• Latest
  • Trending

74 साल बाद देश में होगी जातीय जनगणना

May 2, 2025
भारत की 7.8% जीडीपी ग्रोथ

‘झूठ की गूंज वाले निराशा फैलाने में लगे हैं’

September 7, 2026
पीएम मोदी पुतिन मुलाकात SCO शिखर सम्मेलन

पीएम मोदी का विदेश दौरा और एससीओ शिखर सम्मेलन का संदेश… भारत विश्व-मित्र महाशक्ति

September 7, 2026
भारत-उज्बेकिस्तान व्यापक रणनीतिक साझेदारी

भारत का बढ़ा रुतबा

September 7, 2026
तेजस एमके-2 समय सीमा

तेजस एमके-2 फाइटर जेट पर पूर्व वाइस चीफ की दो टूक ‘कब तक करेंगे इंतजार’

September 7, 2026
पीएम बोले- युवाओं ने देश का मान बढ़ाया

विकसित भारत के लिए युवाओं का नशामुक्त होना जरूरी

September 7, 2026
आईसीएमआर तकनीक हस्तांतरण

आईसीएमआर की तीन जांच तकनीकें उद्योग के लिए होंगी हस्तांतरित

September 7, 2026
यूपी-जापान इन्वेस्टमेंट मीट 2026

सीएम योगी ने चला ‘विकसित भारत-विकसित उत्तर प्रदेश’ का सबसे बड़ा मास्टरस्ट्रोक

September 7, 2026
यूपी 50 हजार छात्राओं को स्कूटी

योगी सरकार का तोहफा, 50 हजार छात्राओं को देगी स्कूटी

September 7, 2026
दिल्ली चिड़ियाघर प्रवेश क्षेत्र पुनर्विकास

आधुनिक होगा दिल्ली चिड़ियाघर

September 7, 2026
हिमाचल स्कूल एडमिशन जाति कॉलम

हिमाचल में अगले सत्र से स्कूल एडमिशन फॉर्म में नहीं होगा जाति का कॉलम

September 7, 2026
ठाणे-पालघर बुलेट ट्रेन कॉरिडोर का काम तेज, 135 किमी एलिवेटेड सेक्शन निर्माणाधीन

महाराष्ट्र में बुलेट ट्रेन के काम ने पकड़ी रफ्तार

September 7, 2026
गूगल गुजरात के युवाओं को कुशल बनाने में सहयोग देगा

गूगल गुजरात के युवाओं को कुशल बनाने में सहयोग देगा

September 7, 2026
Wednesday, September 9, 2026
Retail
संपर्क
डाउनलोड
  • देश
  • उत्तर-प्रदेश
  • राष्ट्रीय
    • उत्तर-प्रदेश
  • राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्री
  • चुनाव विशेष
  • स्टेट-नेशनल
  • महिला-खेल
  • डाउनलोड
  • अंग्रेजी
  • संपर्क
  • ई-पेपर
No Result
View All Result
Welcome To Blitz India Media
No Result
View All Result

74 साल बाद देश में होगी जातीय जनगणना

by ब्लिट्ज़ इंडिया
May 2, 2025
in the blitz
0

YOU MAY ALSO LIKE

‘झूठ की गूंज वाले निराशा फैलाने में लगे हैं’

पीएम मोदी का विदेश दौरा और एससीओ शिखर सम्मेलन का संदेश… भारत विश्व-मित्र महाशक्ति

ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली। मोदी कैबिनेट ने बुधवार 30 अप्रैल को एक बड़ा फैसला लिया। सरकार ने आगामी जनगणना में जातिगत गणना को शामिल करने का निर्णय लिया है। जातीय जनगणना को लेकर लंबे वक्त से विपक्षी दल मांग कर रहे थे।
केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इसकी घोषणा करते हुए कहा कि यह कदम सामाजिक और आर्थिक समानता को बढ़ावा देगा, साथ ही नीति निर्माण में पारदर्शिता सुनिश्चित करेगा।
क्या है जातिगत जनगणना?
जातिगत जनगणना एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें देश की आबादी को उनकी जाति के आधार पर बांटा जाता है। भारत में हर दस साल में होने वाली जनगणना में आमतौर पर आयु, लिंग, शिक्षा, रोजगार और अन्य सामाजिक-आर्थिक मापदंडों पर डेटा इकट्ठा किया जाता है। हालांकि, 1951 के बाद से जातिगत डेटा को इकट्ठा करना बंद कर दिया गया था, ताकि सामाजिक एकता को बढ़ावा मिले और जातिगत विभाजन को कम किया जा सके। फिलहाल केवल अनुसूचित जाति ( एससी ) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) की जनसंख्या का डेटा इकट्ठा किया जाता है, लेकिन अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और सामान्य वर्ग की जातियों का कोई आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।
केंद्रीय कैबिनेट का हालिया फैसला 2025 में होने वाली जनगणना में सभी जातियों के डेटा जुटाने की दिशा में एक बड़ा बदलाव है। यह फैसला सामाजिक-आर्थिक नीतियों को और प्रभावी बनाने के लिए लिया गया है, विशेष रूप से उन समुदायों के लिए जो इससे वंचित रहे हैं।
भारत में जातिगत जनगणना का इतिहास औपनिवेशिक काल से जुड़ा है। पहली जनगणना 1872 में हुई थी और 1881 से नियमित रूप से हर दस साल में यह प्रक्रिया शुरू हुई। उस समय जातिगत डेटा इकट्ठा करना सामान्य था। हालांकि, आजादी के बाद 1951 में यह फैसला लिया गया कि जातिगत डेटा इकट्ठा करना सामाजिक एकता के लिए हानिकारक हो सकता है। इसके बाद केवल एससी और एसटी का ही डेटा इकट्ठा किया गया।
लेकिन पिछले कुछ सालों में सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य में बड़ा बदलाव आया है। अब ओबीसी समुदाय के लिए आरक्षण और कल्याणकारी योजनाओं की मांग काफी बढ़ गई है। ऐसे में जातिगत जनगणना की मांग फिर से जोर पकड़ने लगी। 2011 में यूपीए सरकार ने सामाजिक-आर्थिक और जातिगत जनगणना ( एसईसीसी) की थी, लेकिन इसके आंकड़े विसंगतियों के कारण सार्वजनिक नहीं किए गए। बिहार, राजस्थान और कर्नाटक जैसे राज्यों ने स्वतंत्र रूप से जातिगत सर्वे किए, जिनके नतीजों ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में ला दिया।
विपक्षी दल, जैसे कांग्रेस, आरजेडी और सपा लंबे समय से इसकी मांग कर रहे थे। बीजेपी का सहयोगी दल जेडीयू भी जातीय जनगणना के पक्ष में था। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इसे सामाजिक न्याय का आधार बताते हुए 2024 के लोकसभा चुनाव में प्रमुख मुद्दा बनाया था। क्षेत्रीय दलों का मानना है कि जातिगत आंकड़े नीति निर्माण में मदद करेंगे, जबकि केंद्र सरकार ने पहले इसे प्रशासनिक रूप से जटिल और सामाजिक एकता के लिए खतरा माना था।
जातिगत जनगणना के क्या हो सकते हैं फायदे?
जातिगत जनगणना के समर्थकों का मानना है कि यह सामाजिक न्याय और समावेशी विकास की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम हो सकता है। उनका कहना है कि जातिगत आंकड़े सरकार को विभिन्न समुदायों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को बेहतर ढंग से समझने में मदद करेंगे। उदाहरण के लिए, यह पता लगाया जा सकता है कि कौन सी जातियां शिक्षा, रोजगार, और स्वास्थ्य सेवाओं में सबसे ज्यादा वंचित हैं। इससे कल्याणकारी योजनाओं को और प्रभावी बनाया जा सकता है। इसके अलावा ओबीसी और अन्य वंचित समुदायों की सटीक जनसंख्या के अभाव में आरक्षण नीतियों को लागू करना और संसाधनों का उचित वितरण करना मुश्किल रहा है। मंडल आयोग (1980) ने ओबीसी की आबादी को 52 प्रतिशत माना था, लेकिन यह अनुमान पुराने डेटा पर आधारित था। नए आंकड़े आरक्षण की सीमा और वितरण को और पारदर्शी बना सकते हैं। जातिगत जनगणना से उन समुदायों की पहचान हो सकेगी जो ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर रहे हैं। जातिगत डेटा सामाजिक असमानताओं को उजागर करेगा, जिससे सरकार और समाज को इन मुद्दों को संबोधित करने का अवसर मिलेगा। उदाहरण के लिए अगर किसी विशेष जाति की आय या शिक्षा का स्तर राष्ट्रीय औसत से काफी कम है, तो इसे सुधारने के लिए नीतियां बनाई जा सकती हैं। जातिगत जनगणना के कई फायदे हैं, लेकिन इसके संभावित नुकसान और जोखिम भी कम नहीं हैं। आलोचकों का मानना है कि यह सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर कई चुनौतियां पैदा कर सकता है। आलोचकों का तर्क है कि जातिगत जनगणना समाज में पहले से मौजूद जातिगत विभाजन को और गहरा कर सकती है। वहीं जातिगत आंकड़ों का उपयोग राजनीतिक दलों द्वारा वोट बैंक की राजनीति के लिए किया जा सकता है। क्षेत्रीय दल और जातिगत आधार पर संगठित पार्टियां इसका लाभ उठाकर सामाजिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा दे सकती हैं। इससे सामाजिक तनाव और हिंसा की संभावना बढ़ सकती है।
जातिगत जनगणना से कुछ समुदायों की जनसंख्या अपेक्षा से अधिक हो सकती है, जिससे आरक्षण की सीमा बढ़ाने की मांग उठ सकती है, जिससे सामाजिक अशांति बढ़ सकती है। जातिगत जनगणना का प्रभाव केवल सामाजिक और आर्थिक नीतियों तक ही सीमित नहीं रहेगा।
यह भारत की राजनीति को भी गहरे रूप से प्रभावित करेगा। बिहार के जातिगत सर्वेक्षण (2023) के बाद, जहां ओबीसी और ईबीसी की आबादी 63 प्रतिशत बताई गई, विपक्षी दलों ने इसे 2024 के लोकसभा चुनाव में प्रमुख मुद्दा बनाया। इससे विपक्षी गठबंधन को कई क्षेत्रों में इसका लाभ मिला।

ShareTweetSend

POPULAR NEWS

  • India shows way out to UN military observer group

    संरा के सैन्य पर्यवेक्षक समूह को भारत ने दिखाया बाहर का रास्ता

    0 shares
    Share 0 Tweet 0
  • प्रोपर्टी पर जिसका 12 साल से कब्जा, वही होगा मालिक

    0 shares
    Share 0 Tweet 0
  • 12 साल से है जमीन पर कब्जा तो वही होगा असली मालिक

    0 shares
    Share 0 Tweet 0
  • गंगाजल खराब नहीं होता, लेकिन क्यों ?

    0 shares
    Share 0 Tweet 0
  • पृथ्वी का आखिरी देश जहां सूरज केवल 40 मिनट के लिए ही डूबता है

    0 shares
    Share 0 Tweet 0
Welcome To Blitz India Media

© 2023 Blitz India Media -BlitzIndia Building A New Nation

Navigate Site

  • About
  • Our Team
  • Contact

Follow Us

No Result
View All Result
  • देश
  • उत्तर-प्रदेश
  • राष्ट्रीय
    • उत्तर-प्रदेश
  • राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्री
  • चुनाव विशेष
  • स्टेट-नेशनल
  • महिला-खेल
  • डाउनलोड
  • अंग्रेजी
  • संपर्क
  • ई-पेपर

© 2023 Blitz India Media -BlitzIndia Building A New Nation