ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।जुलाई में भारत ने अब तक का सबसे ज़्यादा माल बाहर भेजा। इसमें आपके लिए बात एक ही है — कौन सा सामान बढ़ा, और उसे बनाने में हाथ लगते हैं या नहीं।
जुलाई में भारत का माल निर्यात 44.24 अरब डॉलर रहा — किसी भी जुलाई का सबसे बड़ा आँकड़ा, और पिछले साल के 36.98 अरब डॉलर से 19.63 फ़ीसदी ज़्यादा। सेवाओं को जोड़ लें तो कुल निर्यात 80.14 अरब डॉलर पहुँचा। अप्रैल से जुलाई तक कुल निर्यात 316.42 अरब डॉलर रहा, पिछले साल की इसी अवधि के 279.63 अरब डॉलर से 13.16 फ़ीसदी ऊपर।
अब वह बात जो सुर्ख़ी में नहीं आती। कुल आँकड़ा बढ़ना अच्छी ख़बर है, पर नौकरी की ख़बर उसके अंदर छिपी है। सबसे तेज़ दो चीज़ें बढ़ीं — पेट्रोलियम उत्पाद 67.64 फ़ीसदी बढ़कर 6.92 अरब डॉलर, और इलेक्ट्रॉनिक सामान 57.4 फ़ीसदी बढ़कर 5.92 अरब डॉलर। दोनों बराबर नहीं हैं। पेट्रोलियम में हम कच्चा तेल बाहर से लाकर रिफ़ाइन करके बेचते हैं — इसमें पैसा बनता है, पर काम गिनती के लोगों का होता है, और तेल का भाव गिरा तो यह कमाई भी गिर जाती है। इलेक्ट्रॉनिक्स में मशीन देश में लगी है और असेंबली में हाथ लगते हैं। तेल का भाव गिरने से वह मशीन कहीं नहीं जाती।
निर्यात का असली हिसाब: कपड़ा, रत्न-आभूषण, समुद्री उत्पाद और इंजीनियरिंग — ये वे लाइनें हैं जिनमें एक ऑर्डर सीधे एक शिफ़्ट के बराबर होता है।
तेल का भाव गिरे तो रिफ़ाइनरी की कमाई गिरती है। असेंबली लाइन वहीं रहती है, और काम भी।
एक नज़र में
• माल निर्यात, जुलाई: 44.24 अरब डॉलर, 19.63 फ़ीसदी बढ़त
• पिछले साल जुलाई: 36.98 अरब डॉलर
• कुल निर्यात (माल + सेवा): 80.14 अरब डॉलर
• अप्रैल–जुलाई कुल: 316.42 अरब डॉलर, 13.16 फ़ीसदी ऊपर
• पेट्रोलियम उत्पाद: 6.92 अरब डॉलर, 67.64 फ़ीसदी बढ़त
• इलेक्ट्रॉनिक सामान: 5.92 अरब डॉलर, 57.4 फ़ीसदी बढ़त
• अन्य बढ़त: इंजीनियरिंग सामान, रसायन, कपड़ा और हैंडलूम
• अमेरिका में शुल्क: 18 फ़ीसदी · वियतनाम-बांग्लादेश करीब 20
• ब्रिटेन: 15 जुलाई से करीब 99 फ़ीसदी लाइनों पर शून्य शुल्क
• देखने वाली बात: हाथ लगाने वाले क्षेत्रों में ऑर्डर बढ़े या नहीं
हिंदी पट्टी और छोटे शहरों के लिए दो बदलाव सीधे मायने रखते हैं। पहला, अमेरिका में भारतीय सामान पर असरदार शुल्क अब 18 फ़ीसदी है, जबकि वियतनाम और बांग्लादेश करीब 20 फ़ीसदी और चीन 30 से 35 फ़ीसदी चुका रहे हैं। कपड़े जैसे कारोबार में, जहाँ मुनाफ़ा एक-दो फ़ीसदी का होता है, दो अंक का यह फ़र्क़ ही तय करता है कि ऑर्डर तिरुपुर आएगा या ढाका जाएगा। दूसरा, 15 जुलाई से ब्रिटेन ने भारत की करीब 99 फ़ीसदी निर्यात लाइनों पर शुल्क शून्य कर दिया है — और इसमें मसाले, समुद्री उत्पाद, ऑटो पुर्जे और हर्बल उत्पाद जैसे वे क्षेत्र हैं जिनमें छोटी इकाइयाँ काम करती हैं।
आगे का रास्ता उस जगह है जहाँ कोई विदेशी समझौता मदद नहीं कर सकता। एक निर्यातक शुल्क में जीत जाए और बंदरगाह पर चार दिन गँवा दे तो जीत बराबर हो जाती है। बिजली की दर, माल ढुलाई का समय, जीएसटी क्रेडिट आने में लगने वाले दिन, और एक कारख़ाने पर साल में होने वाले निरीक्षणों की गिनती — ये चार चीज़ें पूरी तरह देश के अंदर की हैं, और यही असली मुक़ाबला हैं। और आपके लिए देखने वाला आँकड़ा कुल निर्यात नहीं है। देखिए यह कि कपड़ा, रत्न-आभूषण, समुद्री उत्पाद और इंजीनियरिंग — यानी हाथ लगाने वाले क्षेत्र — कितनी तेज़ी से बढ़ रहे हैं। इन चारों में एक ऑर्डर का मतलब एक शिफ़्ट होता है, और शिफ़्ट का मतलब दिहाड़ी।













