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यूजीसी के नए नियम विभाजनकारी अस्पष्ट, दुरुपयोग की भी आशंका

सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक

by ब्लिट्ज़ इंडिया
February 2, 2026
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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए समता विनियम-2026 को लेकर चल रहे विवाद के बीच इन नियमों को समाज के लिए विभाजनकारी करार देते हुए क्रियान्वयन पर रोक लगा दी। शीर्ष अदालत ने कहा, पहली नजर में इन नियमों की भाषा अस्पष्ट है और इनके दुरुपयोग की पूरी आशंका है। यदि इस मामले में हस्तक्षेप नहीं किया गया, तो इसके खतरनाक परिणाम होंगे। समाज बंट जाएगा और इसके गंभीर नतीजे होंगे।
मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा, 75 वर्षों के बंद, व्यक्तिविहीन समाज की दिशा में हमने जो कुछ भी हासिल किया है, क्या हम प्रतिगामी दिशा में जा रहे हैं? पीठ ने भारतीय शिक्षण संस्थानों में समावेशिता और एकता की रक्षा करने की जरूरत पर जोर दिया। पीठ ने केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी कर 19 मार्च तक जवाब तलब किया है। उन्होंने विनियम की जांच विशेषज्ञ समिति से कराने की भी जरूरत बताई। साथ ही स्पष्ट किया कि अगले आदेश तक समता विनियम-2026 स्थगित रहेंगे और शैक्षणिक संस्थानों में 2012 की पुरानी नियमावली ही लागू होगी।
पीठ ने नए नियमों के उन प्रावधानों पर कड़ी आपत्ति जताई, जो कैंपस के भीतर जातिगत आधार पर विभाजन का संकेत देते हैं। अलग-अलग जातियों के लिए अलग हॉस्टल के विचार पर सीआई सूर्यकांत ने सख्त लहजे में कहा, भगवान के लिए ऐसा मत कीजिए। हम सब सदियों से साथ रहते आए है, हमारे समाज में अंतरविवाद तक होते हैं। क्या हम एक जातिविहीन समाज की ओर बढ़ने के बजाय पीछे जा रहे हैं?
विधि विशेषज्ञों की समिति बनाइये
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, इन नियमों की पुनर्समीक्षा बहुत जरूरी है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को पीठ ने सुझाव दिया कि नियमों की पुनर्समीक्षा के लिए प्रख्यात विधिवेत्ताओं की एक उच्चस्तरीय समिति बनानी चाहिए। समिति समाज को वास्तविकताओं और सामाजिक मूल्यों को ध्यान में रखते हुए नियमों पर पुनर्विचार करे। हमें वह भी देखना होगा कि कैंपस के भीतर लिए गए फैसलों का कैंपस के बाहर समान पर क्या असर पढ़ेगा। समाज का विकास तभी होगा जब नियम समावेशी होंगे।
रैगिंग से बचाने के लिए प्रभावी तंत्र क्यों नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि यदि सामान्य वर्ग के किसी विद्यार्थी के साथ रैगिंग होती है या क्षेत्रीयता के आधार पर अपमानजनक व्यवहार होता है, तो नए नियमों में उसके संरक्षण के लिए कोई प्रभावी तंत्र क्यों नहीं है?
समानता के अधिकार का उल्लंघन
याचिकाकर्ताओं के वकील विष्णुकर जैन ने दलील दी कि नई व्यवस्था का नियम 3(1) (सी) भेदभाव की सुरक्षा को केवल एससी-एसटी व ओबीसी वर्ग तक सीमित करता है। इसमें सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों से भेदभाव को पूरी तरह अनदेखा किया है। यह संविधान प्रदत्त समानता के अधिकार का सीधा उल्लंघन है।
विचार के लिए तय किए महत्वपूर्ण सवाल-
जब उपनियम 3 (ई) में भेदभाव की परिभाषा पहले से ही बेहद व्यापक और समावेशी है, तो क्या 3(सी) के तहत जाति-आधारित भेदभाव को अलग से परिभाषित करना सही और तर्कसंगत है? खासकर तब जब ऐसे भेदभाव से निपटने के लिए कोई अलग या विशेष प्रक्रिया तय नहीं की गई है।
• क्या इन नियमों से एससी-एसटी ओबीसी के तहत आने वाली सबसे ज्यादा पिछड़ी जातियों के मौजूदा उपवर्गीकरण पर कोई असर पड़ेगा?
• क्या ये नियम इन जातियों में मौजूद सबसे पिछड़ी जातियों को भेदभाव से बचाने के लिए पर्याप्त सुरक्षा देते हैं?
• क्या भेदभाव के विशिष्ट रूप में रैगिंग शब्द को छोड़ देना, नए विनियम में प्रतिगामी व बहिष्कृत विधायी चूक है?
• यदि हां, तो क्या ऐसी चूक इन्साफ तक पहुंच में विषमता पैदा करके भेदभाव पीड़ितों के साथ असमान व्यवहार नहीं करती? यह संविधान के अनुच्छेद 14 व 21 के तहत मिले मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं है?

– शीर्ष अदालत का केंद्र व यूजीसी को नोटिस
– सुनवाई पूरी होने तक 2012 की पुरानी नियमावली ही प्रभावी

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