ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।भारत में पानी कम नहीं पड़ता। वह बहुत कम दिनों में बरस जाता है। यही दो बातें अलग हैं, और इसी फ़र्क़ में पूरा हल छिपा है।
पूरे मानसून की करीब 29 फ़ीसदी बारिश अकेले अगस्त में होती है, और खरीफ़ की करीब 20 फ़ीसदी बुवाई भी इसी महीने। इन दो आँकड़ों को एक साथ पढ़िए तो भारतीय खेती का पूरा जोखिम दिख जाता है। देश में साल भर की बारिश की कमी नहीं है; कमी इस बात की है कि वह इतनी छोटी खिड़की में गिरती है कि उसके अंदर पंद्रह दिन का सूखा भी साल में बाद में पूरा नहीं किया जा सकता। यानी यह मौसम की समस्या नहीं, पानी सहेजने और बाँटने की समस्या है — और यही फ़र्क़ तय करता है कि इसमें किया क्या जा सकता है।
इसी सीज़न ने यह बात दोनों तरफ़ से दिखा दी। मौसम विभाग ने जुलाई में सामान्य से कम बारिश का अनुमान लगाया था — लंबी अवधि के औसत के 94 फ़ीसदी से नीचे — और जुलाई में बारिश 103 फ़ीसदी हुई। इस एक महीने ने खरीफ़ बुवाई का अंतर जून के आख़िर के करीब 23 फ़ीसदी से घटाकर जुलाई के आख़िर तक करीब 3 फ़ीसदी कर दिया, हालाँकि रकबा तब भी करीब 38.8 लाख हेक्टेयर पीछे था। 1 अगस्त तक मौसमी कमी 11.5 फ़ीसदी रह गई थी। सीधी बात यह है — जिस सीज़न को एक अच्छा महीना बचा सकता है, उसी को एक ख़राब महीना ले भी डूब सकता है।
बारिश नहीं, बफ़र: जो चीज़ें नीति के हाथ में हैं वे हैं — पानी सहेजना, ज़मीन में उतारना और खेत तक पहुँचाना। बारिश की मात्रा नहीं।
जिस सीज़न को एक अच्छा महीना बचा सकता है, उसे एक ख़राब महीना ले भी डूब सकता है। हल ज़्यादा बारिश नहीं, उसे रखने की जगह है।
एक नज़र में
• अगस्त का हिस्सा: मानसून की करीब 29 फ़ीसदी बारिश
• बुवाई में हिस्सा: करीब 20 फ़ीसदी
• अगस्त का सामान्य औसत: 254.9 मिमी
• अगस्त का अनुमान: सामान्य से कम, औसत के 94 फ़ीसदी से नीचे
• अगस्त-सितंबर: दोनों मिलाकर भी कम रहने का अनुमान
• जुलाई की असल बारिश: औसत की 103 फ़ीसदी
• 1 अगस्त तक मौसमी कमी: 11.5 फ़ीसदी
• बुवाई का अंतर: जुलाई के आख़िर तक करीब 38.8 लाख हेक्टेयर
• घटा हुआ अंतर: जून के आख़िर के 23 से करीब 3 फ़ीसदी पर
• नीति के हाथ में: भंडारण, भूजल रिचार्ज और वितरण
बड़ी बात यह है कि हल का हर हिस्सा देश में कहीं न कहीं पहले से चल रहा है — इतना छोटा कि वह काम करता साबित हो चुका है, और इतना बड़ा कि उसे फैलाना फ़ायदे का सौदा है। जल-ग्रहण क्षेत्र का उपचार और चेक डैम पानी को वहीं रोक लेते हैं जहाँ वह गिरा है, और बाढ़ के उस उछाल को भूजल में बदल देते हैं। टपक और फुहार सिंचाई उसी पानी को ज़्यादा हेक्टेयर तक ले जाती है, और जिन राज्यों ने इसे सबसे ज़्यादा फैलाया है वहाँ अच्छी बारिश पर निर्भरता मापने लायक़ घटी है। और कंटिंजेंसी बीज योजना — कम दिनों में तैयार होने वाली दालें और मोटा अनाज, जो देर से भी बोए जा सकते हैं — हर राज्य के कृषि विभाग के पास पहले से है।
दिक़्क़त यह है कि यह योजना राज्य के हिसाब से चालू होती है, जबकि बारिश की मार हमेशा ज़िले के हिसाब से पड़ती है। और सबसे सस्ता सुधार आँकड़े का है। बारिश का आँकड़ा भारत में ब्लॉक स्तर तक इकट्ठा होता है, बुवाई का ज़िला स्तर तक — दोनों छपते हैं, पर अलग-अलग चक्र और अलग-अलग पैमाने पर, इसलिए एक को दूसरे के सामने रखकर पढ़ना मुश्किल हो जाता है। हर हफ़्ते एक ज़िलेवार बुलेटिन, जिसमें उसी ज़िले की बुवाई और उसी ज़िले की बारिश साथ छपे, किसान, बीज विक्रेता और ज़िलाधिकारी — तीनों को एक ही पन्ने से फ़ैसला लेने देगा। इससे मानसून का मिज़ाज नहीं बदलेगा; वह भूगोल की बात है और और अनिश्चित होता जा रहा है। बदलेगा यह कि साल का नतीजा उसके मिज़ाज पर कितना छोड़ा जाए — और समीकरण का सिर्फ़ यही हिस्सा हमारे हाथ में है।













