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मखाना का दाम ढाई गुना, पैदावार सिर्फ़ चार फ़ीसदी बढ़ी

by ब्लिट्ज़ इंडिया
August 20, 2026
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Makhana

ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।सीधी बात यह है कि मखाना बेचने वाले किसान का दाम पाँच साल में 500 रुपये किलो से बढ़कर 1,250 रुपये किलो हो गया, लेकिन देश में पैदावार उतनी नहीं बढ़ी। यानी माँग है, माल कम है — और यही मौक़ा है।

सरकार ने 19 अगस्त को मखाना पर एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की है। उसमें दो आँकड़े साथ पढ़ने लायक़ हैं। साल 2020 से 2022 के बीच मखाने का औसत दाम क़रीब 500 रुपये किलो था, जो 2025 में लगभग 1,250 रुपये किलो पहुँच गया — यानी 150 फ़ीसदी की बढ़त। इसी दौरान, वित्त वर्ष 2022 से 2025 के बीच पैदावार सिर्फ़ 4 से 5 फ़ीसदी बढ़ी। दाम इतनी तेज़ी से तभी चढ़ता है जब खाने वाले बढ़ जाएँ और उगाने वाले उतने न बढ़ें।

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अब अच्छी ख़बर। पिछले सीज़न में यह तस्वीर बदली है। देश में मखाने का उत्पादन 2024-25 के 63,910 टन से बढ़कर 2025-26 में 80,590 टन हो गया — एक ही साल में 26.1 फ़ीसदी की बढ़त। प्रति हेक्टेयर पैदावार 2.03 टन से बढ़कर 2.34 टन हुई। इसकी वजह हैं स्वर्ण वैदेही और सबौर मखाना-1 जैसी नई क़िस्में, और तालाब की जगह खेत में मखाना उगाने की तकनीक, जिसमें फ़सल का जोखिम कम है और तोड़ाई आसान।

यही रूप बिकता है: भुना और फूटा हुआ मखाना। कच्चे बीज का क़रीब दो-तिहाई वज़न भूनने में उड़ जाता है, इसलिए कच्ची पैदावार और तैयार माल के निर्यात के आँकड़े सीधे नहीं जोड़े जा सकते।

जिस चीज़ का दाम पाँच साल में ढाई गुना हो जाए और पैदावार पाँच फ़ीसदी बढ़े — वहाँ दिक़्क़त माँग की नहीं, सप्लाई की है। और 1,010 हेक्टेयर नया रक़बा उसी का जवाब है।

एक नज़र में

• पैदावार 2025-26: 80,590 टन (दूसरा अग्रिम अनुमान), 2024-25 में 63,910 टन
• प्रति हेक्टेयर: 2.34 टन, पहले 2.03 टन
• बिहार: 60,000 टन — देश का 74.5 फ़ीसदी, दुनिया का 80-85 फ़ीसदी
• दाम: 2020-22 में क़रीब 500 रुपये किलो, 2025 में लगभग 1,250 रुपये
• निर्यात 2025-26: 7,264.89 टन, क़ीमत 19,296.08 लाख रुपये
• सबसे बड़े ख़रीदार: अमेरिका 40%, कनाडा 20%, यूएई 17%
• सबसे अच्छा भाव: जर्मनी 26 डॉलर प्रति किलो
• योजना: 476.03 करोड़ रुपये, 2025-26 से 2030-31
• पहले साल: 1,010 हेक्टेयर नया रक़बा, 8,159 किसान
• जीआई टैग: मिथिला मखाना

बिहार इस पूरे कारोबार की जान है। 2025-26 में राज्य ने 60,000 टन मखाना पैदा किया — देश की कुल पैदावार का 74.5 फ़ीसदी, और दुनिया की सप्लाई का 80 से 85 फ़ीसदी। खेती मुख्य रूप से कोसी इलाक़े के सुपौल, सहरसा और मधेपुरा ज़िलों में और मिथिला तथा सीमांचल के आसपास के इलाक़ों में होती है। मिथिला मखाना को जीआई टैग भी मिल चुका है, यानी क़ानूनी तौर पर यह पहचान अब मिथिला की है।

किसान के लिए सरकारी मदद क्या है, यह जान लेना ज़रूरी है। राष्ट्रीय मखाना बोर्ड की घोषणा 2025-26 के बजट में हुई, 14 सितंबर 2025 को अधिसूचना निकली और अगले दिन बिहार में इसकी शुरुआत हुई। मखाना विकास के लिए केंद्रीय क्षेत्र की योजना बनी है, जिसका कुल बजट 476.03 करोड़ रुपये है और अवधि 2025-26 से 2030-31 तक। इसमें 2025-26 के लिए 30 करोड़ और 2026-27 के लिए 90 करोड़ रुपये मंज़ूर हुए हैं। पहले ही साल में 1,010 हेक्टेयर नया रक़बा मखाने के नीचे आया, 73 हेक्टेयर में बीज उत्पादन हुआ, 89 प्रदर्शन खेत लगे और 8,159 किसानों को फ़ायदा पहुँचा।

बड़ी बात यह है कि विदेश में मखाना अब गिना जाने लगा है। 2025 तक मखाने का अपना कोई कस्टम कोड नहीं था, इसलिए कितना बाहर जा रहा है, यह किसी को ठीक-ठीक पता नहीं था। विदेश व्यापार महानिदेशालय ने 2025 में पॉप्ड मखाने के लिए अलग कोड बनाया। पहला पूरा आँकड़ा यह है — 2025-26 में 7,264.89 टन मखाना उत्पाद निर्यात हुआ, क़ीमत 19,296.08 लाख रुपये। सबसे बड़े ख़रीदार अमेरिका (40 फ़ीसदी), कनाडा (20) और यूएई (17) हैं।

पर यहीं एक बात ध्यान देने की है। ये तीनों सबसे बड़े बाज़ार हैं, और सबसे कम दाम देने वाले भी — अमेरिका 19.5 डॉलर, कनाडा 15.8 और यूएई 13.3 डॉलर प्रति किलो। दूसरी तरफ़ जर्मनी 26 डॉलर, नेपाल 21.6 और ऑस्ट्रेलिया 21 डॉलर देता है, लेकिन इनका हिस्सा 1 से 5 फ़ीसदी ही है। जर्मनी उसी माल के लिए अमेरिका से एक-तिहाई ज़्यादा दाम दे रहा है।

आगे का रास्ता साफ़ है। अब जब अलग कस्टम कोड बन गया है, मखाना बोर्ड हर तिमाही यह छाप सकता है कि किस देश ने कितना ख़रीदा और किस भाव पर। जिस किसान और निर्यातक को यह दिखेगा कि जर्मनी ज़्यादा दे रहा है, वह उस बाज़ार के लिए ज़रूरी जाँच और पैकिंग का इंतज़ाम ख़ुद करेगा। मिथिला मखाना का जीआई टैग इसी काम की सबसे मज़बूत चीज़ है — यूरोप का ख़रीदार पहचान का दाम देता है।

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