आस्था भट्टाचार्य
नई दिल्ली। भारत अपने डिफेंस सिस्टम को मॉडर्न वॉरफेयर के लिहाज से अपग्रेड कर रहा है। आर्मी, एयरफोर्स और नेवी को नई टेक्नोलॉजी से एडवांस किया जा रहा है। खासकर मिसाइल, फाइटर जेट और ड्रोन के सेगमेंट में हजारों करोड़ रुपये का निवेश किया जा रहा है। नेक्स्ट जेनरेशन का फाइटर जेट डेवलप करने के लिए एएमसीए प्रोजेक्ट लॉन्च किया गया है। इसके तहत पांचवीं के साथ ही छठी और उससे आगे की पीढ़ियों का लड़ाकू विमान डेवलप करने की योजना है। वहीं, मिसाइल डेवलपमेंट के क्षेत्र में भारत लगातार इतिहास रच रहा है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने हिन्द महासागर में तकरीबन 3000 किलोमीटर के लिए नोटम जारी किया है। डिफेंस एक्सपर्ट का मानना है कि लंबी से मध्यम दूरी तक मार करने वाली मिसाइल का परीक्षण किया जा सकता है। इस बीच डीआरडीओ एक और योजना बना रहा है। इसके तहत लॉन्ग रेंज एंटी-शिप मिसाइल (एलआर-एएसएचएम) की रेंज को दोगुना से ज्यादा किया जाएगा। इससे इसकी रेंज ब्रह्मोस से 4 गुना ज्यादा तथा रफ्तार 3 गुना ज्यादा हो जाएगी।
दरअसल, भारत अपनी समुद्री सुरक्षा और लंबी दूरी की मारक क्षमता को और मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाने की तैयारी में है।
डीआरडीओ लॉन्ग रेंज एंटी-शिप मिसाइल (एलआर-एएसएचएम) के एक्सटेंडेड रेंज वाले वेरिएंट की संभावनाओं का अध्ययन कर रहा है, जिसकी मारक क्षमता करीब 3,500 किलोमीटर तक ले जाने का लक्ष्य हो सकता है। हालांकि, इसको लेकर कोई आधिकारिक जानकारी नहीं दी गई है। मौजूदा एलआर-एएसएचएम 1,500 किलोमीटर तक मार करने में सक्षम है। ऐसे में इसकी रेंज को दोगुने से भी अधिक बढ़ाकर 3,500 किलोमीटर तक ले जाने से यह सिस्टम केवल कोस्टल सिक्योरिटी तक सीमित न रहकर हिंद महासागर क्षेत्र में दूर मौजूद नौसैनिक खतरों के खिलाफ एक रणनीतिक हथियार बन सकती है। इसका इस्तेमाल जमीन से तैनात लॉन्चरों के जरिए समुद्र में काफी दूर मौजूद वॉरशिप और अन्य नौसैनिक लक्ष्यों को निशाना बनाने के लिए किया जा सकेगा।
हाइपरसोनिक टेक्नोलॉजी बनेगी अहम आधार
‘डिफेंस डॉट इन’ की रिपोर्ट के अनुसार, प्रस्तावित एक्सटेंडेड रेंज वाला वेरिएंट मौजूदा एलआर-एएसएचएम की हाइपरसोनिक बूस्ट-ग्लाइड तकनीक पर आधारित हो सकता है। इस तकनीक में शुरुआती रॉकेट फेज मिसाइल को बेहद ऊंचाई और अत्यधिक गति तक पहुंचाते हैं। इसके बाद हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल अलग होकर वायुमंडल की ऊपरी परतों में एयरोडायनामिक लिफ्ट का इस्तेमाल करते हुए लंबी दूरी तय करता है। रिपोर्ट के मुताबिक, मिसाइल की गति करीब मैक-10 (तकरीबन 12348 किलोमीटर प्रति घंटा) तक पहुंचाने और हजारों किलोमीटर की यात्रा के दौरान उसे नियंत्रित रखने के लिए रॉकेट मोटर, ईंन्धन, एयरोडायनामिक डिजाइन और फ्लाइट पाथ में बड़े बदलाव की जरूरत होगी। केवल अतिरिक्त ईंधन जोड़कर 3,500 किलोमीटर की रेंज हासिल करना संभव नहीं होगा। इसके लिए प्रोपल्सन सिस्टम और स्टेजिंग को भी नए सिरे से विकसित करना पड़ सकता है।
हाइपरसोनिक स्पीड से लंबी दूरी तय करने में सबसे बड़ी तकनीकी चुनौतियों में से एक अत्यधिक तापमान होगा। लंबे समय तक ऐसी गति पर उड़ान भरने से मिसाइल की बाहरी सतह पर तापमान 2,000 डिग्री सेल्सियस से अधिक पहुंच सकता है। ऐसे में डीआरडीओ को बेहतर हीट शील्डिंग, अधिक मजबूत स्ट्रक्चरल मैटेरियल और बेहतर एयरोडायनामिक डिजाइन पर काम करना होगा। इसके अलावा 3,500 किलोमीटर जैसी दूरी पर सटीक निशाना साधने के लिए अत्यंत विश्वसनीय नेविगेशन सिस्टम जरूरी होगी। ऐसे में स्वदेशी नेवएलसी सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम को मिसाइल के गाइडेंस में शामिल किए जाने की संभावना है।
लॉन्ग रेंज एंटी-शिप मिसाइल का नया वेरिएंट ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल की तुलना में कहीं ज्यादा खतरनाक होने वाला है।
भविष्य की ऐसी मिसाइल को दुश्मन की इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर कैपेबिलिटी के बीच भी काम करने में सक्षम होना होगा। सैटेलाइट सिग्नल बाधित होने की स्थिति में आंतरिक नेविगेशन सेंसर, जैसे फाइबर ऑप्टिक या रिंग-लेजर जाइरोस्कोप, मिसाइल को रास्ते पर बनाए रखने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।














