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खाड़ी में तनाव से सप्लाई चेन स्थिर रखने के लिए मोदी सरकार ने कसी कमर…

युद्ध की चुनौतियों का मजबूती से सामना कर रहा नमो भारत

by ब्लिट्ज़ इंडिया
March 10, 2026
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विनोद शील

नई दिल्ली। अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रही लड़ाई का दायरा दिन-प्रति-दिन बढ़ता जा रहा है। यह सीधे तौर पर भारत के मुख्य राष्ट्रीय हितों पर असर डाल रहा है। भारत के लिए, पश्चिम एशिया केवल लड़ाई का मैदान भर नहीं है बल्कि यह उसकी एनर्जी सिक्योरिटी, डायस्पोरा वेलफेयर, ट्रेड कनेक्टिविटी और स्ट्रेटेजिक बैलेंसिंग और घरेलू आर्थिक चिंता का प्रमुख कारण बन सकता है।

गौरतलब है कि अमेरिका-इजरायल ने संयुक्त ऑपरेशन के तहत गत शनिवार को अचानक ईरान पर मिसाइल अटैक कर दिया था जिसके जवाब में ईरान ने भी खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी एयरबेस को निशाना बनाया। अमेरिका-इजरायल के ईरान से युद्ध को एक हफ्ते से अधिक समय हो चुका है। इस संघर्ष में अब तक 1000 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। अमेरिका और इजरायल ने ईरान की नौसेना पर भी बड़ा हमला बोला है। हिंद महासागर क्षेत्र में ईरान के युद्धपोत आईआरआईएस डेना को भी एक पनडुब्बी हमले में डुबो दिया गया है। हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई और शीर्ष नेताओं की मौत के बाद ईरान ने नया सुप्रीम लीडर चुन लिया है। तनाव के अब सैन्य संघर्ष में बदलने के बाद इसके असर से निपटने की चुनौती भी बड़ी होती जा रही है। सबसे ज्यादा असर ग्लोबल सप्लाई चेन्स पर पड़ रहा है। भारत के लिए भी यह एक बड़ी चुनौती है; वह भी ऐसे समय जब दुनिया की अर्थव्यवस्था मंद गति से चल रही और भारत को राकेट की रफ्तार से दौड़ रही अपनी अर्थव्यवस्था की स्पीड को कायम रखना है।

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राष्ट्र के हितों की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता – बनाया इंटर मिनिस्टीरियल ग्रुप

भारत सरकार ने मध्य एशिया में युद्ध के प्रभाव से निपटने के उद्देश्य से देश की निर्यात-आयात सप्लाई चेन को मजबूत करने के लिए अंतर-मंत्रालयी समूह (इंटर मिनिस्टीरियल ग्रुप) गठित कर दिया है। वाणिज्य और उद्योग मंत्री पियूष गोयल ने इसके गठन की जानकारी दी है। गत मंगलवार को वाणिज्य मंत्रालय में लगातार दो दिन अहम स्टेकहोल्डर मंत्रालयों, प्रमुख लॉजिस्टिक्स और व्यापार सुविधा भागीदारों के साथ एक बैठक हुई जिसमें उभरती भू-राजनीतिक स्थितियों और भारत के निर्यात और आयात पर इसके संभावित प्रभाव की समीक्षा की गई।

केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पियूष गोयल के मुताबिक, एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट व्यापार की निरंतरता बनाए रखने के लिए केंद्र सरकार ने कई मोर्चों पर पहल शुरू की है जो इस प्रकार है:

व्यापार बाधित होने पर एक्सपोर्ट से जुड़े मामलों में अप्रूवल की प्रक्रिया को लचीला बनाना

एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट कन्साइनमेंट के जल्दी क्लीयरेंस के लिए सीमा शुल्क अधिकारियों के साथ समन्वय

निर्यातकों के हितों की रक्षा के लिए वित्तीय और बीमा संस्थानों के साथ निरंतर संवाद

स्टेकहोल्डर मंत्रालयों के बीच निरंतर कोआर्डिनेशन और सक्रिय समन्वय

इस संदर्भ में, मौजूदा उभरते हालात की सक्रिय निगरानी, स्टेकहोल्डर्स में प्रभावी समन्वय बनाने और भारत के निर्यात-आयात सप्लाई चेन को मजबूत करने के लिए वित्तीय सेवा विभाग (डिपार्टमेंट ऑफ फाइनेंशियल सर्विसेज), विदेश मंत्रालय, जहाजरानी, बंदरगाह और जलमार्ग मंत्रालय, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय और केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर और सीमा शुल्क बोर्ड (सेंट्रल बोर्ड ऑफ इनडायरेक्ट टैक्सेस एंड कस्टम्स) के अधिकारियों का एक अंतर-मंत्रालयी समूह गठित कर दिया गया है।

वाणिज्य मंत्रालय ने एक्सपोर्टरों और इम्पोर्टरों के लिए हेल्पलाइन नंबर भी जारी कर दिए हैं:

हेल्पलाइन-adg1-dgft@gov.in

हेल्प डेस्क नंबर- 1800-572-1550, 1800-111-550

दरअसल इजराइल-अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध का दायरा बढ़ता जा रहा है और इसके साथ ही इसके प्रभाव से निपटने की चुनौती भी बड़ी होती जा रही है। अब तक मध्य एशिया में जारी युद्ध की वजह से सामरिक दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण इस पूरे क्षेत्र में अर्थव्यवस्था और ट्रेड बुरी तरह से बाधित हो चुके हैं। सबसे ज्यादा असर ग्लोबल सप्लाई चेन्स पर पड़ा है। इसकी वजह से भारत और मध्य एशिया के देशों के साथ हर साल होने वाले अरबों डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार पर तलवार लटक रही है।

सबके साथ हुई थी बैठक
इसके असर को लेकर बढ़ती चिंता के बीच वाणिज्य मंत्रालय के विशेष सचिव ने विगत दिनों सभी स्टेकहोल्डर मंत्रालयों, और लॉजिस्टिक्स और ट्रेड पार्टनरों के साथ एक अहम समीक्षा बैठक की थी। बैठक में वाणिज्य विभाग ने आयात-निर्यात (एक्सिम) लॉजिस्टिक्स की निरंतरता सुनिश्चित करने और भारत के व्यापार प्रवाह में किसी भी व्यवधान को कम करने की भारत सरकार की प्राथमिकता को दोहराया गया था। ये तय किया गया था कि आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती बनाए रखने, निर्यातकों – विशेष रूप से एमएसएमई के हितों की रक्षा करने पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा ताकि घरेलू उत्पादन और उपभोग के लिए आवश्यक आयात पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। मध्य एशिया में युद्ध के बाद बुलाई गई पहली बड़ी बैठक में स्टेकहोल्डर्स ने वहां के हालत के भारत के एक्सपोर्ट और इम्पोर्ट पर पड़ रहे असर पर विस्तृत जानकारी पेश की थी। इसमें मार्गों और ट्रांजिट समय में बदलाव,जहाजों के शेड्यूलिंग में बदलाव, कंटेनर/उपकरणों की उपलब्धता, माल ढुलाई और बीमा लागत पर मध्य एशिया के घटनाक्रम के असर से जुड़ी अहम जानकारी पेश की गई। बैठक में जल्दी खराब होने वाले सामान, औषधि और हाई वैल्यू वाले गुड्स के लिए विशेष मैकेनिज्म तैयार करने पर भी चर्चा की गई।

4 घटनाओं में 3 भारतीय नाविकों की मौत
पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच विदेशी ध्वज वाले जहाजों पर सवार कम-से-कम तीन भारतीय नाविकों की मौत हो गई है जबकि एक अन्य घायल है। नौवहन महानिदेशालय ने यह जानकारी दी।

1100 नाविक फंसे
सैन्य सघर्ष के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरने वाला प्रमुख जहाजरानी मार्ग बंद हो गया है। इसमें 1100 से अधिक नाविकों सहित भारतीय ध्वज वाले 37 जहाज फारस की खाड़ी और आसपास के समुद्र में फंसे हैं। तेहरान में भारतीय दूतावास ने भारत के अधिकांश छात्रों को सुरक्षित क्षेत्रों में भेज दिया है।

निवेश पर नकारात्मक असर संभव
फिच ग्रुप की इकाई बीएमआई ने कहा कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष भारत में निवेश को प्रभावित कर सकता है। इसके साथ ही यह यूरोपीय संघ एवं अमेरिका के साथ हुए व्यापार समझौतों से मिलने वाले सकारात्मक प्रभाव को कुछ हद तक संतुलित कर सकता है। बीएमआई ने अपनी ‘इंडिया आउटलुक’ रिपोर्ट में कहा कि यदि ईरान संकट के कारण कच्चे तेल के दाम में 10 प्रतिशत की वृद्धि भी जीडीपी को कमजोर करेगी।

भारत को विदेश नीति करनी होगी एडजस्ट
करीब चार साल पहले जब रूस ने यूक्रेन पर हमला शुरू किया, तब भारत परेशानी में घिर गया था। दुनिया ने उस समय महामारी से उबरना शुरू ही किया था। भारतीय अर्थव्यवस्था को अच्छे बजट से रिकवरी की उम्मीद है किंतु अनचाहे युद्ध ने उस पर पानी फेर दिया है। देश एक बार फिर उसी स्थिति में खड़ा है। इस बार पश्चिम एशिया की वजह से मामला ज्यादा पेचीदा है। अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहा संघर्ष सीधे-सीधे दो ध्रुवों वाला मामला नहीं है। भारत के पास यह सुविधा भी नहीं है कि वह नैतिक सिद्धांतों पर बहस करे। वह खुद तूफान के पास खड़ा है। उसे तुरंत कुछ महत्वपूर्ण फैसले लेने होंगे। विदेश नीति की प्राथमिकताओं और रणनीतिक जरूरतों को नए सिरे से तय करना अब भारत के लिए जरूरी हो गया है।

बढ़ता खतरा : भारत की सबसे बड़ी चिंता पश्चिम एशिया में संघर्ष को फैलने को लेकर है। इस रीजन में करीब एक करोड़ भारतीय रहते हैं। एक तरह से यह भारत की रणनीतिक भौगोलिक सीमा का विस्तार है। दांव पर केवल गोल्डन वीजा धारक या दुबई में दूसरा घर खरीद रहे अमीर ही नहीं है। खेती से लेकर ऊर्जा तक, भारत और खाड़ी देशों के बीच सप्लाई चेन बनी हुई है।

थिंक वेस्ट : यह क्षेत्र भारत के लिए तेजी से बढ़ता हुआ बाजार है। सऊदी अरब को लीजिए तो साल 2000 में भारत का निर्यात करीब एक अरब डॉलर था, जो अब बढ़कर 12 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। यूएई और ओमान जैसे देश भारत के सबसे करीबी अरब देश बेहद महत्वपूर्ण हैं।
बढ़ते रिश्ते : साल 2014 के बाद से भारत ने आधुनिकता की ओर बढ़ रहीं अरब राजशाहियों के साथ रिश्तों को मजबूत किया है। इसे मोदी सरकार की अहम उपलब्धियों में से एक कहा जा सकता है।

संकट में संतुलन : आर्थिक और रणनीतिक लिहाज से भारत के लिए बेहद अहम है पश्चिम एशिया। पश्चिम एशिया के कई देशों साथ भारत का रक्षा सहयोग भी बढ़ा है, खासकर मैरिटाइम क्षेत्र में। आज के समय में अमेरिका पहले की तरह सुरक्षा की गारंटी नहीं दे पा रहा, इसलिए यह साझेदारी और भी जरूरी हो गई है।

किए गए उपाय
मध्य एशिया में युद्ध के प्रभावों से निपटने के लिए भारत ने निर्यात-आयात सप्लाई चेन मजबूत करने के लिए बनाई कमेटी
अंतर-मंत्रालयी समूह में वित्तीय सेवा विभाग, विदेश मंत्रालय, पेट्रोलियम और सीमा शुल्क बोर्ड के अधिकारी शामिल
निर्यातकों के हितों की रक्षा के लिए वित्तीय बीमा संस्थानों के साथ संवाद और निरंतर समन्वय को प्राथमिकता

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