नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि घरेलू हिंसा और यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाओं का चुप रहना कोई अपवाद नहीं, बल्कि सामान्य बात है।
महिला द्वारा अपने जीवनसाथी या परिवार के खिलाफ शारीरिक या यौन शोषण की तुरंत शिकायत न कर पाना उसकी गवाही पर संदेह का आधार नहीं हो सकता।
छह साल की सौतेली बेटी का बार-बार यौन शोषण करने और उसकी हत्या के दोषी की याचिका पर सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने ये टिप्पणियां कीं।
दोषी व्यक्ति की दलील थी कि उसे अपनी पत्नी की गवाही के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती, जिसने इस अपराध के बारे में लंबे समय तक चुप्पी साध रखी थी।
हालांकि पीठ ने दोषी की मौत की सजा को उम्रकैद (जीवन भर जेल में रहने) की सजा में बदल दिया। उसने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर पीठ के नवंबर 2019 के फैसले को शीर्ष अदालत में चुनौती दी थी। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने उसकी दोषसिद्धि और मौत की सजा को बरकरार रखा था।
सुप्रीम कोर्ट ने 157 पन्नों के फैसले में कहा कि घटना की एकमात्र चश्मदीद गवाह पीड़िता की मां थी। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने कहा, घर में होने वाले शोषण की सच्चाई समझने वाली अदालत को इस चाल के प्रति सावधान रहना चाहिए और सुनिश्चित करना चाहिए कि शोषण करने वाले व्यक्ति को हिंसा की शिकार महिला की मजबूरियों का फायदा न मिल पाए।
पीठ ने गौर किया कि 2019 से 2021 के बीच किए गए पांचवें राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) के अनुसार भारत में 18 से 49 वर्ष आयुवर्ग की लगभग 29.3 प्रतिशत विवाहित महिलाओं ने पति द्वारा शारीरिक या यौन हिंसा झेलने की बात कही थी।
जिन महिलाओं ने इस तरह की हिंसा का सामना किया था, उनमें से लगभग तीन-चौथाई महिलाओं ने कभी किसी से मदद नहीं मांगी।
शीर्ष अदालत ने कहा, सर्वेक्षण के आंकड़े साबित करते हैं कि शोषण के बाद महिलाओं का चुप रहना आम बात है। घटना की शिकायत न करना भी ऐसी असामान्य बात नहीं है, जिस पर शक किया जाए।
अपीलकर्ता ने तर्क दिया था कि पीड़िता की मां का व्यवहार सच्चे गवाह या मां जैसा नहीं था, क्योंकि महीनों तक दुर्व्यवहार जारी रहने के बावजूद उन्होंने न तो पुलिस से और न ही अपने परिवार से कोई शिकायत की।














