भारत में बिजली से चलने वाली गाड़ियों ने वह लकीर पार कर ली जो पहले कभी नहीं छू पाई थी। जून में देश में इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की बिक्री पहली बार तीन लाख के पार गई — डीलरों की संस्था फाडा (FADA) के मुताबिक रिकॉर्ड 3,06,220 गाड़ियां। इससे कुल बिकने वाली गाड़ियों में इलेक्ट्रिक का हिस्सा 12% से ऊपर पहुंच गया। यह इस बात का सबसे साफ सबूत है कि इलेक्ट्रिक अब चंद शौकीनों तक सीमित नहीं, आम सड़क तक पहुंच चुका है।
खास बात सिर्फ आंकड़ा नहीं, उसका फैलाव है। इलेक्ट्रिक दोपहिया — इस बदलाव की रीढ़ — पिछले साल से करीब 75% बढ़कर 1,93,735 यूनिट पर पहुंचे; इलेक्ट्रिक कारें दोगुनी से ज़्यादा होकर रिकॉर्ड 31,823 पर आईं, जिनमें अकेले टाटा मोटर्स ने 12,187 गाड़ियां बेचीं और करीब 38% हिस्सेदारी रखी; और इलेक्ट्रिक कमर्शियल वाहन सबसे तेज़ी से बढ़े, 160% से ज़्यादा। तिपहिया तो पहले से ही सबसे ज़्यादा बिजली से चलने वाला वर्ग है, जहां अब करीब दो-तिहाई बिक्री इलेक्ट्रिक है। कुल बाज़ार भी मज़बूत रहा — कुल बिक्री 21.8% बढ़कर 25.6 लाख गाड़ियां, जो जून का अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है।
जब कोई तकनीक दिखावा नहीं, आदत बन जाती है, तो यह सबसे पहले रोज़ की सवारी वाले दोपहिया में दिखता है। भारत अभी वही लकीर पार कर रहा है।
इन आंकड़ों के पीछे एक परिपक्व होता ढांचा है — सस्ती गाड़ियों के बढ़ते विकल्प, शहरों और हाईवे पर फैलता चार्जिंग नेटवर्क, और महंगे पेट्रोल के दौर में कम खर्च में चलने वाली सवारी। कमियां भी साफ हैं — बड़े शहरों से बाहर चार्जिंग की कमी, पुरानी इलेक्ट्रिक गाड़ियों की कीमत और फाइनेंस, और बैटरी की सप्लाई चेन जो भारत अभी बना रहा है। इनमें से कोई भी रफ्तार रोकने की वजह नहीं; ये अगली सुलझाने लायक चुनौतियां हैं।
सीधी बात यह है कि रिकॉर्ड महीना छत नहीं, फर्श है। आगे का रास्ता इस रफ्तार को टिकाऊ बनाने में है — छोटे शहरों में घनी चार्जिंग, देश में ही बैटरी और सेल बनाना ताकि आयात पर निर्भरता घटे, और ऐसी स्थिर नीति जिससे खरीदार और कंपनियां सालों की योजना बना सकें, महीनों की नहीं। सही से संभाला जाए, तो हर महीने तीन लाख का आंकड़ा एक साफ, शांत और देश में ही बनी मोबिलिटी इंडस्ट्री की बुनियाद बन जाएगा — और तेल के आयात बिल में बड़ी कमी भी।













