ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली। बैंकों में जमा पैसा दिसंबर 2016 के बाद सबसे तेज़ रफ़्तार से बढ़ा है। पर यह इसलिए नहीं हुआ कि लोग अचानक ज़्यादा बचत करने लगे। वजह एक ऐसी व्यवस्था है जिसका नाम ज़्यादातर जमाकर्ताओं ने सुना तक नहीं होगा।
रिज़र्व बैंक के पंद्रह दिन के आँकड़ों के मुताबिक़ 31 जुलाई 2026 तक बैंकों में जमा 15.4 फ़ीसदी की सालाना रफ़्तार से बढ़ी, जो दिसंबर 2016 के बाद सबसे ऊँची है। पंद्रह दिन पहले, 15 जुलाई को, यह रफ़्तार 12.7 फ़ीसदी थी। इसी पखवाड़े में जमा ₹6.61 लाख करोड़ बढ़कर कुल ₹269.41 लाख करोड़ हो गई। दूसरी तरफ़ बैंकों का कर्ज़ 19.3 फ़ीसदी की रफ़्तार से बढ़ा — मई 2024 के बाद सबसे तेज़ — और ₹3.43 लाख करोड़ बढ़कर ₹220.78 लाख करोड़ हो गया।
₹269.41 लाख करोड़ जमा: रिज़र्व बैंक की जून वाली सुविधा — जिसमें हेजिंग का पूरा ख़र्च केंद्रीय बैंक उठा रहा है — इस तेज़ी के पीछे है।
बैंक अब भी जमा से ज़्यादा तेज़ी से कर्ज़ बाँट रहे हैं — 3.9 प्रतिशत अंक ज़्यादा। पर इस पखवाड़े में जमा, कर्ज़ से लगभग दोगुनी आई। यही राहत की बात है।
एक नज़र में
• आँकड़ा: रिज़र्व बैंक, 31 जुलाई 2026 की स्थिति
• जमा वृद्धि: 15.4% — दिसंबर 2016 के बाद सबसे तेज़
• 15 जुलाई को: 12.7%
• कर्ज़ वृद्धि: 19.3% — मई 2024 के बाद सबसे तेज़
• अंतर: कर्ज़ जमा से 3.9 प्रतिशत अंक आगे
• पखवाड़े में: जमा +₹6.61 लाख करोड़ · कर्ज़ +₹3.43 लाख करोड़
• कुल जमा: ₹269.41 लाख करोड़ · कुल कर्ज़: ₹220.78 लाख करोड़
• कर्ज़-जमा अनुपात: करीब 82%
• वजह: जून 2026 में शुरू एनआरआई विदेशी मुद्रा जमा (3–5 साल) की सुविधा, जिसमें हेजिंग का पूरा ख़र्च रिज़र्व बैंक उठा रहा है
दरअसल पंद्रह दिन में जमा की रफ़्तार 2.7 प्रतिशत अंक बढ़ जाना आम बचतकर्ता की आदत से नहीं होता — आम आदमी की बचत इतनी तेज़ी से नहीं बदलती। इसके पीछे जून में शुरू हुई रिज़र्व बैंक की एक सुविधा है, जिसमें प्रवासी भारतीयों की तीन से पाँच साल की विदेशी मुद्रा जमा पर हेजिंग यानी मुद्रा जोखिम से बचाव का पूरा ख़र्च केंद्रीय बैंक ख़ुद उठा रहा है। यही ख़र्च वह अड़चन थी जिसकी वजह से बैंक ऐसी जमा लेने से हिचकते थे। जमाकर्ता को कितना ब्याज मिलेगा, यह इससे नहीं बदला — बैंक कितना दे सकता है, वह बदल गया।
अब बात इसकी कि इसका आप पर क्या असर पड़ेगा। बैंकों के पास कुल ₹269.41 लाख करोड़ जमा है और ₹220.78 लाख करोड़ कर्ज़ बँटा है — यानी हर पाँच रुपये में से चार बँटे हुए हैं। जब यह अनुपात इतना ऊँचा हो, बैंक जमा खींचने के लिए एफ़डी पर ब्याज बढ़ाते हैं और कर्ज़ महँगा रखते हैं। अगर जमा इसी रफ़्तार से आती रही तो बैंकों पर यह दबाव घटेगा, और उसका सीधा फ़ायदा नए क़र्ज़ लेने वालों को मिल सकता है। पर एक बात साफ़ रहे — यह पंद्रह दिन का आँकड़ा है। एनआरआई जमा किश्तों में आती है, इसलिए एक अच्छा पखवाड़ा अभी रुझान नहीं है। असली सवाल यह है कि इन ₹6.61 लाख करोड़ में से घरेलू जमा कितनी है। अगर देसी बचत भी लौटी है, तो यह ख़बर कहीं बड़ी है।











