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देशहित के काम का विरोध क्यों?

by ब्लिट्ज़ इंडिया
November 1, 2025
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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।अगर अवैध रूप से भारत में आए लोगों का नाम मतदाता सूचियों से बाहर किया जाता है तो यह भी भारतीय लोकतंत्र के लिए एक संजीवनी का ही काम करेगा।

चुनाव आयोग ने सोमवार 27 अक्टूबर को मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दूसरे चरण का एलान कर दिया है। एसआईआर के इस 2.0 चरण के तहत देश के 12 राज्यों में एसआईआर की प्रक्रिया को अंजाम दिया जाएगा। एसआईआर के इस चरण के तहत तारीखों का एलान भी कर दिया गया है। इस बार एसआईआर में कागज नहीं दिखाना होगा। एसआईआर के दूसरे चरण में 51 करोड़ मतदाता शामिल होंगे। इसकी प्रक्रिया 28 अक्टूबर से शुरू हो गई है। 4 नवंबर से 4 दिसंबर तक बीएलओ घर-घर जाकर एसआईआर की प्रक्रिया पूरी करेंगे। 7 फरवरी 2026 को फाइनल लिस्ट जारी होते ही यह प्रक्रिया पूर्ण हो जाएगी। असम में नागरिकता अधिनियम और एनआरसी की वजह से एसआईआर की प्रक्रिया अलग होगी और इसके लिए अलग से तारीख घोषित की जाएगी। अजीब बात यह है कि चुनाव आयोग के एलान के बाद से ही इस पर राजनीतिक विवाद भी शुरू हो गया है। कई राजनीतिक पार्टियों ने चुनाव आयोग की घोषणा पर सवाल खड़े किए और तमिलनाडु की सत्ताधारी डीएमके ने तो चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर ही सवाल उठा दिए और विपक्ष यह काम तभी से करता आ रहा है जब चुनाव से पहले चुनाव आयोग ने बिहार में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण की घोषणा की थी। यहां तक कि पूरा विपक्ष एसआईआर के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया ताकि इस पर रोक लगवाई जा सके किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने एसआईआर की प्रक्रिया पर रोक नहीं लगाई। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग द्वारा एसआईआर कराया जाना उसका संवैधानिक कर्तव्य है।
बिहार में एसआईआर पर संसद में प्रदर्शन भी हुए पर अदालत में ‘लोक’ भी जीता और ‘तंत्र’ भी। एसआईआर रुका नहीं। अब इसका सबसे ज्यादा विरोध पश्चिम बंगाल, तमिनलाडु और केरल में हो रहा है। इन तीनों ही राज्यों में इंडिया गठबंधन के सहयोगी दलों की सरकारें हैं। टीएमसी ने एलान किया है कि आने वाली 2 नवंबर को कोलकाता में एसआईआर के विरोध में विशाल रैली का आयोजन किया जाएगा। यही नहीं, एसआईआर की घोषणा के साथ ही ममता सरकार ने पश्चिम बंगाल में 10 जिलों के डीएम समेत 64 आईएएस बदल डाले। बड़े पैमाने पर हुए तबादले विवादों के दायरे में आ गए हैं जबकि चुनाव आयोग की घोषणा के बाद ऐसा कदम नहीं उठाया जाना चाहिए था। ममता बनर्जी एसआईआर को एनआरसी का दूसरा रूप बताती हैं तो बंगाल बीजेपी कहती है कि ठीक से एसआईआर हो गया तो बंगाल में एक करोड़ से अधिक अवैध वोटर्स का नाम कट जाएगा। भाजपा नेता कहते हैं कि देशहित के हर काम का विपक्षी विरोध करते हैं जबकि सभी राज्य सरकारों से जिम्मेदारी के साथ इसमें सहयोग की उम्मीद की जाती है।
वस्तुतः एसआईआर की चुनाव आयोग की घोषणा अत्यधिक स्वागत योग्य कदम है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने बताया कि इस महा अभियान में 7 लाख से अधिक भू-स्तरीय एजेंट (बीएलए) इस काम को अंजाम देंगे। इसमें कोई संदेह नहीं है कि एक सफल लोकतंत्र की पहली पहचान यही है कि उसकी चुनाव प्रक्रिया में सभी हितधारकों का भरोसा हो। इसके पहले भी आम चुनाव से लेकर अभी तक सरकारों व निर्वाचन आयोग ने चुनाव सुधार के लिए अनेक कदम उठाए हैं। इनमें इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के इस्तेमाल से लेकर आदर्श आचार संहिता लागू करने, उम्मीदवारों को अपने खिलाफ कायम आपराधिक मुकदमों की घोषणा करने के लिए बाध्य करने और 2 साल से अधिक कैद की सजा पाए लोगों के चुनाव लड़ने पर रोक जैसे कई उपाय शामिल हैं। यकीनन इन सभी कदमों का कमोबेश बेहतर प्रभाव चुनाव प्रक्रिया पर दिखाई दिया है। मतदाता सूची का गहन परीक्षण आजादी के बाद से नौवीं बार किया जा रहा है जिसके तहत कई तरह की विसंगतियां दूर की जाएंगी। जन प्रतिनिधित्व कानून 1950 की धारा 21 चुनाव आयोग को मतदाता सूची तैयार करने और उनको संशोधित करने का अधिकार प्रदान करती है। होना तो यह चाहिए कि चुनाव आयोग के साथ विवादों को जन्म देने के बजाय राजनीतिक पार्टियां भी अपनी जिम्मेदारी समझें। वे सिर्फ दोषारोपण करने तक सीमित न रहें बल्कि इस पूरी प्रक्रिया में जिम्मेदारी के साथ अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन करें। वैसे यह भी हमेशा दिमाग में रखना चाहिए कि पार्टी कोई भी हो; चाहे वह सत्ता में हो या सत्ता से बाहर, देशहित के किसी काम का हर बार विरोध करना उचित करार नहीं दिया जा सकता। इसी क्रम में अगर अवैध रूप से भारत में आए लोगों का नाम मतदाता सूचियों से बाहर किया जाता है तो यह भी भारतीय लोकतंत्र के लिए एक संजीवनी का ही काम करेगा।

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