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गोदनामा बेटियों को संपत्ति से वंचित करने की साजिश : सुप्रीम कोर्ट

by ब्लिट्ज़ इंडिया
April 18, 2025
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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के संपत्ति विवाद में एक पुराने गोदनामे को खारिज कर दिया है। शीर्ष न्यायालय ने कहा कि यह गोदनामा जानबूझकर बनाया गया था ताकि बेटियों को उनके पिता की संपत्ति में हिस्सेदारी से वंचित किया जा सके। यह मामला भुनेश्वर सिंह नाम के व्यक्ति की संपत्ति से जुड़ा है, जिनकी दो बेटियां – शिव कुमारी देवी और हरमुनिया हैं। एक व्यक्ति अशोक कुमार ने दावा किया कि उन्हें भुनेश्वर सिंह ने 1967 में गोद लिया था और इस आधार पर वह उनकी संपत्ति में अधिकार रखते हैं। उन्होंने गोदनामा और एक फोटो अदालत में पेश किया था लेकिन पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट और अब सुप्रीम कोर्ट ने इस गोदनामे को खारिज कर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि, ‘हमने पूरी सुनवाई और दस्तावेजों को ध्यान से देखा और यह साफ है कि यह गोदनामा सिर्फ बेटियों को उनके हक से वंचित करने के लिए तैयार किया गया था।’
गोदनामे के लिए पत्नी की सहमति जरूरी
गोद लेने की प्रक्रिया में पत्नी की सहमति अनिवार्य होती है, लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं हुआ। गोद लेने की तारीख थी 9 अगस्त 1967, लेकिन गोदनामे में पत्नी की न तो सहमति थी, न ही हस्ताक्षर, और न ही वह गोद लेने की रस्म में शामिल थीं। हाईकोर्ट ने भी माना कि गोद लेने की प्रक्रिया में जरूरी कानूनी नियमों का पालन नहीं हुआ। अदालत ने यह भी कहा- एक गवाह ने भी गोद लेने की रस्म की तस्वीरों में मां को पहचानने से इनकार किया। इससे साफ होता है कि गोदनामे में पत्नी की सहमति नहीं थी।
40 साल की देरी पर खेद
इसके साथ ही हाईकोर्ट ने यह भी माना कि इस मामले में गोदनामे की वैधता तय करने में 40 साल से अधिक की देरी हुई, जो दुर्भाग्यपूर्ण है। अदालत ने इसके लिए माफी मांगी।
ग्रामीण इलाकों में बेटियों के खिलाफ षड्यंत्र
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान कहा- हम जानते हैं कि ग्रामीण इलाकों में बेटियों को संपत्ति से बाहर करने के लिए इस तरह की गोद लेने की चालें चलती हैं। यह एक आम तरीका है बेटियों को उनका हक न देने का। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गोदनामा कानूनी रूप से अमान्य है और इसे खारिज करना बिल्कुल सही फैसला है। इलाहाबाद हाईकोर्ट और पहले राजस्व बोर्ड ने जो फैसला दिया था, वह पूरी तरह से विधिसंगत है।
कानून क्या कहता है?
हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 के तहत- यदि कोई पुरुष बच्चा गोद लेता है, तो उसकी पत्नी की सहमति अनिवार्य है। गोद लेने की वास्तविक रस्म यानी ‘देने और लेने’ का प्रमाण होना चाहिए, सिर्फ फोटो या कथन से गोदनामा साबित नहीं होता। इस मामले में न तो सहमति थी, न रस्म का स्पष्ट प्रमाण। इसलिए गोदनामा अवैध माना गया।

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