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दुनिया का 80 फ़ीसदी मखाना, बिहार के नौ ज़िलों से

by ब्लिट्ज़ इंडिया
August 19, 2026
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Makhana

ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।भारत के पास ऐसी कोई दूसरी फ़सल नहीं जिसमें दुनिया के बाज़ार पर इतनी पकड़ हो। और इस पर लगी केंद्रीय योजना सबसे छोटी योजनाओं में से एक है।

सरकार ने 19 अगस्त को मखाना क्षेत्र पर जो जानकारी जारी की, उसमें एक बात दोहराई गई है — भारत दुनिया का सबसे बड़ा मखाना उत्पादक है, और वैश्विक उत्पादन में उसका हिस्सा क़रीब 80 फ़ीसदी है। इसका केंद्र बिहार है। मधुबनी, दरभंगा, सीतामढ़ी, सहरसा, कटिहार, पूर्णिया, सुपौल, किशनगंज और अररिया — ये नौ ज़िले ही असल में यह पूरा कारोबार चलाते हैं।

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इसके पीछे का ढाँचा नया है। राष्ट्रीय मखाना बोर्ड की घोषणा 2025-26 के बजट में हुई, 14 सितंबर 2025 को राजपत्र अधिसूचना से यह बना, और अगले दिन प्रधानमंत्री ने बिहार में इसकी शुरुआत की। साथ में मखाना विकास की केंद्रीय क्षेत्र योजना मंज़ूर हुई — 476.03 करोड़ रुपये, 2025-26 से 2030-31 तक। छह साल में बाँटें तो औसतन 79.34 करोड़ रुपये सालाना।

यही वह रूप है जिसमें दाम मिलता है: फूल मखाना। तालाब से बीज सख़्त निकलता है और दुकान तक हल्का-फुल्का भुना हुआ पहुँचता है। योजना में ग्रेडिंग, सुखाई, भूनने और पैकिंग का ज़िक्र है — यानी सरकार ने ठीक वहीं पैसा लगाया है जहाँ किसान का दाम अभी छूट रहा है।

79 करोड़ रुपये साल में किसी सेक्टर को खड़ा नहीं किया जा सकता। पर बीज और भुनाई की मशीन ठीक कर दी जाए, तो वही रक़म बहुत दूर तक जाती है। यह सब्सिडी नहीं, चाबी लगाने वाला पैसा है।

एक नज़र में

• योजना: मखाना विकास की केंद्रीय क्षेत्र योजना
• रक़म: 476.03 करोड़ रुपये, 2025-26 से 2030-31
• औसतन हर साल: क़रीब 79.34 करोड़ रुपये
• बोर्ड कब बना: 14 सितंबर 2025 · शुरुआत 15 सितंबर 2025, बिहार में
• पहली बैठक: 12 दिसंबर 2025, कृषि भवन, नई दिल्ली
• बीज कौन देगा: एसएयू सबौर और सीएयू समस्तीपुर, बिहार
• शोध केंद्र: राष्ट्रीय मखाना अनुसंधान केंद्र, दरभंगा
• दुनिया में हिस्सा: क़रीब 80 फ़ीसदी

बोर्ड की पहली बैठक से पता चलता है कि रणनीति क्या है। 12 दिसंबर 2025 को नई दिल्ली के कृषि भवन में कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के सचिव डॉ. देवेश चतुर्वेदी की अध्यक्षता में हुई इस बैठक की शुरुआत दाम या ख़रीद से नहीं, बीज से हुई। तय हुआ कि राज्यों की बीज ज़रूरत एक जगह जोड़ी जाए और उसे सबौर के राज्य कृषि विश्वविद्यालय तथा समस्तीपुर के केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय से पूरा किया जाए। दूसरा काम — दरभंगा का राष्ट्रीय मखाना अनुसंधान केंद्र और दोनों विश्वविद्यालय राज्यों के प्रशिक्षकों को तकनीक सिखाएँगे, ताकि खेती उन इलाक़ों में भी फैले जहाँ अभी मखाना नहीं होता।

तीसरा काम सबसे अहम है और सीधे आमदनी से जुड़ा है — ग्रेडिंग, सुखाई, भूनने और पैकिंग की मशीनें। बड़ी बात यह है कि मखाने का असली दाम तालाब में नहीं, इसी बीच के काम में बनता है। जो किसान कच्चा बीज बेच देता है उसे कच्चे बीज का भाव मिलता है। जो समूह उसे भूनकर, छाँटकर, पैक करके बेचता है, उसे कई गुना मिलता है। इसलिए मशीन तालाब के पास लगे, दूर के शहर में नहीं — यही तय करेगा कि योजना कामयाब है या नहीं।

ईमानदारी से कहें तो 79 करोड़ रुपये साल में नौ ज़िलों में उद्योग खड़ा नहीं होता। असली सवाल यह है कि बोर्ड ने राज्यों की जो सालाना कार्ययोजनाएँ मंज़ूर की हैं, उनसे कितनी इकाइयाँ ज़मीन पर लगीं, और सबौर-समस्तीपुर की बीज लाइन हर साल माँग पूरी कर पाती है या नहीं। ये प्रशासनिक सवाल हैं, और इनके जवाब दिए जा सकते हैं। आगे का सही क़दम यही होगा कि सरकार ज़िलेवार बताए — कितनी प्रसंस्करण इकाइयाँ चालू हुईं, कितना प्रमाणित बीज बँटा, और किसान को प्रति क्विंटल भाव 2025-26 के बाद कितना मिला। जिस फ़सल में दुनिया के 80 फ़ीसदी पर पकड़ हो, वह अपना हिसाब खुलकर दे सकती है।

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