नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और बीसीआई से कहा है कि वे मिलकर हाई कोर्ट, जिला अदालतों, तहसील अदालतों, ट्रिब्यूनल और अन्य अर्ध-न्यायिक संस्थाओं में प्रैक्टिस करने वाली महिला वकीलों की यौन उत्पीड़न की शिकायतों से निपटने के लिए नियम बनाएं। न्यायमूर्ति बीवी नागरत्न और न्यायमूर्ति आगस्टीन जार्ज मसीह की पीठ ने कहा कि कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 (पाश कानून) को कानूनी पेशे से जुड़ी महिलाओं पर सख्त और एक ही तरह से लागू नहीं किया जा सकता।
पीठ ने संबंधित पक्षों से कहा कि वे सुप्रीम कोर्ट के 2013 के नियमों का अध्ययन करें और अन्य अदालतों के लिए भी वैसा ही ढांचा तैयार करें। पीठ ने कहा- ये नियम केवल सुप्रीम कोर्ट परिसर के लिए बनाए गए।
हाईकोर्ट, जिला न्यायपालिका के तहत आने वाली सभी अदालतों, केंद्र और राज्य सरकारों के ट्रिब्यूनल और अन्य अर्ध-न्यायिक संस्थाओं आदि में इन नियमों का दायरा बढ़ाने के लिए अलग से नियम बनाना जरूरी है। ऐसा इसलिए है क्योंकि हम पाते हैं कि कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 के प्रावधानों को कानूनी पेशे से जुड़ी पीड़ित महिलाओं पर सख्ती से या एक ही तरह से लागू नहीं किया जा सकता। इन हालात में हम संबंधित पक्षों के वकीलों से अनुरोध करते हैं कि वे आपस में चर्चा करें और ऊपर बताई गई सभी न्यायिक और अर्ध-न्यायिक अदालतों, ट्रिब्यूनल और संस्थाओं पर लागू होने वाले नियमों का एक सेट तैयार करें।
कोर्ट ने बार काउंसिल को यह पता लगाने का भी निर्देश दिया कि क्या राज्य बार काउंसिल द्वारा पहले से ही ऐसे कोई नियम लागू किए जा रहे हैं।














