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हरित भारत मिशन का दस साल का हिसाब

by ब्लिट्ज़ इंडिया
August 31, 2026
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हरित भारत मिशन CAG रिपोर्ट 2026

ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।जिस योजना का पूरा ढाँचा ही इस बात पर टिका हो कि कई अलग-अलग मदों का पैसा एक ही ज़मीन पर आकर मिलेगा, उसमें सबसे पहले वही मिलना ज़रूरी है। नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (कैग) ने हरित भारत मिशन की जो निष्पादन लेखापरीक्षा 12 अगस्त 2026 को संसद में रखी, वह दस साल का यही हिसाब है।

निष्पादन लेखापरीक्षा प्रतिवेदन संख्या 4/2026 — संघ सरकार, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय — में 16 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में मिशन के कामकाज की जाँच की गई है, उस अवधि की जिसके लिए मंत्रालय ने भौतिक और वित्तीय लक्ष्य मंज़ूर किए थे : 2015-16 से 2024-25 तक। मिशन के उद्देश्य थे — वन और वृक्ष आवरण बढ़ाना, वन तथा ग़ैर-वन भूमि की गुणवत्ता सुधारना, जैव विविधता, जल सेवाओं और कार्बन अवशोषण सहित पारिस्थितिकी सेवाओं में सुधार, और जंगल के आसपास रहने वाले परिवारों की वन-आधारित आमदनी बढ़ाना।

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पैसा कितना आया

आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने योजना के शुरुआती चार वर्षों के लिए बारहवीं योजना से 2,000 करोड़ रुपये का परिव्यय मंज़ूर किया था, और राज्यों के हिस्से के लिए तेरहवें वित्त आयोग के अनुदान से 400 करोड़ रुपये। कैग के अनुसार इन 2,400 करोड़ रुपये के मुक़ाबले दस साल के अमल (2015-16 से 2024-25) में बजटीय सहायता से केवल 1,149.14 करोड़ रुपये, यानी 47.88 प्रतिशत, प्राप्त हुए। ब्लिट्ज़ ने इस अनुपात की गणना लेखापरीक्षक के प्रकाशित आँकड़ों से स्वयं की है और वह छपे हुए प्रतिशत से मेल खाती है।

पर बड़ी बात उस पैसे की है जो कभी बजट की मद बना ही नहीं। मिशन की रणनीति यह मानकर चली थी कि कैम्पा, मनरेगा और दूसरे केंद्रीय व राज्य वनीकरण कार्यक्रमों के साथ अभिसरण (convergence) होगा। कैग दर्ज करता है कि यह अभिसरण किसी भी संस्थागत स्तर पर नहीं दिखा, कि नगर वन योजना और स्कूल नर्सरी योजना जैसी योजनाएँ अलग-थलग चलती रहीं, और इसी कारण 10,600 करोड़ रुपये की प्रस्तावित सहायता प्राप्त नहीं हो सकी। योजना के कैलेंडर का हाल यह रहा कि नमूने में लिए गए 68 वार्षिक कार्य योजनाओं में से केवल छह मंत्रालय के पास वित्तीय वर्ष शुरू होने से पहले पहुँचीं, और एक भी समय पर मंज़ूर नहीं हुई।

कैग प्रतिवेदन 4/2026 : लेखापरीक्षक के आँकड़े, जैसे प्रकाशित हुए

मानदंड / विवरण जानकारी
शुरुआती चार वर्षों के लिए सीसीईए द्वारा मंज़ूर परिव्यय 2,000 करोड़
तेरहवें वित्त आयोग से राज्यों के हिस्से का अनुदान 400 करोड़
दस वर्षों में बजटीय सहायता से प्राप्त 1,149.14 करोड़ · 47.88%
अभिसरण न होने से प्राप्त न हुई प्रस्तावित सहायता 10,600 करोड़
68 में से समय पर मिलीं वार्षिक कार्य योजनाएँ 6
वन आवरण की गुणवत्ता सुधार का लक्ष्य 1.4 मिलियन हेक्टेयर
गुणवत्ता में सुधार दर्ज हुआ 0.11384 मि. हे.
वन आवरण बढ़ाने का लक्ष्य 1.4 मिलियन हेक्टेयर
वन आवरण में वृद्धि दर्ज हुई 0.03409 मि. हे.
कार्बन मापन के फ्लक्स टावरों पर व्यय, जो बेकार खड़े रहे 3.50 करोड़
नापने का सवाल

कैग की एक टिप्पणी अलग से पढ़ने लायक़ है। 2015 से 2025 के बीच मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ को छोड़कर किसी राज्य ने कार्बन अवशोषण का कोई आकलन किया ही नहीं। और इन दो राज्यों में जो फ्लक्स टावर कार्बन नापने के लिए लगाए गए थे, भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (आईसीएफआरई) की ओर से रखरखाव की उचित योजना न होने के कारण 3.50 करोड़ रुपये ख़र्च होने के बावजूद वे बेकार खड़े रहे। निगरानी के मोर्चे पर 14 राज्यों ने पारदर्शिता के लिए ज़रूरी सार्वजनिक वेब-लिंक उपलब्ध नहीं कराए, आठ राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों ने वार्षिक लेखे नहीं रखे, और जहाँ रखे भी गए वहाँ वे प्रायः बिना लेखापरीक्षा के रहे या सहायक अभिलेखों से मेल नहीं खाए।

जवाब की स्थिति

डेस्क साफ़-साफ़ कहता है कि उसने क्या स्थापित किया और क्या नहीं। कैग के 13 अगस्त 2026 के प्रेस विवरण में मंत्रालय का उत्तर नहीं है, और जो उत्तर डेस्क ने पढ़ा नहीं, वह यहाँ लिखा भी नहीं गया। इन निष्कर्षों पर कोई कार्रवाई टिप्पणी (Action Taken Note) दाख़िल हुई या नहीं, और लोक लेखा समिति ने इस प्रतिवेदन पर क्या राय दी, यह उपलब्ध प्राथमिक दस्तावेज़ से तय नहीं हो सका — इसलिए इस पर कोई बात नहीं कही गई है।

ब्लिट्ज़ की राय

लेखापरीक्षक ने जो पकड़ा है, उसका इलाज बजट से ज़्यादा दफ़्तर के कैलेंडर में है। 68 में से केवल छह वार्षिक कार्य योजनाएँ समय पर पहुँचीं — प्रतिवेदन में यही एक बात सबसे आसानी से ठीक हो सकती है। अगर मिशन का योजना-चक्र कैम्पा और मनरेगा के चक्र से जोड़ दिया जाए, ताकि एक ही भूभाग के लिए एक ही योजना तीनों का पैसा माँगे, तो जो अभिसरण काग़ज़ पर था वह ज़मीन पर आ जाएगा। दूसरी बात नापने की है : मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के फ्लक्स टावर मौजूद हैं और उनका पैसा ख़र्च हो चुका है; किसी नामित संस्थान के साथ रखरखाव का अनुबंध कर देने भर से मिशन को उसका सबसे ज़रूरी आँकड़ा वापस मिल जाएगा। और चूँकि 14 राज्यों के वेब-लिंक नहीं मिले, एक राष्ट्रीय डैशबोर्ड पर पौधरोपण स्थलों के सत्यापित भू-निर्देशांक डाल देने से जाँच दस साल में एक बार नहीं, लगातार होती रहेगी। मिशन के उद्देश्यों पर सवाल नहीं है। सवाल उसके कैलेंडर और उसके उपकरणों पर है।

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