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इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक

by ब्लिट्ज़ इंडिया
April 4, 2025
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Allahabad High Court

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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक आदेश की उन टिप्पणियों पर रोक लगा दी, जिसमें कहा गया था कि अभियोजन के आरोप के मुताबिक ब्रेस्ट दबाना और पायजामे की डोरी खींचना बलात्कार या बलात्कार के प्रयास के अपराध की श्रेणी में नहीं आता। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बीआर गवई की अगुवाई वाली बेंच ने हाई कोर्ट के उक्त फैसले के मामले में संज्ञान लेते हुए सुनवाई की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट के आदेश में की गई कुछ टिप्पणियां असंवेदनशील और अमानवीय दृष्टिकोण को दर्शाती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले पर तत्काल रोक लगा दी।
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के उक्त आदेश पर स्वत: संज्ञान लेते हुए केंद्र सरकार, उत्तर प्रदेश सरकार और अन्य पक्षों को नोटिस जारी कर उनसे जवाब दाखिल करने को कहा है। हाईकोर्ट ने 17 मार्च को दिए अपने फैसले में कहा था कि जो केस का तथ्य है उसके तहत अभियोजन पक्ष का आरोप है कि उसके मुताबिक लड़की का प्राइवेट पार्ट पकड़ा गया और उसके पायजामे के नाड़े को तोड़ा गया और उसे घसीटने की कोशिश की गई और इसी दौरान गवाह वहां पहुंच गए जिसके बाद आरोपी भाग गए।
हाई कोर्ट ने कहा कि पहली नजर में जो तथ्य है वह रेप या रेप की कोशिश नहीं है। बल्कि यह मामला आईपीसी की धारा-354 बी (महिला पर बल प्रयोग कर उसको निर्वस्त्र का प्रयास करना) और पोक्सो की धारा-9 (नाबालिग पीड़िता पर गंभीर यौन उत्पीड़न)) का बनता है। हाई कोर्ट के जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्र की बेंच ने दो लोगों की रिविजिन पिटिशन पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की थी। याचिकाकर्ताओं (आरोपियों) ने यूपी के कासगंज के स्पेशल जज द्वारा पारित आदेश को चुनौती दी थी। स्पेशल जज ने दो आरोपियों को रेप के मामले में दोनों को समन जारी किया था।
इस तरह की टिप्पणियां कानून के मूल सिद्धांतों से परे
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के उक्त आदेश पर आपत्ति जताई और कहा कि इस तरह की टिप्पणियां कानून के मूल सिद्धांतों से परे हैं और पूरी तरह से असंवेदनशील और अमानवीय दृष्टिकोण को दर्शाती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के इस आदेश पर कड़ी असहमति जताई और इसे चौंकाने वाला करार दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि हमें यह कहने में दुख हो रहा है कि इस फैसले में, विशेष रूप से पैराग्राफ 21, 24 और 26 में, निर्णयकर्ता की पूर्ण असंवेदनशीलता झलकती है।
सोच-समझकर सुनाया फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यह निर्णय किसी जल्दबाजी में नहीं दिया गया था, बल्कि इसे चार महीने तक सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया। इसका अर्थ यह है कि न्यायाधीश ने इसे सोच-समझकर सुनाया। फिर भी, चूंकि इस फैसले की न्यायिक सिद्धांतों से कोई संगति नहीं थी और यह पूर्ण रूप से असंवेदनशील और अमानवीय दृष्टिकोण दर्शाता है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस फैसले की आलोचना करते हुए इसे चौंकाने वाला बताया। इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता द्वारा एक एनजीओ की ओर से भेजे गए पत्र के आधार पर संज्ञान लिया।
नवंबर 2021 का है मामला
पेश मामले के मुताबिक 10 नवंबर 2021 को शाम लगभग 5:00 बजे, शिकायतकर्ता अपनी 14 वर्षीय नाबालिग बेटी के साथ अपनी ननद के घर से लौट रही थी। रास्ते में गांव के ही आरोपी उससे मिले और पूछा कि वह कहां से आ रही है। जब उसने जवाब दिया कि वह अपनी ननद के घर से आ रही है, तो एक ने उसकी बेटी को बाइक पर बैठाने की पेशकश की और आश्वासन दिया कि वह उसे घर छोड़ देगा। आश्वासन पर भरोसा करके उसने अपनी बेटी को उनके साथ जाने दिया लेकिन रास्ते में, आरोपी व्यक्तियों ने अपनी बाइक रोक दी और पीड़िता के प्राइवेट पार्ट पकड़ लिए। एक आरोपी ने उसे घसीटने की कोशिश की और उसे पुलिया के नीचे ले जाने का प्रयास किया। उसने पीड़िता के पायजामे की डोरी खींच दी। पीड़िता की चीख-पुकार सुनकर दो लोग मौके पर पहुंचे। आरोपियों ने उन्हें देशी पिस्तौल दिखाकर धमकी दी और वहां से फरार हो गए। पीड़िता और गवाहों के बयान दर्ज करने के बाद, अदालत ने आरोपियों को बलात्कार के आरोप में तलब किया।
– केंद्र सरकार, यूपी सरकार और अन्य पक्षों को जारी किया नोटिस
– सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर लिया था स्वत: संज्ञान

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