ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।विश्व यात्रा एवं पर्यटन परिषद (डब्ल्यूटीटीसी) के इकोनॉमिक इम्पैक्ट रिसर्च के अनुसार, वर्ष 2025 में भारत के यात्रा, पर्यटन और आतिथ्य क्षेत्र का कुल आर्थिक आकार 263.6 अरब अमेरिकी डॉलर रहा। इसमें होटल, वाणिज्यिक विमानन, यात्री रेल सेवाएं, रेस्तरां, टूर ऑपरेटर, पर्यटन आकर्षण केंद्र तथा उनसे जुड़ी आपूर्ति श्रंखलाओं से उत्पन्न आर्थिक गतिविधियां शामिल हैं।
वर्तमान में भारत की लगभग 4 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था में इस क्षेत्र की हिस्सेदारी 5.2 से 6.6 प्रतिशत के बीच है।
पिछले आठ दशकों में भारत का आतिथ्य उद्योग पूरी तरह बदल चुका है। एक समय यह क्षेत्र मुख्यतः ब्रिटिश अधिकारियों, विदेशी मेहमानों और सरकारी प्रतिनिधियों तक सीमित था लेकिन आज यह 280 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक मूल्य वाला देश के सबसे तेजी से विकसित होते सेवा क्षेत्रों में से एक बन चुका है। इसकी सबसे बड़ी ताकत अब विदेशी पर्यटक नहीं, बल्कि भारत के करोड़ों घरेलू यात्री हैं।
डब्ल्यूटीटीसी के अनुसार, वर्ष 2025 में भारत के यात्रा, पर्यटन और आतिथ्य क्षेत्र का कुल आर्थिक आकार 263.6 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया।
इसमें केवल होटल उद्योग ही नहीं, बल्कि विमानन सेवाएं, रेल परिवहन, रेस्तरां, पर्यटन सेवाएं, मनोरंजन उद्योग तथा उनसे जुड़े हजारों छोटे-बड़े व्यवसाय भी शामिल हैं।
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इस क्षेत्र में होने वाले कुल खर्च का 86 प्रतिशत से अधिक, यानी लगभग 203 अरब अमेरिकी डॉलर, भारतीय यात्रियों द्वारा किया गया जबकि विदेशी पर्यटकों का योगदान अपेक्षाकृत काफी कम रहा। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि भारत का आतिथ्य उद्योग अब मुख्य रूप से घरेलू पर्यटन की मजबूत नींव पर खड़ा है।
1947 से 1980 का दौर : सरकारी पहल से रखी गई मजबूत नींव
आज़ादी के समय भारत को ब्रिटिश शासनकाल की होटल व्यवस्था विरासत में मिली थी। मुंबई का ताज महल पैलेस, नई दिल्ली का द इम्पीरियल और कोलकाता का द ग्रैंड होटल जैसे कुछ प्रतिष्ठित होटल ही उस समय देश के आतिथ्य उद्योग की पहचान थे।
आधारभूत सुविधाओं का अभाव
उस दौर में संगठित होटल बहुत कम थे। अधिकांश भारतीय यात्री धर्मशालाओं, सरायों, सरकारी विश्राम गृहों, डाक बंगलों अथवा निजी लॉज में ठहरते थे।
सरकार की निर्णायक पहल
वर्ष 1956 में आयोजित यूनेस्को सम्मेलन की मेजबानी के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने नई दिल्ली में द अशोक होटल के निर्माण का निर्णय लिया। इसे भारत के आधुनिक आतिथ्य उद्योग की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण कदम माना जाता है।
इसके बाद वर्ष 1966 में भारतीय पर्यटन विकास निगम (आईटीडीसी) की स्थापना की गई जिसने देशभर में सरकारी होटलों और पर्यटन से जुड़ी आधारभूत सुविधाओं के विकास में अहम भूमिका निभाई।
निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी
इसी अवधि में ओबेरॉय समूह और ताज समूह जैसे भारतीय होटल समूहों ने देश के प्रमुख महानगरों के साथ-साथ राजस्थान, शिमला और अन्य प्रमुख पर्यटन स्थलों पर आधुनिक होटल विकसित करने की शुरुआत की।
अब छोटे शहर भी बन रहे हैं विकास के नए केंद्र
आज भारत का आतिथ्य उद्योग केवल दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और चेन्नई जैसे महानगरों तक सीमित नहीं रह गया है।
अब दूसरे और तीसरे श्रेणी के शहरों में देश की आधे से अधिक नई होटल परियोजनाएं विकसित की जा रही हैं। यह दर्शाता है कि पर्यटन और व्यावसायिक गतिविधियों का विस्तार तेजी से छोटे शहरों तक पहुंच रहा है।
हर वर्ग के यात्रियों के लिए बेहतर ठहरने की सुविधाएं
आज भारत में हर आय वर्ग और हर प्रकार के यात्री के लिए उसकी आवश्यकता और बजट के अनुरूप ठहरने की सुविधाएं उपलब्ध हैं।
आजादी के बाद भारत के आतिथ्य (हॉस्पिटैलिटी) क्षेत्र ने अभूतपूर्व प्रगति की है। वर्ष 1947 में देशभर में जहां संगठित होटलों में केवल 5,000 कमरे उपलब्ध थे वहीं आज यह संख्या बढ़कर लगभग 2 लाख तक पहुंच चुकी है। यानी इस क्षेत्र में करीब 3,900 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। इस विषय पर ब्लिट्ज रिसर्च की ये शानदार रिपोर्ट पढ़िए…

इनमें शामिल हैं-
लक्जरी होटल
उच्च मध्यम श्रेणी के होटल
मध्यम श्रेणी के होटल
किफायती होटल
व्यावसायिक होटल
विरासत होटल
होमस्टे
पर्यावरण-अनुकूल रिसॉर्ट
वर्तमान में विकसित हो रही नई होटल परियोजनाओं में लगभग 39 प्रतिशत हिस्सेदारी मध्यम और उच्च मध्यम श्रेणी के होटलों की है। ये मध्यम वर्ग और बजट यात्रियों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर विकसित किए जा रहे हैं।
तकनीक ने आतिथ्य उद्योग को दी नई पहचान
तकनीक आधारित होटल प्रबंधन कंपनियों ने देशभर के हजारों असंगठित किफायती होटलों को एक व्यवस्थित मंच से जोड़कर यात्रियों को बेहतर, सुरक्षित और भरोसेमंद सेवाएं उपलब्ध कराई हैं।
इसके साथ ही होमस्टे, विरासत संपत्तियां और प्रकृति आधारित पर्यटन स्थलों की लोकप्रियता भी तेजी से बढ़ी है। आज का यात्री केवल ठहरने की जगह नहीं बल्कि स्थानीय संस्कृति और जीवनशैली से जुड़ा एक यादगार अनुभव भी चाहता है।
घरेलू पर्यटन बना भारत के आतिथ्य उद्योग की सबसे बड़ी ताकत
आज़ादी के शुरुआती वर्षों में भारत का आतिथ्य उद्योग मुख्य रूप से विदेशी पर्यटकों पर निर्भर था लेकिन आज इस उद्योग की सबसे बड़ी ताकत भारतीय मध्यम वर्ग की बढ़ती आय, घरेलू पर्यटन का निरंतर विस्तार, व्यावसायिक और अवकाश यात्राओं का बढ़ता चलन तथा धार्मिक एवं आध्यात्मिक पर्यटन का अभूतपूर्व विकास है।
यही कारण है कि भारत का आतिथ्य उद्योग आज दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते बाज़ारों में शामिल है। इसकी विकास यात्रा अब विदेशी पर्यटकों के बजाय देश के अपने करोड़ों यात्रियों की बढ़ती भागीदारी और मांग पर आधारित है।














