दुनिया के कारोबार में चौथाई हिस्सा रखने वाले देशों की बैठक दिल्ली में
नई दिल्ली, 11 सितंबर। माल पर लगने वाला शुल्क चुका दिया जाए, फिर भी माल बंदरगाह से नहीं निकलता। 11 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में ब्रिक्स कारोबार मंच के पहले सत्र में केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने इसी अंतर पर आंकड़ा रखा।
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय की 11 सितंबर 2026 की विज्ञप्ति में यह दर्ज है। गोयल ने कहा कि 88 फीसदी देशों में गैर-शुल्क उपायों का खर्च खुद सीमा शुल्क से ज्यादा पड़ता है। जिस समूह से वे बोल रहे थे, वह दुनिया के करीब चौथाई कारोबार का हिस्सा रखता है।
दोनों बातें साथ रखिए तो काम अपने आप तय हो जाता है। दुनिया का चौथाई कारोबार एक कमरे में बैठा है, और उसमें ज्यादातर जगह अड़चन शुल्क की दर नहीं, निकासी की प्रक्रिया है।
गोयल ने ब्रिक्स देशों और साझेदार देशों से कहा कि वे एक-दूसरे के सामान के लिए अपने बाजार खोलें, इसमें कच्चा माल और अहम खनिज भी शामिल हैं। उन्होंने नियमों की प्रक्रिया आसान करने और माल की निकासी तेज करने को कहा।
उनकी एक बात दर्ज करने लायक है। विज्ञप्ति के मुताबिक उन्होंने कहा कि आपूर्ति श्रृंखलाएं तभी मजबूत होंगी जब वे दोनों तरफ चलें। यानी मजबूती की एक शर्त है, और वह शर्त बराबरी है।
भुगतान वाला प्रस्ताव सबसे ठोस है। विज्ञप्ति में दर्ज है कि यूपीआई पर अब साल में 250 अरब से ज्यादा लेनदेन होते हैं। यह दुनिया भर के लेनदेन का आधे से ज्यादा हिस्सा है, गिनती के हिसाब से। यूपीआई अब 11 देशों में चलता है। इसी आधार पर उन्होंने ब्रिक्स देशों से अपने भुगतान तंत्र जोड़ने और आपस में अपनी-अपनी मुद्रा में कारोबार करने को कहा।
महिलाओं के कारोबार पर दो आंकड़े आए। देश के 2.5 लाख मान्यता प्राप्त स्टार्टअप में से 45 फीसदी से ज्यादा में कम से कम एक महिला साझेदार या निदेशक है।
ब्लिट्ज़ ने हिसाब लगाया — यह कम से कम 1.12 लाख कंपनियां हुईं, जो आंकड़ा विज्ञप्ति में नहीं है। पिछले दस साल में दिए गए छोटे कर्जों में दो-तिहाई महिला उद्यमियों को गए।
गोयल ने बताया कि उन्होंने ब्रिक्स महिला कारोबार गठबंधन से कहा है कि हर ब्रिक्स प्रदर्शनी और व्यापार मेले में महिलाओं की चलाई कंपनियां शामिल हों। यह गठबंधन मंच से पहले नई दिल्ली में मिला था।
उसी सत्र में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने आपूर्ति श्रृंखला की जुड़ाई, व्यापार की सहूलियत और नवाचार को ब्रिक्स की प्राथमिकता बताया। रूस के आर्थिक विकास मंत्री मैक्सिम रेशेतनिकोव, वाणिज्य एवं उद्योग तथा इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी राज्य मंत्री जितिन प्रसाद और वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने भी बात रखी।
भारत को इस अध्यक्षता से जो मिलता है, वह एजेंडा तय करने का हक है। शुल्क की दरें सालों की बातचीत से बदलती हैं। डिग्री की आपसी मान्यता, जुड़े हुए भुगतान तंत्र और एक जैसी निकासी खिड़की — ये तीनों अफसरों के स्तर पर तय होते हैं और अगली तिमाही में पैसा हिलाते हैं।
ब्लिट्ज़ डेटा कार्ड
- दुनिया के कारोबार में ब्रिक्स का हिस्सा: करीब चौथाई
- जिन देशों में गैर-शुल्क उपाय शुल्क से महंगे: 88%
- यूपीआई लेनदेन: साल में 250 अरब से ज्यादा
- दुनिया के लेनदेन में हिस्सा: आधे से ज्यादा
- यूपीआई चलन वाले देश: 11
- मान्यता प्राप्त स्टार्टअप: 2.5 लाख
- जिनमें महिला साझेदार या निदेशक: 45% से ज्यादा
तुलना, पैमाने पर
कागजी कार्रवाई बड़ा खर्च — 88% देश
शुल्क बड़ा खर्च — 12% देश
आठ में सात से ज्यादा देशों में बोझ कागज का है।
ब्लिट्ज़ का हिसाब
45% × 2.5 लाख = कम से कम 1.12 लाख स्टार्टअप, जिनमें एक महिला साझेदार या निदेशक है।
100% − 88% = 12% देश, जहां शुल्क आज भी कागज से बड़ा खर्च है।
भारत को क्या मिला
निकासी की खिड़की, भुगतान की पटरी और डिग्री की मान्यता — तीनों निर्यातक का पैसा अगली तिमाही में हिलाती हैं।
मूल स्रोत:वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय
सत्यापित pib.gov.in पर, 11 सितंबर 2026 को पढ़ा गया
ब्लिट्ज़ की सलाह
एक चीज छप जाए तो यह अध्यक्षता नापी जा सकेगी। ब्रिक्स के हर दो देशों के बीच माल की औसत निकासी में कितने दिन लगते हैं — यह तालिका हर तिमाही जारी हो। 88 फीसदी वाला आंकड़ा बीमारी बताता है। जो आंकड़ा घटता दिखे, वही बताएगा कि इलाज हुआ।
मजदूर चौक अब कागज पर भी
मुंबई, 11 सितंबर। हर शहर में एक मजदूर चौक है। एक चौराहा, एक फुटपाथ, औजार लिए कुछ लोग, और सुबह छह बजे से ठेकेदार की गाड़ी का इंतजार। यह इंतजाम ठेकेदार के लिए सुविधाजनक है और बाकी सबके लिए अनिश्चित।
श्रम एवं रोजगार मंत्रालय की 10 सितंबर की विज्ञप्ति में यह दर्ज है। भवन एवं अन्य निर्माण श्रमिकों पर राष्ट्रीय सम्मेलन 11 सितंबर को मुंबई में शुरू हुआ और दो दिन चलेगा। यह महाराष्ट्र सरकार के साथ मिलकर हो रहा है। इसकी अध्यक्षता केंद्रीय श्रम एवं रोजगार तथा युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्री मनसुख मांडविया कर रहे हैं।
सम्मेलन में केंद्रीय राज्य मंत्री शोभा करंदलाजे, राज्यों के श्रम मंत्री और कल्याण बोर्डों के अध्यक्ष व सचिव शामिल हैं।
नौ राज्य और केंद्र शासित प्रदेश यहां अपना डिजिटल मजदूर चौक शुरू कर रहे हैं — महाराष्ट्र, तेलंगाना, दिल्ली, मध्य प्रदेश, झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश और ओडिशा। इससे निर्माण मजदूरों को काम से जुड़ी सेवाएं आसानी से मिलेंगी। सीधे शब्दों में — चौक के पास अब यह रिकॉर्ड होगा कि वहां कौन खड़ा था और उसे क्या काम मिला।
दूसरा बदलाव वह है जिसमें पैसा है। मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल ऑनलाइन सेस वसूली पोर्टल शुरू कर रहे हैं।
निर्माण सेस इमारत बनाने की लागत पर लगने वाला शुल्क है। यही राज्यों के कल्याण बोर्डों की इकलौती कमाई है, जिससे दुर्घटना मुआवजा, पेंशन, प्रसूति लाभ और बच्चों की पढ़ाई में मदद दी जाती है। जहां सेस कम वसूला जाता है, वहां कमी घाटे की तरह नहीं दिखती — वह बिना मिले लाभ की तरह दिखती है।
बिहार और पश्चिम बंगाल मजदूर चौक-सह-सुविधा केंद्र शुरू कर रहे हैं, यानी इंतजार वाली जगह पर ही एक काउंटर।
ये तीनों काम नवंबर 2025 में नई दिल्ली के राष्ट्रीय श्रम सम्मेलन में शुरू हुए थे। मुंबई का यह सम्मेलन उन दस महीनों का हिसाब है। ऐलान और हिसाब के बीच का यही वक्त आम तौर पर खबर में नहीं आता।
भारत के निर्माण मजदूर को इससे जो मिलेगा वह रिकॉर्ड है। जिस मजदूर का नाम किसी मान्य चौक पर दर्ज होगा, उसे कल्याण बोर्ड ढूंढ़ सकेगा, उसे लाभ दे सकेगा और दुर्घटना के आंकड़े में गिन सकेगा। जिसका नाम कहीं नहीं, वह हर सुबह चौराहे पर मौजूद है और सरकारी कागज में गैरहाजिर।
ब्लिट्ज की सलाह
सम्मेलन तीन कामों का हिसाब शुरुआत गिनकर कर रहा है। जो आंकड़ा केंद्र को नई बात बताएगा वह वसूली का है — कितना सेस बनता था और कितना आया, राज्य दर राज्य, साल में एक बार छपे। डिजिटल चौक मजदूर का नाम दर्ज करता है; पैसा सेस से ही आता है।
हर जरूरत का अपना डिजिटल निशान
नई दिल्ली, 11 सितंबर — किसी कस्बे में एक नौजवान को कृत्रिम पैर चाहिए और नौकरी भी। दोनों उससे पचास किलोमीटर के भीतर मौजूद हैं। किसी को उसका पता नहीं।
सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की 10 सितंबर की विज्ञप्ति में यह दर्ज है। दिव्यांगजन सशक्तीकरण विभाग, भारतीय कृत्रिम अंग निर्माण निगम और बेंगलुरु की एकस्टेप फाउंडेशन ने नई दिल्ली में समझौता किया। इससे पर्पल डॉट्स — यूनिफाइड बेनिफिट्स इंटरफेस पहल बनेगी।
इसका ढांचा एक वाक्य में समझ आता है। ‘पर्पल डॉट’ एक डिजिटल प्रोफाइल है। इसमें दिव्यांग व्यक्ति बताता है कि वह कौन है और उसे क्या चाहिए — नौकरी, सहायक उपकरण, कौशल प्रशिक्षण या कोई और मदद।
दूसरी तरफ नियोक्ता, सेवा देने वाली संस्थाएं, गैर-सरकारी संगठन और दानदाता संस्थाएं अपने डॉट बनाती हैं और बताती हैं कि उनके पास क्या है। एक खुला और आपस में जुड़ने वाला प्रोटोकॉल दोनों तरह के डॉट को अपने इलाके में, उसी वक्त मिलवा देता है।
विज्ञप्ति इस बात पर बहुत साफ है कि वह किस दिक्कत का हल है, और यही खबर है। उसमें लिखा है कि असली चुनौती सिर्फ लाभ और सेवाओं का मौजूद होना नहीं है। चुनौती यह है कि व्यक्ति सही मौका, सही सेवा या सही मदद सही वक्त और सही जगह पर ढूंढ़ पाए।
मौजूद होना और ढूंढ़ पाना दो अलग बातें हैं। भारत ने बीस साल पहली बात पर लगाए हैं।
ढांचे के लिए विभाग ने जो शब्द चुना है, वही मायने रखता है — आपस में जुड़ने वाला। हर योजना के लिए नया पोर्टल बनाने के बजाय यह पहल इस तरह बनी है कि पहले से चल रहे तंत्र आपस में बात कर सकें। यही तरीका देश में भुगतान को चला चुका है।
तीनों साझेदार अलग-अलग चीज लाते हैं। विभाग के पास जिम्मा और देशभर की पहुंच है। निगम के पास सहायक उपकरणों का चार दशक का काम है। और एकस्टेप के पास बड़े पैमाने पर खुला डिजिटल ढांचा बनाने का अनुभव है।
भारत के परिवार को इससे जो मिलेगा वह खोज है। जिस मां को एक ही जिले में सुनने की मशीन, एक योजना और एक स्कूल चाहिए, वह आज तीन अलग दफ्तरों में तीन अलग खोज करती है। अकसर वह उनमें से एक छोड़ देती है। जो अभी तय नहीं है वह समय है। विज्ञप्ति ढांचे का एलान करती है, शुरू होने की तारीख का नहीं। डॉट या जिलों का कोई लक्ष्य भी नहीं छपा है।
ब्लिट्ज की सलाह
पहले जिले से ही एक आंकड़ा छपे — डॉट के रूप में दर्ज कितनी जरूरतें तीस दिन के भीतर किसी मौके से मिल गईं। ढांचा ठीक है और नीयत साफ है। मिलान की दर ही विभाग को बताएगी कि डॉट एक-दूसरे को ढूंढ़ रहे हैं या सिर्फ जमा हो रहे हैं।
आपदा का पैसा अब चार गुना
नई दिल्ली, 11 सितंबर — आपदा का बजट बताता है कि देश क्या उम्मीद कर रहा है। जो बजट बड़ी घटना के बाद बढ़े, वह देश प्रतिक्रिया कर रहा है। जो शांत सालों में बढ़े, वह तैयारी कर रहा है।
गृह मंत्रालय की 10 सितंबर की विज्ञप्ति में यह दर्ज है। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने नई दिल्ली में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान के शासी निकाय की तीसरी बैठक की अध्यक्षता की।
उसी विज्ञप्ति के दो आंकड़े बदलाव बताते हैं। राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष का आवंटन करीब चार गुना बढ़ा है और राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष का करीब तीन गुना।
इनमें पहला आंकड़ा दिखने से ज्यादा मायने रखता है। राज्य वाला कोष वही है जिससे जिलाधिकारी पहले 72 घंटे में खर्च करता है। दोनों का अनुपात कहता है कि अब तंत्र जवाब की शुरुआत जिले से मानकर चल रहा है।
विज्ञप्ति में सोच का बदलाव इस तरह दर्ज है — राहत और पुनर्वास वाले नजरिए से आगे बढ़कर खतरा घटाने, पहले से चेतावनी देने और शून्य मृत्यु तक। साथ में आपदा-रोधी गांव और आपदा-रोधी शहर बनाने का लक्ष्य रखा गया है।
एक फैसला और दर्ज है, और प्रशासन के लिहाज से वही सबसे बड़ा है — आपदा राहत का पैसा अब वैज्ञानिक और व्यवस्थित तरीके से बंटेगा। जो पैसा तय फार्मूले से आता है, राज्य उसका हिसाब पहले से लगा सकता है।
बैठक में कौन था, यह बताता है कि संस्थान को क्या बनाया जा रहा है। बैठक में केंद्रीय गृह सचिव, दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के सदस्य थे। एनडीआरएफ के महानिदेशक, कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के सचिव और भारत मौसम विज्ञान विभाग के महानिदेशक भी थे। लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी के निदेशक और संस्थान के कार्यकारी निदेशक भी मौजूद थे।
एक कुलपति और एक मौसम वैज्ञानिक का उसी कमरे में बल के कमांडर के साथ बैठना ही असल बात है। गृह मंत्री ने कहा कि विश्वविद्यालयों को संस्थान के शोध और क्षमता निर्माण से जोड़ा जाए। उन्होंने आपदा प्रबंधन का मोबाइल ऐप उच्च, माध्यमिक और प्राथमिक शिक्षा में फैलाने को कहा। हर संबंधित विभाग में एक समर्पित प्रकोष्ठ बने, और उसकी समीक्षा विभाग प्रमुख हर तीन महीने में करे।
भारत को आपदा-रोधी गांव से जो मिलता है, वह गैरहाजिरी में गिना जाता है। वह बाढ़ जिसने जान नहीं ली। वह तटीय इलाका जो तूफान से पहले खाली हो गया। इसकी तस्वीर नहीं बनती, और इसीलिए इस पर पैसा कम पड़ना आसान होता है। कोष का अनुपात इसीलिए देखने लायक आंकड़ा है।
ब्लिट्ज़ की सलाह
राहत का बंटवारा अगर वैज्ञानिक और व्यवस्थित होना है, तो फार्मूला छाप दिया जाए। पैमाने साफ हों — कितनी आबादी प्रभावित, आपदा किस श्रेणी की, नुकसान का आकलन, कितना वक्त बीता। जो राज्य इन्हें देख सके, वह उसी हिसाब से बजट बना सकता है और बहस भी कर सकता है।
37 डीप-टेक कंपनियां भारत मंडपम में
नई दिल्ली, 11 सितंबर — ज्यादातर शिखर सम्मेलनों से एक साझा बयान निकलता है। इसमें एक हॉल भी है, जहां कोई संस्थापक अपना नमूना किसी निवेशक के हाथ में दे सकता है।
शिक्षा मंत्रालय की 11 सितंबर की विज्ञप्ति के मुताबिक मंत्रालय विदेश मंत्रालय के साथ मिलकर भारत मंडपम में ब्रिक्स भारत इनोवेट्स प्रदर्शनी कर रहा है। यह 11 और 12 सितंबर 2026 को चल रही है, और 12–13 सितंबर के 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के साथ है, जो भारत की अध्यक्षता में हो रहा है।
प्रदर्शनी में 37 भारतीय डीप-टेक स्टार्टअप और उद्यम हैं। ये उन 120 में से चुने गए हैं जो 14 से 16 जून को फ्रांस के नीस में पहले भारत इनोवेट्स में गए थे।
ब्लिट्ज़ ने हिसाब लगाया
— यह उस दल का 30.83 फीसदी है, यानी यह छांटी हुई सूची है, प्रतिनिधिमंडल नहीं।
नीस वाला आयोजन ही इस तरीके का सबूत है। विज्ञप्ति के मुताबिक उसका उद्घाटन प्रधानमंत्री और फ्रांस के राष्ट्रपति ने मिलकर किया था। उसमें 13 विषयों और 15 संस्थानों के 120 डीप-टेक उद्यम थे, जिनमें आईआईटी, आईआईएससी, बाइरैक और आईडेक्स शामिल हैं।
उसमें 29 देशों के दो हजार से ज्यादा लोग आए। 30 से ज्यादा साझेदारी समझौते हुए, और 1,350 कारोबारी बैठकों के बाद 25.45 करोड़ डॉलर की फंडिंग का वादा मिला।
दूसरे आंकड़े को तीसरे से भाग दीजिए तो हर बैठक पर औसतन करीब 1.88 लाख डॉलर के वादे बनते हैं। यह भविष्यवाणी नहीं है और पैसा मिलने की गारंटी भी नहीं। यह सिर्फ बताता है कि मिलान ठीक से हो तो एक कमरे में कितनी पूंजी भरी जा सकती है। इस बार मिलान फिक्की, सीआईआई और एसोचैम के साथ हो रहा है।
प्रदर्शनी भारत की अध्यक्षता के विषय के तहत है। यह शिक्षा ट्रैक की पांच प्राथमिकताओं में से एक को आगे बढ़ाती है — शोध, नवाचार और स्टार्टअप तंत्र को मजबूत करना। प्रधानमंत्री, केंद्रीय शिक्षा मंत्री प्रल्हाद जोशी और ब्रिक्स प्रतिनिधिमंडलों के प्रमुखों के आने की उम्मीद है।
इसके पीछे साल भर का काम है, जो सम्मेलन की चकाचौंध में दब जाता है। 7 अगस्त 2026 को 13वीं ब्रिक्स शिक्षा मंत्रियों की बैठक हुई और 5 अगस्त को तीसरी वरिष्ठ अधिकारी बैठक, दोनों भुवनेश्वर में। वहां जो घोषणापत्र अपनाया गया उसमें शुरुआती बचपन की देखभाल, कौशल विकास, शोध और स्टार्टअप, डिग्री की आपसी मान्यता और शैक्षणिक नेतृत्व शामिल हैं।
डिग्री की आपसी मान्यता वह बात है जिस पर भारत के विद्यार्थी को नजर रखनी चाहिए। यही तय करता है कि डिग्री साथ चलती है या हर जगह समझानी पड़ती है।
ब्लिट्ज की सलाह
नीस वाले आयोजन ने वादे गिनाए। अगला काम यह छापना है कि छह महीने बाद उन वादों में से कितना पैसा सचमुच कंपनियों तक पहुंचा और कितने समझौते अनुबंध बने। वादा इरादा है; पैसा आना नतीजा है, और अगले दल को यही बताएगा कि यात्रा काम की है या नहीं।
जर्मनी वाले जहाज की जगह अपना जहाज
कोलकाता, 9 सितंबर — तैंतालीस साल से भारतीय समुद्र विज्ञान का सबसे अहम औजार वह जहाज रहा है, जो भारत ने नहीं बनाया था।
पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की 9 सितंबर की विज्ञप्ति में यह दर्ज है। समुद्र अनुसंधान पोत यार्ड 3041 कोलकाता के ऋषि बंकिम शिपयार्ड में पानी में उतारा गया। इसका नाम ओआरवी सागर मंथन रखा गया है।
इसे गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स ने डिजाइन किया और बनाया है, राष्ट्रीय ध्रुवीय एवं समुद्र अनुसंधान केंद्र के लिए, जो पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधीन है। इसे केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने वीडियो के जरिये उतारा, और मंत्रालय के सचिव टी श्रीनिवास कुमार यार्ड में मौजूद थे।
यह जहाज गहरे समुद्र मिशन के वर्टिकल-4 के तहत बना है, यानी गहरे समुद्र का सर्वेक्षण और खोज। इस पर करीब 840 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं और इसकी उम्र 30 साल आंकी गई है। ब्लिट्ज़ ने हिसाब लगाया — यह हर साल की सेवा पर करीब 28 करोड़ रुपये बैठता है, चलाने का खर्च जोड़ने से पहले।
यह ओआरवी सागर कन्या की जगह लेगा, जो 1983 में जर्मनी से लिया गया था और अब 43 साल का है। यही अंकगणित असली खबर है। शोध का बेड़ा उसी रफ्तार से पुराना होता है जिस रफ्तार से विज्ञान बदलता है। 43 साल पुराना ढांचा यात्रा को नहीं, उस पर लगने वाले यंत्रों को सीमित करता है।
बनने का समय दूसरा देखने लायक आंकड़ा है। विज्ञप्ति के मुताबिक करार होने के दो साल के भीतर और कील रखने के बमुश्किल पांच महीने बाद जहाज पानी में उतर गया। अपनी श्रेणी के पहले जहाज के लिए यह तेज है, और मंत्री ने इसे इसी रूप में दर्ज कराया।
यह जहाज कर सकता क्या है, यह सचिव ने बताया, जो खुद समुद्र वैज्ञानिक हैं — चलते-चलते मल्टीबीम सर्वेक्षण, भूभौतिकीय प्रोफाइलिंग, वायुमंडल का अवलोकन और पानी की परतों के नमूने। इसमें डायनैमिक पोजिशनिंग, मल्टीबीम बैथिमेट्री और मल्टीचैनल भूकंपीय तंत्र लगे हैं। यह हर मौसम में चलने वाला मंच है, जो दक्षिणी महासागर जैसे कठिन इलाकों के लिए बना है।
इन क्षमताओं को एक-एक करके देखिए तो काम साफ दिखता है। मल्टीचैनल भूकंपीय प्रोफाइलिंग से देश यह नक्शा बनाता है कि उसके समुद्र तल के नीचे क्या है, और गहरे समुद्र के अहम खनिजों पर दावे का आधार यही होता है। मल्टीबीम बैथिमेट्री से सुनामी का मॉडल समुद्र तल की बनावट जानता है। पानी के नमूने और वायुमंडल का अवलोकन मिलकर मानसून का रिकॉर्ड बनाते हैं।
दावा वहीं रहना चाहिए जहां विज्ञप्ति छोड़ती है। यह जहाज का पानी में उतरना है, उसका चालू होना नहीं — आगे साज-सज्जा, परीक्षण और सुपुर्दगी होगी। मंत्रालय ने और समुद्री जहाज तथा एक ध्रुवीय अनुसंधान पोत लेने की बात कही है, पर कोई तारीख नहीं छपी।
भारत को इससे अपने समुद्र से अपने सवाल पूछने की ताकत मिलती है। जो देश जहाज किराये पर लेता है, वह वही सवाल पूछ पाता है जिसकी इजाजत करार देता है। जिसके पास अपना मंच है, वह वही पूछता है जिसका जवाब उसे चाहिए।
ब्लिट्ज़ डेटा कार्ड
- जहाज: ओआरवी सागर मंथन (यार्ड 3041)
- बनाने वाला: गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स ·
- किसके लिए: राष्ट्रीय ध्रुवीय एवं समुद्र अनुसंधान केंद्र, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ·
- कार्यक्रम: गहरे समुद्र मिशन, वर्टिकल-4 ·
- खर्च: करीब 840 करोड़ रुपये · उम्र: 30 साल
- करार से उतरने तक: 2 साल ·
- कील से उतरने तक: करीब 5 महीने
तुलना, पैमाने पर
ओआरवी सागर कन्या, 1983 से सेवा में — 43 साल
ओआरवी सागर मंथन, आंकी गई उम्र — 30 साल
पुराना जहाज नए की तय उम्र से 13 साल ज्यादा चल चुका है।
ब्लिट्ज़ का हिसाब
840 करोड़ रुपये ÷ 30 साल = हर साल की सेवा पर करीब 28 करोड़ रुपये।
2026 − 1983 = 43 साल की सेवा उस जहाज से, जिसकी जगह यह ले रहा है।
भारत को क्या मिला
अपना सर्वेक्षण मंच यानी अपने सवाल — समुद्र तल के खनिज, सुनामी के मॉडल, मानसून का रिकॉर्ड।
मूल स्रोत: पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय, सत्यापित pib.gov.in पर, 11 सितंबर को पढ़ा गया।
ब्लिट्ज़ की सलाह
जहाज सौंपे जाने से पहले ही यह नीति छाप दी जाए कि समुद्र में उसका समय किस तरह बंटेगा। विश्वविद्यालयों और राज्यों की संस्थाओं को अभी पता हो कि दिन कैसे मिलेंगे और अर्जी कैसे देनी है, तो पहला साल विज्ञान में जाएगा, कतार में नहीं।
हरियाणा में हर दफ्तर पर पचास मामले
चंडीगढ़, 1 सितंबर — ऑडिट रिपोर्ट आम तौर पर अपने सबसे बड़े आंकड़े के लिए पढ़ी जाती है। यहां ज्यादा काम का आंकड़ा सबसे छोटा है — पचास।
भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक की 2026 की रिपोर्ट संख्या 5, 1 सितंबर 2026 को सदन में रखी गई। यह हरियाणा सरकार पर राजस्व का अनुपालन ऑडिट है, मार्च 2024 को खत्म साल के लिए।
महालेखापरीक्षक के अपने विवरण के मुताबिक 2023-24 में 143 दफ्तरों के रिकॉर्ड की नमूना जांच हुई। इनमें बिक्री कर और वैट, स्टांप शुल्क व पंजीकरण फीस, आबकारी और परिवहन के दफ्तर शामिल थे। जांच में कम आकलन, कम वसूली या राजस्व का नुकसान कुल 998.85 करोड़ रुपये निकला, 7,144 मामलों में।
ब्लिट्ज़ ने तीन अनुपात निकाले, जो रिपोर्ट में छपे नहीं हैं। 143 दफ्तरों पर 7,144 मामले यानी हर दफ्तर पर ठीक 50 मामले। हर मामले की औसत रकम करीब 13.98 लाख रुपये। और राज्य की उसी साल की राजस्व प्राप्ति 1,01,314.84 करोड़ रुपये के मुकाबले यह पूरी रकम 0.99 फीसदी बैठती है — यानी हर सौ रुपये में करीब एक रुपया।
यह आखिरी आंकड़ा दोनों तरफ काटता है, और दोनों बातें कहनी चाहिए। एक फीसदी इतना कम है कि कहा जा सके कि राजस्व तंत्र मोटे तौर पर काम कर रहा है। और एक लाख करोड़ के आधार पर यह इतना बड़ा है कि इसे रोक लेने से बहुत कुछ हो सकता है।
रिपोर्ट में 21 ऑडिट पैरा हैं और एक विषय-विशेष अनुपालन ऑडिट, जो जीएसटी के तहत वर्क्स कॉन्ट्रैक्ट और निर्माण सेवाओं पर है। विवरण में इसका राजस्व असर 509.22 करोड़ रुपये दर्ज है।
यहीं पाठक को वह हिसाब लगाना पड़ता है जो सारांश नहीं देता। विवरण तीन मदें गिनाता है — वैट और बिक्री कर के आकलन तथा वर्क्स कॉन्ट्रैक्ट वाले विषय-विशेष ऑडिट पर 415.68 करोड़ रुपये; स्टांप शुल्क और पंजीकरण फीस पर 85.37 करोड़ रुपये; और माल वाहनों व कैब मालिकों से वाहन कर तथा कोषागार में जमा न हुई रकम पर 8.17 करोड़ रुपये।
ये तीनों जोड़ने पर ठीक 509.22 करोड़ रुपये बनते हैं — वही आंकड़ा, जो विवरण अकेले विषय-विशेष ऑडिट के साथ लिखता है। यह मेल बिल्कुल सटीक है और विवरण इसे समझाता नहीं।
इससे यह निकलता है कि 998.85 करोड़ में से 489.63 करोड़ रुपये का ब्योरा सारांश में कहीं नहीं है। ब्लिट्ज़ इसे निष्कर्ष नहीं, अध्यायों के लिए सवाल मानकर दर्ज कर रहा है। मद-वार तालिकाएं रिपोर्ट के अध्याय 1 से 4 में हैं, जो अलग से छपे हैं।
विवरण का एक आंकड़ा साफ तौर पर अच्छी खबर है, और ऑडिट रिपोर्ट में ऐसा कम मिलता है। हरियाणा की राजस्व प्राप्ति 2022-23 के 89,194.69 करोड़ रुपये से बढ़कर 2023-24 में 1,01,314.84 करोड़ रुपये हो गई — इस डेस्क के हिसाब से 13.59 फीसदी की बढ़ोतरी, और राज्य की अपनी कमाई का पहली बार एक लाख करोड़ पार करना।
भारत को इतने ब्योरे वाली रिपोर्ट से जो मिलता है वह तुलना का पैमाना है। राजस्व के मुकाबले रिसाव की दर, हर मामले की औसत रकम और कितने दफ्तर देखे गए — ये तीनों आंकड़े हर राज्य का महालेखाकार अपने यहां निकाल सकता है। तुलना ही ऑडिट को रिकॉर्ड से औजार बनाती है।
ब्लिट्ज़ की सलाह
हर राजस्व ऑडिट के विवरण में एक पंक्ति जुड़ जाए तो बहुत फायदा होगा — मद-वार आंकड़े जो कुल में जुड़ते हों, और जो बचे उसका नाम भी। 509.22 और 998.85 करोड़ के बीच का फासला अध्यायों में जरूर समझाया गया होगा, पर जो पाठक भारी अनुबंध नहीं खोल सकता, वह अधूरे और असंगत सारांश में फर्क नहीं कर पाता।
जंगल की नाप में नई तकनीक
नई दिल्ली। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 10 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में वन और वृक्ष संसाधनों की नाप में नई तकनीक पर राष्ट्रीय कार्यशाला की। इसकी अध्यक्षता केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने की और राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह मौजूद रहे। तीन तकनीकी सत्र हुए — वन सीमाओं का डिजिटलीकरण, वन और वृक्ष आवरण की नाप, और कार्बन भंडार का आकलन। मंत्रालय की विज्ञप्ति के मुताबिक भारतीय वन सर्वेक्षण 1987 से हर दो साल पर यह नाप करता आ रहा है। ब्लिट्ज के हिसाब से यह 39 साल का तुलना करने लायक रिकॉर्ड है। वन और वृक्ष आवरण से कार्बन सोख बढ़ाना संयुक्त राष्ट्र जलवायु संधि के तहत भारत का तीसरा एनडीसी लक्ष्य है, और 2035 तक 3.5 से 4.0 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर सोख बनाने का इरादा है।
ह्यूस्टन में जी20 ऊर्जा बैठक
नई दिल्ली। विद्युत तथा आवासन एवं शहरी कार्य मंत्री मनोहर लाल अमेरिका के ह्यूस्टन में जी20 ऊर्जा प्रचुरता मंत्रिस्तरीय बैठक में शामिल होंगे। यह विद्युत मंत्रालय की 11 सितंबर 2026 की विज्ञप्ति में दर्ज है। आकाशवाणी ने उसी दिन बताया कि बैठक 14 से 16 सितंबर तक अमेरिका की जी20 अध्यक्षता में होगी, जिसमें सदस्य देशों के ऊर्जा मंत्री और वरिष्ठ प्रतिनिधि आएंगे।













