ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।हाल ही में वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन ने दुनिया को एक खामोश खतरे से आगाह किया है। यह खतरा किसी वायरस का नहीं, बल्कि फंगल इन्फेक्शन का है।
डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, दुनिया में हर साल 30 करोड़ से ज्यादा लोगों को फंगल इन्फेक्शन होता है। इसके इलाज के लिए एंटीफंगल दवाएं दी जाती हैं। चिंता की बात यह है कि ये दवाएं धीरे-धीरे अपना असर खो रही हैं।
दरअसल एंटीफंगल दवाओं का इस्तेमाल इंसानों के अलावा पशुओं और खेती में भी किया जाता है। इसकी वजह से कई फंगस इन दवाओं के प्रति रेजिस्टेंट हो रहे हैं। इसी खतरे को देखते हुए डब्ल्यूएचओ ने फंगल इन्फेक्शन और एंटीफंगल रेजिस्टेंस से निपटने के लिए एक ग्लोबल स्ट्रेटजी जारी की है। डब्ल्यूएचओ ने चेतावनी दी है कि अगर एंटीफंगल दवाओं का बेवजह इस्तेमाल नहीं रुका, तो भविष्य में सामान्य फंगल इन्फेक्शन का इलाज मुश्किल हो सकता है। कई मामलों में यह जानलेवा भी हो सकता है।
यह सूक्ष्मजीवों (माइक्रोऑर्गेनिज्म) का एक समूह है। इसमें यीस्ट, फफूंद (मोल्ड) और मशरूम शामिल हैं। फंगस हमारे आसपास लगभग हर जगह पाए जाते हैं। ज्यादातर फंगस नुकसान नहीं पहुंचाते।
फंगल इन्फेक्शन क्या होता है?
फंगस की वजह से होने वाले इन्फेक्शन को ‘फंगल इन्फेक्शन’ कहते हैं। यह स्किन, नाखून, मुंह, फेफड़ों या शरीर के अन्य अंगों को प्रभावित कर सकता है।
किन अंगों में हो सकता है?
यह स्किन, स्कैल्प, नाखून, मुंह और कुछ मामलों में शरीर के इंटरनल ऑर्गन्स में भी हो सकता है। फंगल इन्फेक्शन होने पर एंटीफंगल दवाएं दी जाती हैं लेकिन अगर ये एंटीफंगल दवाएं फंगस पर असर करना बंद कर दें या उनका असर कम हो जाए, तो इसे एंटीफंगल रेजिस्टेंस कहते हैं। इससे इलाज करना कठिन हो जाता है।













