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पीएम-किसान अब 2031 तक चलेगी, ₹3.15 लाख करोड़ मंज़ूर। पर असली बात यह है कि यह पैसा कब और किसके खाते में पहुंचेगा

by ब्लिट्ज़ इंडिया
August 4, 2026
in कृषि
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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।केंद्रीय कैबिनेट ने पीएम-किसान सम्मान निधि को पांच साल और चलाने की मंज़ूरी दे दी है। योजना अब 2026-27 से 2030-31 तक चलेगी और इस पर ₹3.15 लाख करोड़ खर्च होंगे। हर पात्र किसान परिवार को साल में ₹6,000 मिलते रहेंगे — तीन बराबर किस्तों में, सीधे बैंक खाते में। सीधी बात यह है कि जो किसान अभी योजना में हैं, उन्हें अगले पांच साल तक पैसा आने की चिंता नहीं करनी पड़ेगी।

अब इस बड़े आंकड़े को थोड़ा तोड़कर देखिए, क्योंकि वहीं से इसका असली मतलब निकलता है। ₹3.15 लाख करोड़ पांच साल के लिए हैं — यानी हर साल करीब ₹63,000 करोड़। यह कोई एकमुश्त घोषणा नहीं है, बल्कि पांच साल का पक्का बजट है, और यही इस फ़ैसले की सबसे भरोसे वाली बात है। किसान के लिए इसका मतलब यह है कि हर चार महीने पर आने वाली किस्त अब किसी सालाना बजट के भरोसे नहीं रहेगी। छोटे और सीमांत किसान के लिए ₹2,000 की किस्त बीज, खाद या डीज़ल के एक चक्र का खर्च निकाल देती है — और ठीक बुवाई के मौसम में आने पर यह उधार लेने से बचा लेती है।

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किस्त का समय ही असली फ़ायदा है: ₹2,000 की किस्त अगर बुवाई के वक़्त आ जाए तो वह उधार से बचा लेती है — यही इस योजना की सबसे बड़ी ताक़त रही है।

₹6,000 सालाना कोई बड़ी रकम नहीं लगती। लेकिन सही महीने में आया ₹2,000 अक्सर साहूकार के पास जाने से रोक देता है।

एक नज़र में

• क्या हुआ: पीएम-किसान योजना 2026-27 से 2030-31 तक बढ़ाई गई
• कुल खर्च: ₹3.15 लाख करोड़ — यानी हर साल लगभग ₹63,000 करोड़
• किसे मिलेगा: पात्र भूमिधारक किसान परिवार
• कितना: साल में ₹6,000, तीन बराबर किस्तों में
• कैसे: प्रत्यक्ष लाभ अंतरण से सीधे बैंक खाते में
• ध्यान रखें: पैसा तभी आता है जब ई-केवाईसी पूरी हो, खाता आधार से जुड़ा हो और ज़मीन का रिकॉर्ड नाम से मेल खाता हो
• साथ में: कैबिनेट ने खेलो इंडिया समेत खेल पर भी ₹36,441 करोड़ मंज़ूर किए हैं

अब वह हिस्सा, जिस पर सबसे कम बात होती है और जिस पर सबसे ज़्यादा किस्तें अटकती हैं। पीएम-किसान का पैसा अपने-आप नहीं आता — तीन चीज़ें दुरुस्त होनी चाहिए। पहली, ई-केवाईसी पूरी हो। दूसरी, बैंक खाता आधार से जुड़ा हो और उसमें डीबीटी चालू हो। तीसरी, ज़मीन का रिकॉर्ड उसी नाम से हो जिस नाम से आवेदन है। हर किस्त के समय जो नाम सूची से बाहर हो जाते हैं, उनमें बड़ी संख्या ऐसे किसानों की होती है जिनका ब्योरा कहीं एक जगह मेल नहीं खाता — बंटवारे के बाद नाम न बदलवाना इसकी सबसे आम वजह है। योजना पांच साल बढ़ने का पूरा फ़ायदा उसी को मिलेगा जो ये तीन चीज़ें अभी ठीक करा ले, अगली किस्त का इंतज़ार करके नहीं।

सबसे अच्छा तरीका यह है कि गांव के कॉमन सर्विस सेंटर या कृषि विभाग के दफ़्तर में जाकर एक बार अपना नाम, खाता और ज़मीन का ब्योरा मिलवा लें। यह काम एक बार का है और अगले पांच साल की किस्तें इसी पर टिकी हैं। बड़ी बात यह है कि इस बार सरकार ने आगे का रास्ता साफ़ कर दिया है — अब ज़िम्मेदारी का बड़ा हिस्सा ज़मीन पर काग़ज़ दुरुस्त करने का है, और यह काम पंचायत स्तर पर सबसे तेज़ी से हो सकता है।

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