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कर्ज लेने के मामले में सुधर रहा है यूपी का रिकॉर्ड

तमिलनाडु व महाराष्ट्र ने लिया सबसे ज्यादा ऋण

by ब्लिट्ज़ इंडिया
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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली। राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की वित्तीय जरूरतें तेजी से बढ़ रही हैं और इन्हें पूरा करने के लिए राज्य सरकारें अब पहले से ज्यादा बाजार कर्ज पर निर्भर होती जा रही हैं। राज्य सरकारें लंबी अवधि के बॉन्ड जारी कर पैसा जुटा रही हैं। इससे राज्यों की गारंटियों का बोझ भी बढ़ रहा है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की तरफ से जारी राज्य वित्त 2025-26 के बजटों की अध्ययन रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि राज्यों के कुल राजकोषीय घाटे (जीएफडी) का करीब 76 प्रतिशत हिस्सा बाजार से उधारी के जरिए पूरा किया जाएगा। कर्ज लेने के मामले में उत्तर प्रदेश का रिकॉर्ड लगातार सुधर रहा है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि कई राज्यों का कर्ज स्तर चिंता का विषय बना हुआ है। मार्च 2024 के अंत में राज्यों का कर्ज घटकर जीडीपी के 28.1 प्रतिशत पर आ गया था, लेकिन मार्च 2021 में 31 प्रतिशत के शिखर पर पहुंचा। हालांकि मार्च 2026 में चालू वित्तीय वर्ष की सामाप्ति पर यह फिर बढ़कर करीब 29.2 प्रतिशत होने का अनुमान है।
कई राज्यों में कर्ज का स्तर अब भी उनकी अर्थव्यवस्था के 30 प्रतिशत से ज्यादा है, जो चिंता की बात है। मौजूदा समय में तमिलनाडु (1.23 लाख करोड़) और महाराष्ट्र (1.23 लाख करोड़) कर्ज लेने में अव्वल हैं। वहीं, मध्यप्रदेश, झारखंड, उत्तराखंड और कर्नाटक जैसे राज्यों का कर्ज भी बढ़ रहा है। वर्ष 2016-17 के बाद कर्ज पर निर्भरता लगातार बढ़ती गई। कोविड के दौर में केंद्र सरकार से मिलने वाले कर्ज, खासकर जीएसटी मुआवजा और पूंजीगत खर्च के लिए दिए गए 50 साल के ब्याज मुक्त कर्ज का भी महत्व बढ़ा है। वहीं, वित्तीय संस्थानों, पब्लिक अकाउंट और नेशनल स्मॉल सेविंग्स फंड जैसे स्रोतों से कर्ज लेने का हिस्सा लगातार घटा है। इस समय सिर्फ 3 राज्य और 1 केंद्र शासित प्रदेश ही एनएसएसएफ से कर्ज ले रहे हैं।
वर्ष 2024-25 में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की कुल बाजार उधारी बढ़कर 10.73 लाख करोड़ रुपये हो गई, जो वित्तीय वर्ष 2023-24 में 10.07 लाख करोड़ रुपये थी। इस तरह से वित्तीय वर्ष के आधार पर 6.6 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।
बिहार, छत्तीसगढ़, गोवा, पंजाब और उत्तर प्रदेश को छोड़कर बाकी सभी बड़े राज्यों ने 2024-25 में बाजार से ज्यादा कर्ज लिया। खासतौर पर उत्तर प्रदेश की उधारी में इस दौरान बड़ी गिरावट दर्ज की गई। उत्तर प्रदेश ने वर्ष 2023-24 में 49618 करोड़ का कर्ज लिया था जो बीते वित्तीय वर्ष में घटकर 4500 करोड़ रहा। इसी तरह से बिहार का कर्ज 47612 करोड़ से घटकर 47546 करोड़ रहा है।
हालांकि इस अवधि में उत्तराखंड का कर्ज काफी बढ़ रहा है जो 6300 करोड़ से बढ़ाकर 10400 करोड़ रहा है। इसी तरह से झारखंड का कर्ज भी एक हजार करोड़ रुपये से बढ़कर 3500 करोड़ का रहा है।
लंबी अवधि के बॉन्ड जारी कर रही राज्य सरकारें
2024-25 में कुल 835 बार राज्य सरकारों के बॉन्ड जारी किए गए, जिनमें से 100 बार पुराने बॉन्ड दोबारा जारी किए गए। छत्तीसगढ़, जम्मू-कश्मीर, कर्नाटक, महाराष्ट्र, पुडुचेरी, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल ने री-इश्यू का सहारा लिया। रिपोर्ट से पता चलता है कि अब राज्य सरकारें पहले से लंबी अवधि के बॉन्ड जारी कर रही हैं। 2024-25 में 10 साल की अवधि वाले बॉन्ड का हिस्सा घटकर 14.5 प्रतिशत रह गया, जबकि बाकी बॉन्ड 35 साल की अवधि तक के थे।
केरल, तमिलनाडु, तेलंगाना और जम्मू-कश्मीर जैसे कुछ राज्यों ने 20 साल से ज्यादा अवधि वाले बॉन्ड भी जारी किए हैं। मार्च 2025 के अंत तक कुल बकाया बॉन्ड में से 7.2 प्रतिशत की अवधि 20 साल से ज्यादा की थी। इसके पीछे एक कारण औसत ब्याज दर में गिरावट भी है।
वर्ष 2024-25 में राज्यों के बॉन्ड पर औसत ब्याज दर घटकर 7.2 प्रतिशत रह गई, जो पिछले साल 7.5 प्रतिशत थी।

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