ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।ख़बर यह चलेगी कि खरीफ की बुवाई पिछले साल से डेढ़ फ़ीसदी कम है। दरअसल असली बात दूसरे कॉलम में छिपी है — जो बताता है कि किसान ने कौन-सी फ़सल चुपचाप छोड़ दी।
कृषि मंत्रालय की 21 अगस्त 2026 तक की बुवाई रिपोर्ट कहती है कि देश में कुल खरीफ रक़बा 1,056.70 लाख हेक्टेयर है, जबकि पिछले साल इसी समय 1,072.77 लाख था। यानी 16.07 लाख हेक्टेयर या 1.50 फ़ीसदी की कमी। लेकिन मंत्रालय एक और आँकड़ा छापता है जिसे कोई नहीं पढ़ता — सामान्य रक़बा, जो 1,104.45 लाख हेक्टेयर है। उस हिसाब से इस साल की बुवाई सामान्य का सिर्फ़ 95.7 फ़ीसदी है।
अब हर फ़सल को सामान्य के मुक़ाबले देखिए तो तस्वीर बदल जाती है। रागी अपने सामान्य रक़बे का सिर्फ़ 40 फ़ीसदी है। कपास 86.4 फ़ीसदी पर है — यानी सामान्य से पूरे 17.06 लाख हेक्टेयर कम, हालाँकि पिछले साल से इसमें बस 0.26 फ़ीसदी की कमी दिखती है। उड़द पिछले साल से 12.25 फ़ीसदी बढ़ा है, फिर भी सामान्य का 82.4 फ़ीसदी ही है। और धान, जिसकी 13.19 लाख हेक्टेयर की गिरावट पर सबकी नज़र है, सामान्य का 98.3 फ़ीसदी है — यानी सबसे कम चिंता की बात।
श्री अन्न का रक़बा घट रहा है। रागी सामान्य का सिर्फ़ 40 फ़ीसदी और कपास 86 फ़ीसदी है, जबकि सबसे ज़्यादा पानी माँगने वाला गन्ना सामान्य से क़रीब 8 फ़ीसदी ऊपर बोया गया है।
पिछले साल से तुलना करेंगे तो फ़सल ठीक-ठाक लगेगी। सामान्य से तुलना करेंगे तो पता चलेगा कि किसान ने कौन-सी फ़सल छोड़ दी है।
एक नज़र में
• कुल बुवाई: 1,056.70 लाख हेक्टेयर — सामान्य का 95.7%
• पिछले साल से: 16.07 लाख हेक्टेयर या 1.50% कम
• रागी: सामान्य का सिर्फ़ 40% — सबसे बड़ी गिरावट
• कपास: सामान्य का 86.4%, यानी 17.06 लाख हेक्टेयर कम
• गन्ना: सामान्य का 107.8% — एकमात्र फ़सल जो ऊपर है
• धान: सामान्य का 98.3%
• दलहन: 1.49 लाख हेक्टेयर ज़्यादा, यूपी अकेले 3.97 लाख
• मक्का: सामान्य का 110.8%, पर पिछले साल से 4.06% कम
अब इसे पानी से जोड़कर देखिए। गन्ना इकलौती बड़ी फ़सल है जो सामान्य से ऊपर बोई गई है — 58.44 लाख हेक्टेयर, जबकि सामान्य 54.20 लाख है, यानी 107.8 फ़ीसदी। और गन्ना इस पूरी सूची में सबसे ज़्यादा पानी माँगने वाली फ़सल है। दूसरी तरफ़ रागी, जो सबसे कम पानी में हो जाती है और पोषण में सबसे अच्छी है, अपने रक़बे का तीन-पाँचवाँ हिस्सा गँवा चुकी है।
यह मानसून की कहानी नहीं है, भाव और ख़रीद की कहानी है। किसान वही बोता है जिसका ख़रीदार पक्का हो और दाम तय हो। गन्ने के पास उचित एवं लाभकारी मूल्य है और मिल पर पेराई की क़ानूनी ज़िम्मेदारी भी। मोटे अनाज के पास इतनी मज़बूती से न ख़रीदार है, न भाव — श्री अन्न के प्रचार के बावजूद। आगे का रास्ता वही है जो हरियाणा ने धान से हटने पर सीधे भुगतान देकर दिखाया — जहाँ किसान को फ़सल बदलने के पैसे मिले, वहाँ रक़बा हिला। और उत्तर प्रदेश का एक ही सीज़न में 3.97 लाख हेक्टेयर दलहन बढ़ा देना यही साबित करता है कि प्रोत्साहन सही हो तो किसान तुरंत जवाब देता है।












