नई दिल्ली।भारतीय रेलवे की तरफ से 27 सितंबर 2026 को देश के रेल इतिहास में एक बड़ा अध्याय जोड़ते हुए देश की पहली एलएनजी ट्रेन का उद्घाटन हो चुका है। पर्यावरण के अनुकूल यह ट्रेन स्वच्छ ईंन्धन से चलेगी जिससे कार्बन उत्सर्जन में भारी कमी आएगी। इस ऐतिहासिक पहल से देश के करोड़ों नागरिक, पर्यावरण प्रेमी और लॉजिस्टिक्स से जुड़े कारोबारियों को सीधे तौर पर फायदा मिलेगा।
यह कदम भारतीय रेलवे के 2030 तक नेट-जीरो कार्बन उत्सर्जक बनने के राष्ट्रीय लक्ष्य को हासिल करने में मील का पत्थर साबित होगा। इसके साथ ही गुजरात के साबरमती में भारी क्षमता वाले डब्ल्यूएजी-12 इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव को भी हरी झंडी दिखाई गई और 700 करोड़ रुपये की लागत से बने नए लोको मेंटेनेंस शेड का उद्घाटन किया गया।
हरित रेलवे की दिशा में ऐतिहासिक कदम
भारतीय रेलवे ने पारंपरिक डीजल पर अपनी भारी निर्भरता को समाप्त करने के लिए एलएनजी तकनीक को सफलतापूर्वक अपना लिया है। रेलवे की तकनीकी टीमों ने इस ट्रेन को आधुनिक सुरक्षा मानकों और खास क्रायोजेनिक फ्यूल सिस्टम के साथ तैयार किया है। यह इनोवेशन दिखाता है कि भारत अब परिवहन क्षेत्र में हरित ऊर्जा के सबसे आधुनिक प्रयोगों को जमीन पर उतारने में सक्षम है। गृह मंत्री अमित शाह ने इस ट्रेन को हरी झंडी दिखाई थी।
पुराने डीजल इंजन से कितनी बेहतर
पहले भारतीय रेल में 6,000 हॉर्सपावर क्षमता वाले पुराने डब्ल्यूएजी -9 या डीजल इंजन इस्तेमाल होते थे। भारी मालगाड़ियों को खींचने के लिए दो-दो इंजनों को एक साथ जोड़ना पड़ता था जिससे ईंन्धन की खपत दोगुनी हो जाती थी और पटरियों पर दबाव बढ़ता था। डब्ल्यूएजी-12 अकेला ही दो इंजनों के बराबर काम करता है।
भारतीय रेलवे ने फिर एक बार नया हरित इतिहास रच दिया है। दुनिया की सबसे लंबी हाइड्रोजन ट्रेन के बाद अब 27 सितंबर को देश की पहली एलएनजी (लिक्विफाइड नेचुरल गैस) ट्रेन का शुभारंभ हो चुका है। साबरमती में 700 करोड़ के शेड से डब्ल्यूएजी-12 लोकोमोटिव को भी हरी झंडी दिखाई गई। इस बार हम पाठकों की जानकारी के लिए प्रदूषण मुक्त और तेज माल ढुलाई के पूरे प्लान की जानकारी लेकर आए हैं…
वहीं पारंपरिक डीजल इंजनों से निकलने वाला विषैला उत्सर्जन पर्यावरण के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ था। देश की पहली एलएनजी ट्रेन ने इस समस्या का स्थायी समाधान पेश किया है। एलएनजी इंजन न केवल शांत चलते हैं, बल्कि पुराने इंजनों के मुकाबले नाइट्रोजन ऑक्साइड के उत्सर्जन में 80 प्रतिशत से ज्यादा की कमी लाते हैं। इस प्रकार भारतीय रेलवे की तरफ से 27 सितंबर 2026 को पहली एलएनजी ट्रेन की तैयारी और साबरमती में 700 करोड़ के शेड से डब्ल्यूएजी-12 को हरी झंडी दिखाना हरित विकास और तेज माल ढुलाई का बड़ा संगम है। पर्यावरण को बचाने और रसद लागत घटाने की दिशा में यह सबसे मजबूत कदम है।
रोबोटिक टेस्टिंग और सेंसर
शेड में आधुनिक ऑटोमेटेड टूल्स लगाए गए हैं, जो इंजन के पार्ट्स और पहियों की जांच कुछ ही मिनटों में पूरी कर लेते हैं।
टर्नअराउंड समय में भारी कमी : इंजनों की मरम्मत और जांच का समय घटकर आधा रह जाएगा जिससे लोकोमोटिव ज्यादा समय तक ट्रैक पर सक्रिय रह सकेंगे।
परिचालन विश्वसनीयता : आधुनिक शेड में नियमित सर्विसिंग मिलने से बीच रास्ते में मालगाड़ी खराब होने या तकनीकी खराबी का खतरा समाप्त हो जाएगा।
वेस्टर्न फ्रेट कॉरिडोर को गति : गुजरात के कांडला और मुंद्रा जैसे प्रमुख बंदरगाहों से उत्तर भारत तक भारी कंटेनरों को ले जाने वाली ट्रेनों को समय पर इंजन उपलब्ध होंगे।
एलएनजी ट्रेन के फीचर्स
स्वच्छ और किफायती ईंन्धन : एलएनजी का इस्तेमाल करने से महंगे आयातित डीजल पर निर्भरता घटेगी जिससे रेलवे का संचालन खर्च 20 से 25 प्रतिशत तक कम हो सकता है।
पर्यावरण को सीधा फायदा : डीजल इंजन की तुलना में एलएनजी से सल्फर डाईऑक्साइड और पार्टिकुलेट मैटर का उत्सर्जन न के बराबर होता है। इससे स्टेशनों और रेल पटरियों के आसपास की हवा शुद्ध रहेगी।
क्रायोजेनिक फ्यूल स्टोरेज : शून्य से 162 डिग्री सेल्सियस नीचे तापमान बनाए रखने वाले विशेष इंसुलेटेड सिलेंडरों में गैस को सुरक्षित रखा जाता है जिससे लंबी दूरी के सफर में भी ईंन्धन की कोई कमी नहीं होती।
स्वचालित सुरक्षा वॉल्व : किसी भी झटके या अप्रत्याशित दबाव की स्थिति में ईंन्धन की सप्लाई को 1 सेकेंड के भीतर काटने वाले ऑटोमैटिक सेफ्टी सेंसर लगाए गए हैं।
इंजन की देखभाल और सर्विसिंग के लिए साबरमती में 700 करोड़ रुपये की लागत से एक विश्वस्तरीय लोको मेंटेनेंस शेड तैयार किया गया है।
क्या है एलएनजी फ्यूल की पावर?
एलएनजी ट्रेनों को चलाने के लिए डुअल-फ्यूल (दोहरे ईंन्धन) इंजन तकनीक का उपयोग किया जाता है। ट्रेन का इंजन केवल एक ईंन्धन पर निर्भर रहने के बजाय डीजल और एलएनजी दोनों के मिश्रण से चलता है।
एलएनजी यानी लिक्विफाइड नेचुरल गैस जो पर्यावरण अनुकूल ईंन्धन है। इस फ्यूल को अब भारतीय रेल भी ट्रेन चलाने के लिए इस्तेमाल कर रही है। भारत में पहली एलएनजी ट्रेन साबरमती से शुरू की गई है। एलएनजी का इस्तेमाल अमेरिका, रूस, चीन, कनाडा और स्पेन जैसे देश कर रहे हैं। अब भारत भी इसमें शामिल हो गया है। फिलहाल गुजरात में साबरमती और मेहसाणा जंक्शन के बीच पहली एलएनजी ट्रेन चलाई जा रही है। एलएनजी ट्रेन में डुअल-फ्यूल तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। जैसे कि कार में सीएनजी और पेट्रोल का इस्तेमाल किया जाता है।
क्या है एलएनजी फ्यूल?
एलएनजी यानी द्रवीकृत प्राकृतिक गैस जो स्वच्छ, सुरक्षित और पर्यावरण-अनुकूल ईंन्धन है। इस बारे में विशेषज्ञ बताते हैं कि प्राकृतिक गैस (मुख्य रूप से मीथेन) को लगभग -162°C (-260°F) के अत्यधिक ठंडे तापमान पर ठंडा किया जाता है, तो यह गैस से तरल (लिक्विड) रूप में बदल जाती है। तरल रूप में बदलने से इसका आयतन (वॉल्यूम) लगभग 600 गुना कम हो जाता है, जिससे इसे ट्रेन के छोटे टैंकों में अधिक मात्रा में स्टोर करना और लंबी दूरी तक ले जाना आसान हो जाता है।
एलएनजी फ्यूल से कैसे चलेगी ट्रेन
इस बारे में रेलवे ने जानकारी दी है कि राष्ट्रीय ट्रांसपोर्टर पहली बार ट्रेन की ड्राइविंग पावर कारों (डीपीसी) में एलएनजी -आधारित ईंन्धन सिस्टम का इस्तेमाल कर रहा है। नई डुअल-फ्यूल टेक्नोलॉजी से एक ही इंजन एलएनजी और डीजल दोनों पर चल सकता है।
एलएनजी के लिए ट्रेन में स्पेशल क्रायोजेनिक टैंक का इस्तेमाल किया जाएगा। यह ट्रेन के ड्राइविंग पावर कार में विशेष रूप से डिजाइन किया गया इंसुलेटेड टैंक है, जो एलएनजी को अत्यंत ठंडे तापमान (-162°C) पर सुरक्षित रखता है। ट्रेन चलने पर रि-गैसीफिकेशन प्रक्रिया शुरू होती है, तब लिक्विड एलएनजी को वापस गैस के रूप में बदला जाता है। यह गैस इंजन में भेजी जाती है, जहां यह डीजल के साथ मिलकर ईंन्धन का काम करती है।
इसमें लगभग 40% से 50% तक डीजल की खपत कम हो जाती है और उसकी जगह स्वच्छ एलएनजी ले लेती है।
एलएनजी से डेमू ट्रेन पकड़ेगी रफ्तार
एलएनजी तकनीक हाई स्पीड डेमू ट्रेन के लिए खास है क्योंकि इससे फ्यूल की लागत में काफी बचत होती है। डीजल की तुलना में एलएनजी काफी सस्ती होती है। इससे रेलवे को हर ट्रेन पर सालाना लाखों रुपये के ईंधन खर्च की बचत होती है। एलएनजी जलने पर बहुत कम धुआं और हानिकारक गैसें (जैसे कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर ऑक्साइड) छोड़ती है। इससे रेल यात्रा अधिक हरित बनती है।
तरल रूप में अधिक ईंधन स्टोर होने के कारण ट्रेन बिना बार-बार रीफिल किए 200 किमी से अधिक की यात्रा आसानी से तय कर सकती है। डुअल-फ्यूल सिस्टम से इंजन पर लोड कम पड़ता है और ट्रेन को सुचारू पिकअप मिलता है जिससे गति और दक्षता दोनों में सुधार होता है।














