ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।कुल बुवाई डेढ़ फ़ीसदी घटी — यह सुनकर लगेगा कि मौसम ने मार दिया। पर फ़सलवार आंकड़ा पढ़िए, तो दिखेगा कि किसान ने ख़ुद ही रास्ता बदल लिया।
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक 21 अगस्त 2026 तक खरीफ़ फ़सलों की बुवाई 1,056.70 लाख हेक्टेयर में हुई, जबकि पिछले साल इसी समय तक 1,072.77 लाख हेक्टेयर थी — यानी 16.07 लाख हेक्टेयर या 1.50% कम। मानसून की शुरुआत के हफ़्तों में यह फ़ासला कहीं ज़्यादा बड़ा था, बाद की बारिश ने उसे काफ़ी हद तक भर दिया।
बारिश का हिसाब यह है: 1 जून से 21 अगस्त तक देश में कुल बारिश सामान्य से 13% कम रही। पर औसत भ्रम पैदा करता है। मध्य भारत लगभग सामान्य रहा — सिर्फ़ 2% कम। जबकि पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में 26%, दक्षिण प्रायद्वीप में 23% और उत्तर-पश्चिम भारत में 11% कम पानी बरसा। एक ही देश, चार अलग मौसम।
करोड़ों फ़ैसलों का जोड़। पंजाब में एक किसान। बुवाई की तालिका कोई सरकारी नतीजा नहीं है — यह हफ़्ते-दर-हफ़्ते बारिश देखकर लिए गए निजी फ़ैसलों का योग है।
सूखे साल में किसान धान से हटकर दाल की ओर बढ़ा। यह किसी सर्कुलर का असर नहीं है। यह उसने अपना बोरवेल देखकर तय किया है।
एक नज़र में
• कुल बुवाई: 1,056.70 लाख हेक्टेयर, 1.50% कम
• धान: 405.10 लाख हेक्टेयर, 3.15% कम (सामान्य रकबा ~412 लाख)
• दालें: 113.63 लाख हेक्टेयर, 1.33% ज़्यादा; उड़द 12.22% ज़्यादा
• मक्का: 4.06% कम · रागी: 27.1% कम · ज्वार: 6.41% ज़्यादा · बाजरा: 2.13% ज़्यादा
• तिलहन: 188.37 लाख हेक्टेयर, 0.17% कम; सूरजमुखी 80.98% ज़्यादा
• बारिश: 1 जून–21 अगस्त, सामान्य से 13% कम
अब फ़सलों का हिसाब। धान, खरीफ़ की सबसे बड़ी फ़सल, 405.10 लाख हेक्टेयर पर है — पिछले साल के 418.29 लाख से 3.15% कम, हालांकि सामान्य रकबे (करीब 412 लाख हेक्टेयर) के क़रीब पहुंच रहा है। दालें उलटी दिशा में गईं — 113.63 लाख हेक्टेयर, यानी 1.33% ज़्यादा, और अकेले उड़द का रकबा 12.22% बढ़ा। मोटे अनाज और श्री अन्न कुल मिलाकर 1.92% कम हैं, जिसमें मक्का 4.06% और रागी 27.1% घटी, पर ज्वार 6.41% और बाजरा 2.13% बढ़ा। तिलहन लगभग बराबर हैं, पर उसके भीतर तिल 15.16% और सूरजमुखी 80.98% बढ़े, जबकि अरंडी 20.80% घटी। गन्ना और कपास लगभग पिछले साल जितने ही हैं।
इस तालिका का सीधा मतलब यह है: कम पानी वाले साल में रकबा ज़्यादा पानी वाली फ़सल से हटकर कम पानी वाली फ़सलों की ओर गया। धान खरीफ़ की सबसे प्यासी फ़सल है; दालें और मोटे अनाज सबसे कम प्यासे। यही वह बदलाव है जो कृषि नीति सालों से चाहती रही है — और इस बार वह अपने-आप हुआ, बिना किसी योजना के।
लेकिन यह बदलाव टिकेगा या नहीं, यह खेती पर नहीं, ख़रीद पर निर्भर है। धान और गेहूं के लिए ख़रीद का ऐसा ढांचा है जिस पर किसान भरोसा कर सकता है; दाल, मोटे अनाज और तिलहन के लिए उतना नहीं। इसलिए सूखे साल में किसान तुअर या बाजरा बो देता है, और अगले अच्छे साल में वापस धान पर लौट आता है। दरअसल सवाल पानी का नहीं, ख़रीदार का है।
आगे का रास्ता तीन कदमों का है, और तीनों प्रशासनिक हैं। पहला — दालों और श्री अन्न की ख़रीद उतनी ही भरोसेमंद हो जितनी अनाज की है। दूसरा — कम अवधि और सूखा सहने वाली क़िस्मों का बीज सीज़न से पहले ज़िले में पहुंचे, नुक़सान के बाद नहीं। तीसरा — मौसम की सलाह किसान तक बुवाई से तीन हफ़्ते पहले पहुंचे; उसके बाद पहुंची सलाह सिर्फ़ नुक़सान की व्याख्या होती है। इस साल की तालिका बता रही है कि सही जानकारी मिलने पर किसान क़दम उठाता है। अब जानकारी, बीज और ख़रीदार — तीनों को फ़ैसले से पहले पहुंचाना है।













