ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली। इरादे बुलंद हों और अपनों का अटूट विश्वास साथ हो, तो जिंदगी की सबसे बड़ी कठिनाई भी आपकी सफलता की राह नहीं रोक सकती। संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा को देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में गिना जाता है, लेकिन दीपांशु जिंदल का सफर यह साबित करता है कि इंसान अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति से किसी भी मुसीबत को हरा सकता है। कम उम्र में ही माता-पिता का साया खो देने के बाद जिस तरह से दीपांशु ने दुखों से उबरकर यूपीएससी जैसी प्रतिष्ठित परीक्षा में सफलता हासिल की, वह देश भर के लाखों छात्रों और युवाओं के लिए प्रेरणा का एक बड़ा स्रोत है। उन्होंने अपने तीसरे प्रयास में ऑल इंडिया 38वीं रैंक हासिल कर आईएएस बनने का सपना पूरा किया।
माता-पिता के निधन से टूटा दुखों का पहाड़
दीपांशु जिंदल का शुरुआती जीवन पढ़ाई में काफी अच्छा रहा। उन्होंने जेईई परीक्षा पास कर दिल्ली प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद उन्होंने प्रशासनिक सेवा में जाकर देश की सेवा करने का लक्ष्य बनाया। हालांकि, जब वे यूपीएससी की तैयारी कर रहे थे, तभी एक के बाद एक बीमारी के कारण उनके माता-पिता का निधन हो गया। कम उम्र में माता-पिता दोनों का साया सिर से उठ जाना किसी भी युवा के लिए बहुत बड़ा दुख था।
बहन बनी सबसे बड़ी ढाल
ऐसे कठिन और निराशाजनक मोड़ पर दीपांशु की बहन उनके लिए सबसे बड़ी ताकत बनकर खड़ी हुईं। बहन ने न सिर्फ खुद के दुखों को संभाला, बल्कि मां-बाप का फर्ज निभाते हुए दीपांशु के सपनों की मशाल को बुझने नहीं दिया। उन्होंने हर कदम पर दीपांशु का मनोबल बढ़ाया। घरेलू जिम्मेदारियां संभालीं और यह सुनिश्चित किया कि तमाम अड़चनों के बावजूद दीपांशु की पढ़ाई में कोई बाधा न आए। बहन के इसी निस्वार्थ त्याग और विश्वास ने दीपांशु को हर दिन दोगुनी मेहनत करने की प्रेरणा दी।
तीसरे प्रयास में 38वीं रैंक के साथ बने आईएएस
अपनी बहन के त्याग और माता-पिता के सपने को पूरा करने के लिए दीपांशु ने अपनी पुरानी गलतियों से सीखा और अपनी उत्तर लेखन व रिवीजन रणनीति में सुधार किया। दिन-रात की गई कड़ी मेहनत और अटूट लगन का परिणाम यह रहा कि तीसरे प्रयास में उन्होंने देश भर में 38वीं रैंक हासिल कर सफलता का परचम लहरा दिया। दीपांशु जिंदल की यह कहानी देश के उन लाखों छात्रों के लिए एक बड़ी सीख है जो असफलता या व्यक्तिगत कठिनाइयों से निराश हो जाते हैं।
यह उन तमाम युवाओं के लिए एक सीख है जो संसाधनों की कमी या विपरीत परिस्थितियों का बहाना बनाकर हार मान लेते हैं। अगर आपके मन में सच्चा जज्बा है, तो कोई भी रुकावट आपको आपकी मंजिल तक पहुंचने से नहीं रोक सकती।














