नई दिल्ली।पिछले एक महीने में भारत में चीनी की कीमतों में ज़बरदस्त बढ़ोतरी हुई है। त्योहारों के समय बढ़ती कीमतों के लिए मोदी सरकार के ई20 (इथेनॉल) पर ज़ोर देने को ज़िम्मेदार ठहराए जाने के बाद मचे हंगामे के बीच, केंद्र सरकार ने हाल ही में इस पर चुप्पी तोड़ी। मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने इस दावे को खारिज कर दिया कि कीमतों में बढ़ोतरी का संबंध इथेनॉल उत्पादन से है।
मंत्रालय ने कहा कि हालिया बढ़ोतरी के पीछे घरेलू और ग्लोबल, दोनों तरह के कारण हैं, साथ ही यह भी कहा कि अगले क्रशिंग सीज़न तक मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त स्टॉक मौजूद है।
मंत्रालय के अनुसार, चीनी की खुदरा कीमतें 20 जुलाई को 48.18 रुपये प्रति किलोग्राम से बढ़कर 20 अगस्त को 55.70 रुपये प्रति किलोग्राम हो गईं। अब सरकार ने जमाखोरी को रोकने के लिए उपाय किए हैं।
कीमतें क्यों बढ़ रही हैं?
सरकार ने कीमतों में बढ़ोतरी के लिए कई वजहें बताईं, जिनमें उम्मीद से कम घरेलू चीनी उत्पादन, त्योहारों के मौसम से पहले ज़्यादा मांग, मौसम की वजह से फसल को नुकसान, ग्लोबल सप्लाई में कमी और इंडस्ट्री के कुछ हिस्सों द्वारा सट्टेबाजी या जमाखोरी शामिल है।
मौजूदा सीजन के लिए भारत का चीनी उत्पादन 306 लाख मीट्रिक टन (एलएमटी) रहने का अनुमान है, जो शुरुआती अनुमान 343 एलएमटीसे कम है। मंत्रालय ने इस कमी के लिए फसल से जुड़ी समस्याओं को ज़िम्मेदार ठहराया, जिनमें रेड रॉट, टॉप बोरर बीमारी और भारी बारिश के कारण जलभराव शामिल हैं।
क्या कीमत बढ़ने की वजह इथेनॉल है?
सरकार का कहना है कि नहीं। मंत्रालय ने कहा, चीनी की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी को इथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी के इस्तेमाल से जोड़ना गलत है।
मंत्रालय ने बताया कि इथेनॉल उत्पादन के लिए इस्तेमाल होने वाली चीनी का हिस्सा असल में कम हुआ है – 2022-23 में यह लगभग 12 प्रतिशत था, जो 2025-26 में घटकर लगभग 9 प्रतिशत हो गया है। साथ ही, मंत्रालय ने कहा कि भारत में अब लगभग तीन-चौथाई इथेनॉल का उत्पादन अनाज, खासकर मक्के से होता है।
मंत्रालय ने यह भी कहा कि इथेनॉल पॉलिसी से चीनी मिलों की आर्थिक स्थिति बेहतर हुई है, जिससे उन्हें किसानों का बकाया चुकाने में मदद मिली है। सरकार के अनुसार, 20 अगस्त तक मिलों ने 2025-26 सीजन के लिए गन्ने का 97 प्रतिशत बकाया चुका दिया था।
वैश्विक कमी की वजह
भारत का घरेलू बाज़ार भी अंतरराष्ट्रीय रुझानों से प्रभावित हो रहा है। सरकार का अनुमान है कि 2026-27 में वैश्विक स्तर पर चीनी की 33 लाख मीट्रिक टन की कमी होगी, क्योंकि खराब मौसम के कारण प्रमुख बाज़ारों में उत्पादन प्रभावित हो रहा है।
वैश्विक स्तर पर चीनी की कीमतें 30 जून को $474 प्रति टन से बढ़कर 20 अगस्त को $552 प्रति टन हो गईं, जो दो महीने से भी कम समय में 16 प्रतिशत से ज़्यादा की बढ़ोतरी है।
सरकार ने कीमतों में बढ़ोतरी के लिए कई वजहें बताईं, जिनमें उम्मीद से कम घरेलू चीनी उत्पादन, त्योहारों के मौसम से पहले ज्यादा मांग, मौसम की वजह से फसल को नुकसान, ग्लोबल सप्लाई में कमी और इंडस्ट्री के कुछ हिस्सों द्वारा सट्टेबाजी या जमाखोरी शामिल है।
केंद्र सरकार ने कीमतों को और बढ़ने से रोकने और त्योहारों के मौसम में सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए कई उपाय किए हैं।
डीलरों के लिए 400 टन की स्टॉक लिमिट 30 नवंबर तक लागू रहेगी, जबकि थोक उपभोक्ताओं के लिए 1 सितंबर से 15 दिन की होल्डिंग लिमिट (स्टॉक रखने की सीमा) शुरू हो गई है। जमाखोरी और कृत्रिम कमी का पता लगाने के लिए केंद्र और राज्य की टीमें चीनी मिलों में स्टॉक की भौतिक जांच भी कर रही हैं।
इसके अलावा, सरकार ने 10 एलएमटी कच्ची चीनी (रॉ शुगर) के ड्यूटी-फ्री आयात की अनुमति दी है। चीनी मिलों को 15 अक्टूबर से ही पेराई (क्रशिंग) शुरू करने की सलाह भी दी गई है। मंत्रालय को उम्मीद है कि इससे अक्टूबर में उत्पादन सामान्य 3-4 एलएमटी के मुकाबले 10 एलएमटी से ऊपर जा सकता है।
केंद्र ने कहा कि वह उपभोक्ताओं और गन्ना किसानों के हितों का ध्यान रखते हुए चीनी के स्टॉक और बाज़ार की गतिविधियों पर नजर रखना जारी रखेगा।
मांग बनाम सप्लाई
भारत में चीनी की मांग आमतौर पर अगस्त से नवंबर के बीच बढ़ती है, जब गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली जैसे बड़े त्योहार होते हैं और पारंपरिक मिठाइयों व कन्फेक्शनरी की खपत बढ़ जाती है।
भारत में कुछ बंदरगाह आधारित चीनी रिफाइनरियां हैं जिन्हें कच्ची चीनी का ड्यूटी-फ्री आयात करने की अनुमति है, लेकिन शर्त यह है कि उन्हें उतनी ही मात्रा में रिफाइंड चीनी का निर्यात करना होगा। नई दिल्ली के एक डीलर ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि सरकार इन रिफाइनरियों से अपने स्टॉक का कुछ हिस्सा घरेलू बाजार में भेजने के लिए कह सकती है, जिससे स्थानीय स्तर पर लगभग 3,00,000 टन चीनी उपलब्ध हो सकती है।
एक सीनियर ट्रेडर ने कहा कि सरकार को सीज़न के खत्म होने का इंतज़ार करने के बजाय जनवरी में ही कदम उठाना चाहिए था, जब चीनी का उत्पादन कम होने लगा था। ट्रेडर ने कहा कि जब तक आयातित चीनी असल में घरेलू बाजार में नहीं पहुंच जाती, तब तक तेज़ी का माहौल बना रह सकता है।
इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (इस्मा) का अनुमान है कि 2025-26 में घरेलू खपत 285 लाख टन और उत्पादन 279 लाख टन होगा (इसमें इथेनॉल के लिए इस्तेमाल होने वाले लगभग 30 लाख टन को शामिल नहीं किया गया है)। 30 सितंबर तक क्लोजिंग स्टॉक लगभग 36 लाख टन रहने का अनुमान है, जबकि 31 जुलाई को यह लगभग 80 लाख टन था।













