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सेहतमंद कामयाबी

आयुष्मान भारत का प्रसार पूरे देश में अगले चरण को मजबूत करने पर जोर

by ब्लिट्ज़ इंडिया
August 10, 2026
in स्वास्थ्य ब्यूरो
0
आयुष्मान भारत योजना

हरविंदर आहूजा

नई दिल्ली।जब पश्चिम बंगाल ने इस साल जून में नेशनल हेल्थ अथॉरिटी (एनएचए) के साथ समझौता किया, तो आयुष्मान भारत ने वह लक्ष्य हासिल कर लिया जो पहले किसी राष्ट्रीय स्वास्थ्य पहल ने नहीं किया था: सभी 28 राज्यों और आठ केंद्र शासित प्रदेशों में मौजूदगी। दिल्ली के एक साल पहले शामिल होने के साथ, प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना, जो इस कार्यक्रम का बीमा वाला हिस्सा है, सचमुच पूरे भारत में फैल गई। सितंबर 2018 में रांची से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किए जाने के आठ साल बाद, यह योजना दुनिया की सबसे बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य पहलों में से एक है और भारत के ‘यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज’ (सभी के लिए स्वास्थ्य सुविधा) की दिशा में एक अहम कदम है।

ऐतिहासिक स्तर की कामयाबी

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इस उपलब्धि से जुड़े आंकड़े बहुत प्रभावशाली हैं। 43 करोड़ से ज़्यादा आयुष्मान कार्ड बनाए गए हैं और प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना ने 36,081 अस्पतालों के नेटवर्क में लगभग ₹1.73 लाख करोड़ की लागत वाले 11.6 करोड़ से ज़्यादा अस्पताल में भर्ती होने के मामलों को मंज़ूरी दी है। प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा का हिस्सा, ‘आयुष्मान आरोग्य मंदिर’, अब 1.81 लाख से ज़्यादा केंद्रों तक पहुंच गया है, जो घर के पास ही स्क्रीनिंग, टेली-कंसल्टेशन और मुफ़्त जरूरी स्वास्थ्य सेवाएं देते हैं।

आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन ने 90 करोड़ हेल्थ अकाउंट का आंकड़ा पार कर लिया है, जो शायद दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर है, वहीं ‘आयुष्मान वय वंदना’ कवर, जिसे 2024 में 70 साल से ज़्यादा उम्र के हर नागरिक के लिए बढ़ाया गया था, पहले ही लाखों बुज़ुर्ग परिवारों तक पहुंच चुका है। सबसे अहम बात यह है कि भारत में लोगों का अपनी जेब से होने वाला स्वास्थ्य खर्च 2014-15 में 62.6 प्रतिशत से घटकर 2021-22 में 39.4 प्रतिशत हो गया, यह कमी उन परिवारों के लिए बड़ी राहत है जिनके लिए कभी अस्पताल में भर्ती होने का मतलब कर्ज में डूबना होता था। सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की भागीदारी, सहकारी संघवाद की एक शांत जीत है। स्वास्थ्य एक राज्य का विषय है, और अलग-अलग राजनीतिक विचारधारा वाली सरकारों को एक मंच पर लाने के लिए धैर्यपूर्वक बातचीत और साझा मकसद की ज़रूरत थी। आम नागरिक के लिए इसका महत्व तुरंत समझ में आता है: एक राज्य में जारी आयुष्मान कार्ड का इस्तेमाल सिद्धांत रूप में दूसरे राज्य के पैनल में शामिल अस्पताल में किया जा सकता है। इससे प्रवासी मजदूरों और यात्रा करने वाले परिवारों को पोर्टेबल सुरक्षा मिलती है, जो लंबे समय से चिकित्सा संबंधी अनिश्चितता के सबसे ज्यादा शिकार रहे हैं।

सफलता के साथ अगला काम

ये ऐतिहासिक स्तर की उपलब्धियां हैं और ये आयुष्मान भारत को देश के कल्याणकारी ढांचे का एक मज़बूत स्तंभ बनाती हैं। फिर भी, इस कार्यक्रम की सफलता ही अब इसके अगले काम को सामने लाती है। इतनी तेज़ी से फैलने वाली किसी भी पहल में स्वाभाविक रूप से ऐसे क्षेत्र सामने आते हैं जिनमें सुधार की ज़रूरत होती है — और यह योजना की संस्थागत परिपक्वता का प्रमाण है कि इनमें से कई मुद्दों को शांति और व्यवस्थित तरीके से हल किया जा रहा है, जबकि नामांकन लगातार बढ़ रहा है।

भारत में लोगों का अपनी जेब से होने वाला स्वास्थ्य खर्च 2014-15 में 62.6 प्रतिशत से घटकर 2021-22 में 39.4 प्रतिशत हो गया। यह कमी उन परिवारों के लिए बड़ी राहत है जिनके लिए कभी अस्पताल में भर्ती होने का मतलब कर्ज में डूबना होता था।

ऐसा ही एक क्षेत्र अस्पतालों में भुगतान में लगने वाला समय है। जैसे-जैसे दावों की संख्या बढ़ी है, कुछ जगहों पर रिइंबर्समेंट का समय भी बढ़ गया है, जिससे कुछ निजी सेवा प्रदाताओं ने अपनी भागीदारी कम कर दी है। इसे समझते हुए, सरकार ने नेशनल हेल्थ क्लेम्स एक्सचेंज (एनएचसीएक्स) शुरू किया है। यह एक डिजिटल गेटवे है जो दावों के निपटान को मानकीकृत और तेज़ करता है, साथ ही लगभग तुरंत कैशलेस मंज़ूरी के लिए नियामक प्रयास भी करता है। जैसे-जैसे ये सिस्टम परिपक्व होंगे और ज़्यादा बीमा कंपनियों और अस्पतालों को जोड़ेंगे, सेवा प्रदाताओं के कैश फ्लो पर पड़ने वाला दबाव कम होने की उम्मीद है, जिससे निजी क्षेत्र, जो इलाज का एक बड़ा हिस्सा संभालता है, मजबूती से इस व्यवस्था का हिस्सा बना रहेगा।

इससे जुड़ा एक और मुद्दा पैकेज दरों का है। पैनल में शामिल अस्पतालों, खासकर छोटे शहरों में, को आर्थिक रूप से जोड़े रखने के लिए एनएचए ने समय-समय पर अपने स्वास्थ्य लाभ पैकेज में संशोधन किया है; 2024 के संस्करण में 1,961 प्रक्रियाओं को शामिल किया गया और उनमें से 350 के लिए दरों में बढ़ोतरी की गई। इस तरह की समीक्षाओं को संस्थागत बनाने से सेवा प्रदाताओं का भरोसा और भागीदारी और बढ़ेगी।

सुरक्षा का विस्तार

तीसरा पहलू वित्तीय सुरक्षा की गहराई से जुड़ा है। प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना में अस्पताल में भर्ती होने का खर्च शामिल है, फिर भी परिवारों के स्वास्थ्य खर्च का एक बड़ा हिस्सा दवाओं और आउटपेशेंट देखभाल (अस्पताल में भर्ती हुए बिना इलाज) पर खर्च होता है। यहाँ, सहायक कार्यक्रम चुपचाप इस कमी को पूरा कर रहे हैं। आयुष्मान आरोग्य मंदिर मुफ़्त जरूरी दवाएँ और जाँच की सुविधाएं देते हैं, जबकि जन औषधि केंद्रों का नेटवर्क, जिनकी संख्या अब 19,500 से ज़्यादा हो गई है और जहां जेनेरिक दवाएं 50 से 80 प्रतिशत सस्ती मिलती हैं, ग्रामीण और शहरी दोनों तरह के परिवारों तक सस्ती दवाएं पहुंचाता है और रोजाना लगभग 10 से 12 लाख लोगों की सेवा करता है।

इन सभी को आयुष्मान भारत योजना के साथ और मज़बूती से जोड़ने से इलाज की पूरी प्रक्रिया में सुरक्षा का दायरा बढ़ जाएगा।

इस कार्यक्रम की पहुंच प्रशिक्षित कर्मचारियों की उपलब्धता पर भी निर्भर करती है। ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञों के कई पद अभी भी खाली हैं। केंद्र सरकार मेडिकल शिक्षा के बड़े पैमाने पर विस्तार के जरिए इस चुनौती का सामना कर रही है, जिसमें 75,000 का लक्ष्य रखा गया है।

स्कीम की विश्वसनीयता बनाए रखना भी एक प्राथमिकता रही है, और इस मामले में बहुत मजबूत प्रतिक्रिया देखने को मिली है। एनएचए ने एक ‘नेशनल एंटी-फ्रॉड यूनिट’ बनाई है जो स्कीम के फंड को सुरक्षित रखने और यह पक्क ा करने के लिए कि हर रुपया असली लाभार्थियों तक पहुंचे, एडवांस्ड एनालिटिक्स, जैसे मशीन लर्निंग, इमेज रिकग्निशन और आधार आधारित बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन, का इस्तेमाल करती है। ऐसे सुरक्षा उपाय, जिन्हें लगातार मजबूत किया जाता है, ही इतने बड़े प्रोग्राम को बढ़ते हुए जनता का भरोसा जीतने में मदद करते हैं।

‘मिसिंग मिडिल’ (छूटे हुए मध्यम वर्ग) तक पहुंचना

आखिर में, कवरेज को और बढ़ाने का मौका है। प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना को आर्थिक रूप से सबसे कमजोर लोगों के लिए बनाया गया था और कमर्शियल इंश्योरेंस ऑर्गनाइज़्ड सेक्टर (संगठित क्षेत्र) की जरूरतों को पूरा करता है; इनके बीच एक बड़ी आबादी है जो खुद का काम करती है और अनऑर्गनाइज़्ड सेक्टर (असंगठित क्षेत्र) में है, जिसे अक्सर ‘मिसिंग मिडिल’ कहा जाता है और जिसे एक किफायती, योगदान-आधारित विकल्प से फ़ायदा हो सकता है। सभी सीनियर सिटिज़न के लिए ‘वय वंदना’ कवर का यूनिवर्सल विस्तार इस दिशा में एक उत्साहजनक संकेत है, और इस वर्ग को कवर करने के लिए नीति आयोग का ब्लूप्रिंट सचमुच यूनिवर्सल सुरक्षा की दिशा में अगले कदम के लिए एक तैयार मॉडल पेश करता है।

कुल मिलाकर, ये किसी संघर्षरत प्रोग्राम की कमियां नहीं हैं, बल्कि एक परिपक्व होते प्रोग्राम के लिए जरूरी सुधार हैं। यह पैटर्न लगातार और भरोसा दिलाने वाला रहा है: जैसे-जैसे कोई चुनौती सामने आई, उसके जवाब में संस्थागत कदम उठाए गए। सिस्टम साफ तौर पर तेज़ी से प्रतिक्रिया देने वाला है; अब काम इन सुधारों को तेज़ करने और उन्हें सही क्रम में लागू करने का है ताकि वादे को पूरी तरह से पूरा किया जा सके।

आगे का रास्ता

जो सलाह निकलकर आती है, वह सीधी और स्पष्ट है। पहला, हॉस्पिटल के क्लेम का समय पर निपटारा एक पक्के वादे के तौर पर किया जाना चाहिए, जिसमें एनएचसीएक्स-इनेबल्ड ऑटोमेशन हो और साफ समय-सीमा तय हो। दूसरा, पैकेज रेट में असल लागत से जुड़े पारदर्शी और समय-समय पर होने वाले बदलाव का सिस्टम होना चाहिए। तीसरा, वित्तीय सुरक्षा को धीरे-धीरे आउटपेशेंट और दवा के खर्चों तक बढ़ाया जाना चाहिए, और साथ ही आरोग्य मंदिर और जन औषधि नेटवर्क का विस्तार किया जाना चाहिए। चौथा, ‘मिसिंग मिडिल’ आबादी के लिए एक समर्पित, कम लागत वाला इंश्योरेंस रास्ता होना चाहिए।

पांचवां, ग्रामीण वर्कफ़ोर्स की तैनाती मेडिकल सीटों के विस्तार के साथ-साथ होनी चाहिए। और इन सबके आधार के तौर पर, नेशनल हेल्थ पॉलिसी के जीडीपी के 2.5 प्रतिशत के लक्ष्य की ओर पब्लिक हेल्थ पर खर्च में लगातार बढ़ोतरी से सुधारों को सफल होने के लिए ज़रूरी वित्तीय गुंजाइश मिलेगी।

इनमें से कोई भी बात अब तक हासिल की गई उपलब्धियों को कम नहीं करती है। आयुष्मान भारत ने भारत के हेल्थ सेफ्टी नेट (स्वास्थ्य सुरक्षा घेरे) को पहले के किसी भी प्रोग्राम से कहीं ज़्यादा बढ़ाया है और ऐसा करके करोड़ों लोगों के लिए बीमारी से जुड़े खर्चों और इलाज के समीकरण को बदल दिया है। अगला चरण मज़बूती लाने का है, यह पक्क ा करना कि इस पहुँच से मज़बूती आए, और हर पात्र व्यक्ति के हाथ में कार्ड होने के साथ-साथ हर नागरिक को अच्छी क्वालिटी का इलाज भी मिल सके। संस्थागत इच्छाशक्ति पहले से ही साफ़ है और सुधार की प्रक्रिया चल रही है, इसलिए यह लक्ष्य हासिल करना मुमकिन है।

आयुष्मान भारत योजना

वादे को और मजबूत करना
आयुष्मान भारत ने बहुत बड़े स्तर पर सफलता हासिल की है। लगभग सभी लोगों का एनरोलमेंट, पूरे देश में अस्पतालों का नेटवर्क, और अपनी जेब से होने वाले इलाज के खर्च में भारी कमी। अगला पड़ाव गहराई से जुड़ा है, और तीन जुड़े हुए सवाल इस प्रोग्राम के दूसरे चरण को तय करेंगे। क्या आर्थिक सुरक्षा को सिर्फ़ अस्पताल में भर्ती होने तक ही सीमित न रखकर दवाओं और आउटपेशेंट केयर (ओपीडी) तक बढ़ाया जा सकता है, जिन पर परिवार अभी भी सबसे ज़्यादा खर्च करते हैं? क्या उस बड़े ‘मिसिंग मिडिल’ (ऐसे परिवार जो प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के लिए बहुत अमीर हैं लेकिन प्राइवेट इंश्योरेंस का खर्च उठाने में मुश्किल महसूस करते हैं) को एक किफायती, योगदान-आधारित कवर के दायरे में लाया जा सकता है? और क्या हेल्थ वर्कफोर्स, खासकर ग्रामीण इलाकों में स्पेशलिस्ट डॉक्टर, इतनी तेजी से बढ़ सकते हैं कि मौजूदा सुविधाओं के लिए पर्याप्त स्टाफ़ मिल सके? अच्छी बात यह है कि इन सभी पर काम हो रहा है, जन औषधि और आरोग्य मंदिरों के जरिए, सीनियर सिटिजन के लिए यूनिवर्सल ‘वय वंदना’ योजना के विस्तार से और मेडिकल सीटों में बड़े पैमाने पर बढ़ोतरी से।

अब इन कोशिशों को तेज करने और आपस में जोड़ने की जरूरत है, साथ ही पब्लिक हेल्थ पर खर्च को जीडीपी के 2.5 प्रतिशत के लक्ष्य तक लगातार बढ़ाना होगा। ये चुनौतियां सफलता की हैं, न कि विफलता की, यह काम है पहुंच के मामले में हासिल की गई एक बड़ी उपलब्धि को हर भारतीय के लिए इलाज की पक्क ी और स्थायी गारंटी में बदलने का।

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