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पत्नी ने पति को पीठ पर उठाकर पूरी की 150 किमी की कांवड़ यात्रा

हर कोई कह रहा, 'बीवी हो तो ऐसी', सरकार से मांगी रोजगार की मदद

by ब्लिट्ज़ इंडिया
July 25, 2025
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ब्लिट्ज ब्यूरो

मुजफ्फरनगर। कांवड़ यात्रा का ये सावन, एक ऐसी महिला शिव भक्त की कहानी लेकर आया है जिसने श्रद्धा और सेवा की ऐसी मिसाल पेश की है कि हर कोई कह उठा “बीवी हो तो ऐसी।” हरिद्वार से मोदीनगर तक करीब 150 किलोमीटर की पैदल कांवड़ यात्रा में एक पत्नी ने अपने दिव्यांग पति को पीठ पर बैठाकर न सिर्फ उसकी मनोकामना पूरी की, बल्कि समाज के लिए निष्ठा, प्रेम और समर्पण का संदेश भी दे दिया।
पति हुआ पैरालाइज
यह कहानी है आशा की, जो अपने पति सचिन के साथ हरिद्वार से गंगाजल लेकर निकली । सचिन कभी हर साल पैदल कांवड़ यात्रा करते थे, लेकिन पिछले वर्ष रीढ़ की हड्डी के ऑपरेशन के बाद वे पैरालाइज हो गए और चलने में असमर्थ हो गए। इस बार जब कांवड़ यात्रा का समय आया, तो पत्नी ने निर्णय लिया कि वह अपने पति को पीठ पर बैठाकर कांवड़ यात्रा पूरी करेंगी। उनका लक्ष्य है, भगवान भोलेनाथ से मन्नत मांगना कि सचिन एक बार फिर अपने पैरों पर खड़े हो सकें।
पति की सेवा में ही मेवा है, बाकी सब व्यर्थ
आशा ने अपने दो बच्चों के साथ कांवड़ यात्रा की यात्रा की और हर दिन कुछ किलोमीटर चलकर धीरे-धीरे मंजिल की ओर बढ़ी। रास्ते में लोग हाथ जोड़ते रहे, ताली बजाते रहे और इस सेवा भावना को सलाम करते रहे। खुद आशा कहती हैं, “पति की सेवा में ही मेवा है, बाकी सब व्यर्थ है।” आशा बताती हैं कि उनके पति सचिन पहले घर चलाने वाले इकलौते सदस्य थे और पेंटिंग व पीओपी का काम करते थे लेकिन बीमारी के बाद घर की आर्थिक स्थिति बिगड़ गई है। कई दिनों तक घर में सब्जी नहीं बनती, बच्चे भी बिना शिकायत के सूखी रोटी या चटनी से खाना खा लेते हैं। सचिन का इलाज आयुष्मान कार्ड से संभव हो पाया, नहीं तो आज वह जीवित भी न होते।
पति सचिन की आपबीती
सचिन बताते हैं, “1 अगस्त को मेरा ऑपरेशन हुआ था, तभी से पैरालाइज्ड हूं। मैंने कभी नहीं कहा कि मुझे लेकर हरिद्वार चलो, लेकिन आशा खुद ही कहने लगी कि इस बार वह मुझे नहला कर और कंधों पर बैठाकर मंदिर तक लेकर जाएगी। 16 साल से मैं कांवड़ ला रहा हूं, लेकिन यह 14वीं कांवड़ मेरी पत्नी की पीठ पर है। आज घर की हालत खराब है, बेटा बीमार है, और मैं खुद कुछ कर नहीं पा रहा, पर मेरे गुरुजी और बाबा हमेशा साथ हैं।” उन्होंने कहा, “आज का समाज बहुत बदल गया है, पर बदलाव हम जैसे लोगों के हाथ में है। यह समाज की सोच बदलने वाली तस्वीर है।”
सरकार से अपील
आशा चाहती हैं कि सरकार उनके पति को कोई रोजगार दे सके या कुछ सहयोग दे जिससे उनका घर फिर से संभल सके। उनका स्पष्ट कहना है कि अगर सहायता नहीं मिली तो उनका संघर्ष यूं ही जारी रहेगा, लेकिन उम्मीद की किरण अब भी भोलेनाथ की कृपा से जुड़ी हुई है।
यह कहानी नहीं, समाज को आईना है
जब एक ओर पत्नियों द्वारा किए गए अपराध सुर्खियां बन रहे हैं, वहीं आशा जैसे नाम अंधेरे में खो जाते हैं। लेकिन यह यात्रा सिर्फ कांवड़ की नहीं, एक पत्नी की आस्था, संघर्ष, सेवा और सच्चे प्रेम की यात्रा है, जो बताती है कि श्रद्धा अगर सच्ची हो, तो कठिन से कठिन राह भी पार की जा सकती है। शिवभक्ति की इस कथा ने न सिर्फ सावन को पवित्र किया है, बल्कि समाज को ये भी सिखाया है कि नारी सिर्फ श्रद्धा की मूर्ति नहीं, वह प्रेम और बलिदान की देवी भी है।

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