ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।इस बार की बुवाई का आँकड़ा आ गया है। पूरे देश की बुवाई पिछले साल से करीब दो फ़ीसदी कम है — लेकिन इसका असर आप पर कैसे पड़ेगा, यह कुल आँकड़े से नहीं, इस बात से तय होगा कि कमी किस फ़सल में है। और लगभग पूरी कमी एक ही फ़सल में है।
14 अगस्त तक देश में खरीफ़ फ़सलों की बुवाई 1,016.57 लाख हेक्टेयर पर पहुँची, जबकि पिछले साल इसी समय तक 1,037.52 लाख हेक्टेयर हो चुकी थी। यानी 20.95 लाख हेक्टेयर की कमी। अब इसके अंदर जाइए। धान इस बार 379.07 लाख हेक्टेयर में लगा है, पिछले साल 393.44 लाख हेक्टेयर में लगा था — 14.37 लाख हेक्टेयर कम। सीधी बात यह है कि पूरे देश की जितनी कमी है, उसका 68.6 फ़ीसदी अकेले धान का है।
और अब वह आँकड़ा जो ज़्यादातर जगह छपा ही नहीं। उड़द-मूँग जैसी दालें इस बार 108.14 लाख हेक्टेयर में हैं, पिछले साल 108.49 लाख हेक्टेयर में थीं। फ़र्क़ सिर्फ़ 0.35 लाख हेक्टेयर — इतने बड़े रकबे पर यह फ़र्क़ न के बराबर है। यानी उसी मौसम में, उसी बारिश में, धान पिछड़ गया और दाल टिकी रही।
कमी का दो-तिहाई हिस्सा एक ही फ़सल का: 14 अगस्त तक की 20.95 लाख हेक्टेयर की कमी में से 14.37 लाख हेक्टेयर अकेले धान की है। दालें लगभग पिछले साल जितनी ही हैं।
वजह एक शब्द में है — पानी। रोपाई वाले धान को जितना पानी चाहिए, उड़द और मूँग को उसका एक हिस्सा भर चाहिए। बारिश कमज़ोर हो तो धान रुक जाता है, दाल चलती रहती है।
एक नज़र में
• कुल खरीफ़ बुवाई (14 अगस्त 2026 तक): 1,016.57 लाख हेक्टेयर
• पिछले साल इसी समय: 1,037.52 लाख हेक्टेयर
• कुल कमी: 20.95 लाख हेक्टेयर, करीब 2%
• धान इस बार: 379.07 लाख हेक्टेयर
• धान पिछले साल: 393.44 लाख हेक्टेयर
• धान की कमी: 14.37 लाख हेक्टेयर — कुल कमी का 68.6%
• दालें इस बार: 108.14 लाख हेक्टेयर
• दालें पिछले साल: 108.49 लाख हेक्टेयर — लगभग बराबर
अब सवाल यह कि इससे घर के बजट पर क्या फ़र्क़ पड़ेगा। दो फ़ीसदी की कमी अपने आप में डरने वाली बात नहीं है, और देश के गोदामों में चावल का भंडार ठीक-ठाक है। लेकिन धान की कमी 3.7 फ़ीसदी है, यानी कुल कमी से लगभग दोगुनी, और चावल हमारे यहाँ सिर्फ़ एक फ़सल नहीं — वह राशन की दुकान से लेकर मंडी तक की पूरी व्यवस्था का आधार है। दूसरी तरफ़ दालें, जिनका भाव हर रसोई सीधे महसूस करती है, इस बार दबाव में नहीं दिखतीं। यह इस साल की सबसे राहत वाली बात है।
बड़ी बात यह है कि यह कोई एक साल की कहानी नहीं है। हर बार जब बारिश कमज़ोर होती है, यही होता है — धान पीछे, दाल टिकी हुई। किसान का फ़ैसला ग़लत नहीं है: धान पर एमएसपी की ख़रीद पक्की है, बीमा है, और नलकूप की बिजली सस्ती है। दाल पर वह भरोसा उतना नहीं। यानी पानी कम होने पर भी व्यवस्था किसान को धान की ओर ही धकेलती है। आगे का रास्ता किसी से कुछ छीनने का नहीं है — धान के किसान को जो मिल रहा है वह मिलता रहे। बस मूँग और उड़द बोने वाले किसान को भी ख़रीद और बीमा का उतना ही भरोसा मिल जाए, तो अगली कमज़ोर बारिश देश को इतनी महँगी नहीं पड़ेगी। इस साल के आँकड़े ने यह प्रयोग मुफ़्त में कर के दिखा दिया है।












