ब्लिट्ज ब्यूरो
मुंबई। बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक आदेश में स्पष्ट किया है कि स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत जारी मैरिज सर्टिफिकेट शादी का निर्णायक और वैध सबूत है। बशर्ते सर्टिफिकेट को किसी कोर्ट और उपयुक्त अथाॅरिटी ने रद न किया हो। जस्टिस गिरीश कुलकर्णी और जस्टिस अद्वैत सेठना की बेंच ने एक महिला को नए सिरे से मैरिज सर्टिफिकेट जारी करने का निर्देश देने से इनकार किया है। महिला के पति विदेश में रहते है, इसलिए उनकी शादी स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत पंजीकृत हुई थी।
धारा 5 का हवाला
जर्मनी दूतावास ने महिला के वीजा के आवेदन को इस आधार पर अस्वीकार कर दिया था, क्योंकि महिला को मैरिज सर्टिफिकेट जारी करते समय स्पेशल मैरिज एक्ट की धारा 5 का पालन नहीं किया गया है। उक्त धारा के तहत
शादी से पहले पति अथवा पत्नी में से किसी एक को भारत में लगातार 30 दिन तक रहना जरूरी है। चूंकि महिला के मामले में धारा 5 का पालन नहीं हुआ है, इसलिए उसका सर्टिफिकेट अमान्य है। दूतावास के इस रुख के चलते महिला ने कोर्ट में याचिका दायर की थी।
बेंच ने कहा, अनियमितता के कारण विवाह अमान्य नहीं हो जाता
मामले से जुड़े दंपति का 23 नवंबर 2023 को विवाह हुआ था। बेंच ने कहा, हमारी राय में धारा पांच के तहत विवाह से जुड़े किसी भी पक्ष द्वारा दिखाई गई अनियमितता अथॉरिटी द्वारा जारी मैरिज सर्टिफिकेट को अस्वीकार करने का आधार नहीं हो सकती है। अनियमितता से विवाह अमान्य नहीं हो सकता। बेंच ने स्पष्ट किया कि स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत एक बार जब जोड़े को मैरिज सर्टिफिकेट जारी हो जाता है, तो वह विवाह का वैध और निर्णायक सबूत हो जाता है। कानून किसी व्यक्ति अथवा अथॉरिटी को मैरिज सर्टिफिकेट को खारिज करने की अनुमति नहीं देता है। बेंच ने कहा कि स्पेशल मैरिज एक्ट की धारा 13 में मैरिज सर्टिफिकेट से जुड़ा प्रावधान है। इस धारा के तहत जब ऑफिसर मैरिज सर्टिफिकेट बुक में विवाह को पंजीकृत कर लेता है, तो मैरिज सर्टिफिकेट शादी का निर्णायक सबूत मान लिया जाता है।













