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बिहार के किसान फिर पीएम फसल बीमा के दायरे में

by ब्लिट्ज़ इंडिया
August 18, 2026
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मानसून

ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।बिहार में आठ साल से किसान अपनी अलग राज्य योजना के भरोसे थे। अब रबी 2026-27 से प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना लौट रही है। दोनों में सबसे बड़ा फ़र्क़ एक ही बात का है — कितनी ज़मीन का बीमा हो सकता है।

बिहार सरकार ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफ़बीवाई) को राज्य में लागू करने का फ़ैसला किया है, जो रबी 2026-27 सीज़न से प्रभावी होगा। यह 2018 से चल रही बिहार राज्य फसल सहायता योजना की जगह लेगी। सहकारिता विभाग ने इसकी तैयारी और प्रशिक्षण शुरू कर दिया है। दरअसल बिहार ने 2018 में केंद्र की योजना से हटकर अपनी सहायता योजना शुरू की थी, जिसमें फ़सल के नुक़सान पर प्रति हेक्टेयर एक तय राशि दी जाती थी, प्रीमियम नहीं लिया जाता था, और मदद एक तय रक़बे तक सीमित रहती थी।

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पीएम फसल बीमा में बीमा कराने के लिए ज़मीन की कोई ऊपरी सीमा नहीं है। जिसके पास दस बीघा है, उसकी पूरी दस बीघा का बीमा होगा।

एक नज़र में

• कब से: रबी 2026-27 सीज़न से
• किसकी जगह: बिहार राज्य फसल सहायता योजना (2018 से लागू)
• सबसे बड़ा फ़र्क़: बीमा योग्य ज़मीन पर कोई ऊपरी सीमा नहीं
• किसान का प्रीमियम: रबी फ़सलों पर बीमित राशि का 1.5 फ़ीसदी
• बाक़ी प्रीमियम: केंद्र और राज्य सरकार मिलकर देती हैं
• कहाँ आवेदन: pmfby.gov.in, सीएससी केंद्र, या बैंक/सहकारी समिति
• ज़रूरी काग़ज़: आधार, बैंक पासबुक, ज़मीन का काग़ज़, बुवाई प्रमाण

अब समझिए कि व्यवहार में इसका मतलब क्या है। राज्य की सहायता योजना में किसान को प्रीमियम नहीं देना पड़ता था, यह उसकी सबसे बड़ी ख़ूबी थी। लेकिन उसमें मदद एक तय रक़बे तक और एक तय राशि तक सीमित थी — यानी जिसके पास ज़्यादा ज़मीन थी, उसके नुक़सान का बड़ा हिस्सा उसी के खाते में रह जाता था। पीएम फसल बीमा में किसान को रबी की फ़सल पर बीमित राशि का सिर्फ़ 1.5 फ़ीसदी प्रीमियम देना होता है, बाक़ी केंद्र और राज्य मिलकर भरते हैं, और बीमा पूरी बोई गई ज़मीन का होता है। छोटे किसान के लिए यह बदलाव मामूली लग सकता है, पर दो-तीन हेक्टेयर वाले मझोले किसान के लिए यही फ़र्क़ बाढ़ के साल में सब कुछ तय करता है।

किसान को अभी से तीन काम कर लेने चाहिए। पहला, ज़मीन के काग़ज़, आधार और बैंक खाते का ब्योरा एक जगह तैयार रखें — रबी की नामांकन खिड़की सीमित दिनों की होती है और आख़िरी हफ़्ते में सीएससी केंद्रों पर भीड़ लग जाती है। दूसरा, बुवाई का प्रमाण संभालकर रखें, क्योंकि दावा उसी से जुड़ता है। तीसरा, ग़ैर-ऋणी किसान भी इस योजना में शामिल हो सकते हैं — यह ज़रूरी नहीं कि केसीसी या फ़सल ऋण लिया हो। राज्य के सामने असली चुनौती दावों के निपटारे की रफ़्तार होगी, क्योंकि किसान का भरोसा प्रीमियम की दर से नहीं, पैसे के खाते में पहुँचने की तारीख़ से बनता है। अगर बिहार पहले ही सीज़न में दावा-निपटारे का समय सार्वजनिक रूप से बताता चले, तो योजना की स्वीकार्यता तेज़ी से बढ़ेगी।

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