ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।सरकार ने गेहूँ से बनने वाले उत्पादों के निर्यात पर लगी रोक हटा दी है। सीधी बात यह है कि अब देश की आटा चक्कियाँ और रोलर फ़्लोर मिलें विदेश में माल भेज सकेंगी — और इसका असर गेहूँ के भाव तक पहुँचेगा।
विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफ़टी) ने गेहूँ के आटे और उससे जुड़े उत्पादों की निर्यात नीति में तुरंत प्रभाव से बदलाव कर दिया है। इसका मतलब है कि आटा, मैदा, सूजी और गेहूँ से बनने वाले दूसरे उत्पाद अब विदेश भेजे जा सकते हैं। एक अलग अधिसूचना में सरकार ने कुछ तय श्रेणियों के गेहूँ और ड्यूरम गेहूँ को भी “प्रतिबंधित” से हटाकर “मुक्त” कर दिया है।
यह रोक कोई पुरानी बात नहीं थी। 2022 में जब अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में गेहूँ के दाम अचानक ऊपर चले गए थे और घरेलू भाव भी चढ़ने लगे थे, तब सरकार ने घर के उपभोक्ता को बचाने के लिए निर्यात पर पाबंदी लगाई थी। वह क़दम उस वक़्त की ज़रूरत था। अब उसे हटाया जा रहा है, और यही इस ख़बर की असली बात है — सरकार को भरोसा है कि देश में गेहूँ का पर्याप्त स्टॉक है।
चक्की से बंदरगाह तक। निर्यात खुलने का सबसे पहला फ़ायदा उन आटा मिलों को होगा जिनकी क्षमता ख़ाली पड़ी थी। किसान तक असर मंडी के भाव के रास्ते पहुँचेगा।
निर्यात खुलने का फ़ायदा किसान को सीधे नहीं मिलता। वह मिल के ऑर्डर से मंडी की माँग तक, और मंडी की माँग से भाव तक — इसी रास्ते आता है।
एक नज़र में
• क्या बदला: आटा, मैदा, सूजी समेत गेहूँ उत्पादों का निर्यात खुला
• कब से: तुरंत प्रभाव से
• किसने किया: विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफ़टी)
• दूसरी अधिसूचना: तय श्रेणियों का गेहूँ और ड्यूरम गेहूँ अब “मुक्त”
• रोक कब लगी थी: 2022 के भाव बढ़ने के दौर में
• पहला फ़ायदा: रोलर फ़्लोर मिलें और आटा चक्कियाँ
• ध्यान रखें: यह छूट है, कोई सब्सिडी या समर्थन मूल्य नहीं
अब सवाल यह कि आपकी रसोई पर क्या असर पड़ेगा। घबराने की बात नहीं है। निर्यात खुलने का मतलब यह नहीं कि कल से आटा महँगा हो जाएगा — सरकार के पास खुले बाज़ार बिक्री योजना का हथियार बना हुआ है, जिसके ज़रिए भाव चढ़ने पर गोदाम से गेहूँ बाज़ार में उतारा जाता है। हाँ, अगर निर्यात की माँग तेज़ हुई तो मिलों को गेहूँ ख़रीदने में मुक़ाबला करना पड़ेगा, और इसका थोड़ा फ़ायदा मंडी में बेचने वाले किसान को मिलेगा।
किसान के लिए असली बात रबी के सीज़न में दिखेगी। अक्टूबर-नवंबर में जब गेहूँ की बुवाई होगी, तब किसान के सामने यह जानकारी होगी कि निर्यात का दरवाज़ा खुला है। बड़ी बात यह है कि इससे बुवाई का रक़बा बढ़ने की गुंजाइश बनती है, ख़ासकर उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और मध्य प्रदेश में। आगे का रास्ता साफ़ है — सरकार निर्यात की खिड़की को स्थिर रखे और बार-बार खोलने-बंद करने से बचे, क्योंकि व्यापारी और मिल मालिक तभी विदेशी ख़रीदार से लंबा सौदा करते हैं जब उन्हें भरोसा हो कि नीति छह महीने बाद भी वही रहेगी। नीति का टिकाऊ होना, ख़ुद नीति से बड़ी चीज़ है।












