं दी गई है।
इसका डिजाइन विभाग की प्रयोगशाला इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र ने देश में ही तैयार किया। इसे विभाग की सरकारी कंपनी भारतीय नाभिकीय विद्युत निगम लिमिटेड (भाविनी) ने बनाया और चालू किया। परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड ने सुरक्षा जांच के बाद इसकी मंजूरी दी।
ईंधन कैसे बढ़ता है
रिएक्टर के बीच में यूरेनियम और प्लूटोनियम का मिला-जुला ईंधन जलता है। उसके चारों ओर यूरेनियम-238 की परत है, जिसे आम रिएक्टर ईंधन की तरह नहीं जला पाते। तेज न्यूट्रॉन इसके एक हिस्से को प्लूटोनियम-239 में बदल देते हैं, जो ईंधन बन जाता है।
आगे चलकर इस परत में थोरियम-232 रखा जाएगा। वह यूरेनियम-233 में बदलेगा, जो देश के परमाणु कार्यक्रम के तीसरे चरण का ईंधन है। विभाग फास्ट ब्रीडर को आज के रिएक्टरों और भविष्य के थोरियम रिएक्टरों के बीच का पुल बताता है।
बयान से यह पता नहीं चलता कि रिएक्टर पूरी क्षमता पर कब पहुंचेगा, थोरियम कब डाला जाएगा, और अगला ब्रीडर कब बनेगा। भारत को इससे अपने यूरेनियम को लंबा चलाने और आगे थोरियम से बिजली बनाने का अपना रास्ता मिला है।
ब्लिट्ज की सलाह
परमाणु ऊर्जा विभाग पीएफबीआर के अगले पड़ाव — पूरी क्षमता, ग्रिड से जुड़ना और व्यावसायिक बिजली — की तारीखें और आगे के फास्ट रिएक्टरों की योजना जारी कर सकता है। इससे देश के उपकरण बनाने वाले समय रहते तैयारी कर सकेंगे।
हुनर सीखा, पर हर तीसरे का प्लेसमेंट नहीं
नई दिल्ली, 28 अक्टूबर। गांव के जिन युवाओं ने सरकारी योजना में हुनर सीखा, उनमें से हर तीसरे को योजना के जरिए नौकरी नहीं मिली। दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना (डीडीयू-जीकेवाई) में मार्च 2026 तक 18 लाख युवाओं को प्रशिक्षण मिला और 12 लाख को नौकरी। हमारे हिसाब से यह 67 फीसदी है, यानी छह लाख का प्लेसमेंट नहीं हुआ।
संसद की समिति ने गांव के युवाओं की ट्रेनिंग योजनाओं की पड़ताल की। जिन राज्यों को उसने पिछड़ा बताया, वहीं देश के ज्यादातर गरीब रहते हैं।
ये आंकड़े ग्रामीण विकास और पंचायती राज की संसदीय स्थायी समिति की 40वीं रिपोर्ट “ग्रामीण कौशल और पलायन” के हैं। इसे 11 अगस्त 2026 को लोकसभा में रखा गया। आंकड़े पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के सार से लिए गए हैं।
कहां अटकती है बात
समिति के अध्यक्ष सप्तगिरि शंकर उलाका हैं। समिति ने कहा कि नौकरी लगने के बाद तनख्वाह कम होने से युवा काम छोड़ देते हैं और मजबूरी में दूसरे राज्यों में पलायन करते हैं। स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान (आरसेटी) मई 2026 तक 623 जिलों में 636 चल रहे थे। समिति ने इन्हें नाकाफी बताया और कहा कि ट्रेनिंग अक्सर गांव से दूर होती है।
महिलाएं कम आ पाती हैं, क्योंकि केंद्र दूर हैं, सुरक्षा की चिंता है और बच्चों की देखभाल का इंतजाम नहीं है। समिति ने बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और पूर्वोत्तर को पिछड़े राज्यों में गिना। विश्व बैंक की अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक देश के करीब 57 फीसदी गरीब इसी पट्टी में रहते हैं। यानी ट्रेनिंग वहीं सबसे कमजोर है, जहां इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है।
मंत्रालय का जवाब डेस्क को नहीं मिल सका। भारत को इससे यह मिल सकता है कि गांव के प्रशिक्षित युवा घर के पास ही कमाएं, मजबूरी में पलायन न करें।
ब्लिट्ज की सलाह
शुरुआत समिति की अपनी सिफारिशों से हो। उद्योगों से जुड़ाव के साथ लगभग हर प्रशिक्षित का प्लेसमेंट हो, और नौकरी लगने के बाद भी मदद मिले। हर जिले में चालू आरसेटी और ब्लॉक स्तर पर उप-केंद्र हों।
महिलाओं के लिए अलग बैच, चलती-फिरती ट्रेनिंग और क्रेच हों। ग्रामीण विकास विभाग हर तिमाही राज्यवार प्लेसमेंट और 12 महीने तक नौकरी में टिके रहने के आंकड़े जारी कर सकता है।














