ब्रिक्स को याददाश्त देने का मोदी का प्रस्ताव भारत मंडपम में उद्घाटन भाषण
नई दिल्ली, 12 सितंबर जिस संगठन का अध्यक्ष हर साल बदलता हो, उसकी याददाश्त कमजोर होती है। पिछले साल के फैसले अगले साल पीछे छूट जाते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 12 सितंबर 2026 को भारत मंडपम में यही बात रखी। मौका था ब्रिक्स के ‘समावेशी वैश्विक शासन’ सत्र का उद्घाटन भाषण। उन्होंने इलाज भी बताया। उन्होंने ब्रिक्स कंटिन्युटी एंड इम्प्लीमेंटेशन मैकेनिज्म का प्रस्ताव रखा। पिछले, मौजूदा और अगले अध्यक्ष की तिकड़ी (ट्रोइका) हर पहल का फॉलो-अप करेगी। साथ में एक सुरक्षित डिजिटल रिकॉर्ड होगा। उसमें हर फैसले के साथ जिम्मेदार अधिकारी, समय-सीमा और अमल की हालत दर्ज होगी।
पत्र सूचना कार्यालय ने भाषण का पाठ 12 सितंबर 2026 को शाम 4:08 बजे जारी किया। उसमें तीन प्रस्ताव हैं। दूसरा प्रस्ताव ब्रिक्स रिफॉर्म रोडमैप है — वैश्विक शासन में सुधार के दस प्रस्ताव, जो अगली समिट तक मिलकर तैयार हों। इसकी तीन कसौटियां प्रधानमंत्री ने गिनाईं : प्रतिनिधित्व, जवाबदेही और नियम बनाने में हिस्सेदारी। प्रतिनिधित्व पर उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार अब और नहीं टल सकता। इस पर लिखित बातचीत को तय समय-सीमा और साफ नतीजे से जोड़ना होगा। यही बात उन्होंने अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं में वोटिंग पावर और नेतृत्व के पदों पर कही।
तीसरा प्रस्ताव छोटा और ठोस है — सीफेयरर्स इमरजेंसी सपोर्ट नेटवर्क। इसमें सदस्य देशों के समुद्री प्राधिकरण और दूतावास जुड़ेंगे। संकट में फंसे नाविकों को अलर्ट, इलाज, परिवार को सूचना और निकासी में मदद मिलेगी। दुनिया के व्यापार का बड़ा हिस्सा नाविक ढोते हैं, और मुश्किल वक्त में सबसे कम सहारा उन्हीं को मिलता है — प्रधानमंत्री ने यही कहा।
भाषण में एक हिसाब भी था, जो ब्लिट्ज ने जांचा। भारत की अध्यक्षता में साढ़े तीन सौ से ज्यादा बैठकें लगभग तीस शहरों में हुईं। यानी हर मेजबान शहर में करीब बारह बैठकें। अध्यक्षता दिल्ली में सिमटी नहीं, देश भर में फैली — ‘पीपुल-सेंट्रिक’ कहने का प्रधानमंत्री का मतलब यही था। यह ब्रिक्स का बीसवां साल भी है, और प्रधानमंत्री ने इसे संगठन का ‘बालिग होना’ कहा।
आकाशवाणी समाचार ने 12 सितंबर 2026 को दोपहर 3:09 बजे बताया कि सम्मेलन में 11 सदस्य देश और 10 साझेदार देश शामिल हैं। रूस, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इंडोनेशिया और ईरान के राष्ट्रपति हॉल में मौजूद थे।
भारत को इससे क्या मिला — अगर यह रिकॉर्ड बना, तो भारत की चौथी अध्यक्षता वह होगी जिसने ब्रिक्स को याददाश्त दी।
ब्लिट्ज़ की सलाह —
विदेश मंत्रालय उन फैसलों की सूची छाप सकता है जिनसे प्रस्तावित रिकॉर्ड की शुरुआत होगी, ताकि जिस दिन तंत्र मंजूर हो, उसमें कुछ दर्ज भी हो।
ओडिशा में यूएई का 11.5 अरब डॉलर का निवेश
नई दिल्ली, 12 सितंबर 2026 ओडिशा के पास बॉक्साइट है; कमी पूंजी की थी। पत्र सूचना कार्यालय की 12 सितंबर 2026, दोपहर 1:48 बजे की विज्ञप्ति यह बताती है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से अलग मिले। दोनों ने यूएई की इंटरनेशनल होल्डिंग कंपनी की घोषणा का स्वागत किया। कंपनी ओडिशा में 11.5 अरब अमेरिकी डॉलर का एकीकृत ग्रीनफील्ड एल्युमिनियम प्रोजेक्ट लगाएगी। विज्ञप्ति इसे भारत के एल्युमिनियम क्षेत्र का अब तक का सबसे बड़ा एकीकृत निवेश बताती है।
उसी विज्ञप्ति के मुताबिक दोनों नेताओं ने माना कि यूएई का नया संप्रभु निवेश कोष ‘ल’इमाद’ साझेदारी को गहरा कर सकता है। रक्षा, अंतरिक्ष, परमाणु ऊर्जा और तकनीक में सहयोग पर भी बात हुई। जनवरी 2026 में यूएई के राष्ट्रपति भारत आए थे और मई 2026 में प्रधानमंत्री यूएई गए थे। भारत को क्या मिला — पूर्वी भारत की धातु पट्टी में खाड़ी का बड़ा निवेशक, और ओडिशा के लिए यह उम्मीद कि उसका अयस्क राज्य के भीतर ही धातु बने।
ब्लिट्ज़ की सलाह — ओडिशा सरकार जल्द से जल्द बता सकती है कि स्मेल्टर को बिजली कहां से मिलेगी, क्योंकि भारत में एकीकृत एल्युमिनियम प्रोजेक्ट सबसे ज्यादा इसी सवाल पर अटके हैं।
कोटा किनाबालु में खुलेगा भारतीय वाणिज्य दूतावास
नई दिल्ली, 12 सितंबर 2026 मलेशिया के सबाह प्रांत में भारत का महावाणिज्य दूतावास खुलेगा। पत्र सूचना कार्यालय की 12 सितंबर 2026, सुबह 11:32 बजे की विज्ञप्ति के मुताबिक मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से अलग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिले। उन्होंने कोटा किनाबालु में दूतावास के लिए मलेशिया की सहमति बताई। दोनों ने फरवरी 2026 की प्रधानमंत्री की मलेशिया यात्रा के नतीजों की समीक्षा की — व्यापार, रक्षा, सेमीकंडक्टर, डिजिटल अर्थव्यवस्था, ऊर्जा, फिनटेक, शिक्षा और पर्यटन के संदर्भ में।
भारत को क्या मिला — पूर्वी मलेशिया में अपना दफ्तर, जहां भारतीय कामगार और कारोबारी अब तक कुआलालंपुर से देखे जाते थे।
ब्लिट्ज़ की सलाह — विदेश मंत्रालय अधिसूचना के साथ दफ्तर खुलने की तारीख भी बता सकता है, ताकि सबाह के भारतीय जान सकें कि इंतजार कितना है।
जूनियर महिला हॉकी टीम लगातार तीसरे टूर्नामेंट के फाइनल में
मोकी, 12 सितंबर 2026 भारत की जूनियर महिला हॉकी टीम ने 12 सितंबर को चीन के मोकी में दक्षिण कोरिया को 5-1 से हरा दिया। जूनियर एशिया कप का फाइनल पक्का हो गया। आकाशवाणी समाचार ने उसी दिन दोपहर 2:06 बजे बताया कि सुप्रिया ने हैट्रिक बनाई और मधु सिदार व सुखवीर कौर ने एक-एक गोल किया। फाइनल में मेजबान चीन से मुकाबला है। भारत ने 2023 और 2024 में खिताब जीता था, और इस बार क्वार्टर फाइनल में पाकिस्तान को 19-0 से हराया था।
भारत को क्या मिला — लगातार तीसरे महाद्वीपीय खिताब का मौका, उस टीम से जो सीनियर टीम की नर्सरी है।
ब्लिट्ज़ की सलाह — हॉकी इंडिया बता सकता है कि इस टीम की कौन-सी खिलाड़ी सीनियर संभावितों में ली जाएंगी, ताकि जूनियर कप एक पड़ाव दिखे, मंजिल नहीं।
करनाल में जन्मी बद्री बछिया, मां साहीवाल
- उत्तराखंड की पहाड़ी नस्ल को टेस्ट-ट्यूब भ्रूण से बढ़ाने की पहली कामयाबी
- एक बढ़िया गाय अब साल में कई बछड़ों की मां बन सकती है।
करनाल, 12 सितंबर 2026 उत्तराखंड के पहाड़ी किसान की गाय बद्री है छोटी, कम दूध देने वाली, पर पहाड़ की सर्दी और चढ़ाई झेलने वाली। राज्य ने उसे अपना राज्य पशु घोषित कर रखा है। 11 सितंबर 2026 को करनाल के आईसीएआर-राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान के फार्म में एक बद्री बछिया जन्मी, जिसे साहीवाल गाय ने पेट में पाला। पत्र सूचना कार्यालय की 12 सितंबर 2026, सुबह 11:45 बजे की विज्ञप्ति के मुताबिक भ्रूण ओपीयू-आईवीएफ तकनीक से बना था। दूसरी गाय भी अगले पांच से सात दिन में बद्री बछड़ा जनने वाली है।
तकनीक समझिए, क्योंकि खबर वही है। कुदरती तरीके से एक बद्री गाय साल में एक बछड़ा देती है। ओपीयू-आईवीएफ में अल्ट्रासाउंड की मदद से चुनी हुई गाय के अंडे निकाले जाते हैं। प्रयोगशाला में उन्हें उत्तराखंड पशुधन विकास बोर्ड के बढ़िया बद्री सांड के वीर्य से निषेचित किया जाता है। तैयार भ्रूण दूसरी गायों — साहीवाल या संकर — में रखे जाते हैं। यानी एक बढ़िया गाय के कई बछड़े, जिन्हें दूसरी गायें पालें। नस्ल की गिनती इसी से तेजी से बढ़ेगी।
यह काम 2023 में पंतनगर के जी.बी. पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति डॉ. एम.एस. चौहान की पहल पर शुरू हुआ था। खर्च उत्तराखंड जैव प्रौद्योगिकी परिषद, हल्दी ने उठाया। एनडीआरआई के निदेशक डॉ. धीर सिंह ने विज्ञप्ति में कहा कि इससे बद्री नस्ल के सुधार और संरक्षण का व्यवस्थित कार्यक्रम बन सकेगा। विज्ञप्ति यह भी कहती है कि ज्यादा दूध देने वाली बद्री गायों के क्लोन भ्रूण तैयार हैं। वे अगले चरण में रखे जाएंगे। क्लोन भ्रूण जन्मा हुआ बछड़ा नहीं है — विज्ञप्ति इससे आगे कोई दावा नहीं करती, और ब्लिट्ज भी नहीं।
भारत को क्या मिला — पहाड़ी नस्ल बचाने का ऐसा रास्ता, जिसमें पहाड़ के किसान से ज्यादा जानवर पालने को नहीं कहना पड़ेगा। नस्ल करनाल में बढ़ेगी, बछड़े पहाड़ लौटेंगे।
ब्लिट्ज़ की सलाह — पशुपालन विभाग 2027 के लिए उत्तराखंड पशुधन विकास बोर्ड को ओपीयू-आईवीएफ बद्री बछड़ों का लक्ष्य दे सकता है, ताकि पहली बछिया के बाद पूरा झुंड बने।
बांस : तीन करोड़ दिहाड़ी और 576 कक्षाएं
नई दिल्ली, 12 सितंबर 2026 2017 तक अपने खेत में उगा बांस काटने के लिए किसान को वन विभाग की इजाजत चाहिए थी। अंग्रेजों के जमाने का कानून बांस को पेड़ मानता था। वह वर्गीकरण हटा, और उसके बाद क्या बदला — यही पत्र सूचना कार्यालय के 12 सितंबर 2026, सुबह 10:55 बजे जारी रिसर्च बैकग्राउंडर का विषय है।
सबसे बड़े आंकड़े विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के नॉर्थ ईस्ट सेंटर फॉर टेक्नोलॉजी एप्लीकेशन एंड रीच (नेक्टर) के हैं। बैकग्राउंडर के मुताबिक उसकी योजनाओं से साल में करीब तीन करोड़ मानव-दिवस का रोजगार बनता है। बांस के उत्पादों में जोड़ा गया मूल्य 10 फीसदी से बढ़कर 70 फीसदी हो गया है। आपदा राहत के लिए 42 लाख वर्ग फुट से ज्यादा इंजीनियर्ड बांस की इमारतें बनी हैं, और छत्तीसगढ़ में करीब 20,000 बच्चों के लिए 576 स्कूल कक्षाएं।
ब्लिट्ज ने भाग दिया : हर कक्षा में करीब 35 बच्चे — यानी चलता हुआ स्कूल, नुमाइश नहीं।
छोटे आंकड़े याद रहेंगे
मध्य प्रदेश के विजय पाटीदार ने खेती में लगातार घाटे के बाद 2019 में राष्ट्रीय बांस मिशन की मदद से करीब 4,000 पौधे लगाए। दो साल में बल्लियां बेचकर करीब 75,000 रुपये कमाए। बीच की जगह में मिर्च, शिमला मिर्च, अदरक और लहसुन उगाया। महाराष्ट्र के गढ़चिरोली में 2012 में शुरू हुई अगरबत्ती परियोजना के 2020 तक 32 केंद्र थे। करीब 1,100 लोग काम करते थे, उनमें 90 फीसदी महिलाएं। हर एक की कमाई करीब 5,000 रुपये महीना। काम के दिन साल में 45-60 से बढ़कर 225 से ज्यादा हो गए — ब्लिट्ज के हिसाब से पौने चार से पांच गुना।
भारत को क्या मिला — जो कच्चा माल देश पहले से उगाता है, खासकर पूर्वोत्तर में, वह अब कारखाने का माल बन रहा है। और यह सबूत कि कानून की एक परिभाषा बदलना किसी सब्सिडी से ज्यादा काम कर सकता है।
ब्लिट्ज़ की सलाह — राष्ट्रीय बांस मिशन सरकारी इस्तेमाल में आ रही इंजीनियर्ड बांस की इमारतों की राज्यवार सूची छाप सकता है, क्योंकि छत्तीसगढ़ की कक्षाएं इस सामग्री का सबसे मजबूत तर्क हैं और अभी बैकग्राउंडर की एक पंक्ति भर हैं।












