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ब्रिटेन से रास्ता खुला, अब नज़र अमेरिका पर: टैरिफ की घड़ी और आखिरी एक फीसदी

by ब्लिट्ज़ इंडिया
July 17, 2026
in the blitz, व्यापार
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पश्चिम एशिया संकट ने चुपचाप बदल दिया भारत के व्यापार का नक्शा

ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।भारत के व्यापार का सबसे अहम पखवाड़ा चल रहा है। कल यानी 15 जुलाई से भारत–ब्रिटेन व्यापार समझौता (CETA) लागू हुआ, और पहले ही दिन करीब 14 करोड़ डॉलर (140 मिलियन डॉलर) से ज़्यादा का सामान बिना किसी टैक्स के ब्रिटेन भेजा गया — वह भी करीब 50 खेपों में, देश की 20 से ज़्यादा जगहों से। अब सबकी निगाहें अमेरिका पर टिकी हैं, जहां अफसरों के मुताबिक समझौता बस “आखिरी एक फीसदी” पर अटका है, और अंतरिम टैरिफ राहत 22 जुलाई के आसपास खत्म होने वाली है।

मामला एकदम साफ है। बड़ी बातें तय हो चुकी हैं, अब सिर्फ टैक्स की दरों का ढांचा बाकी है। दो गुत्थियां सुलझनी हैं — भारत चाहता है कि उसके सामान पर टैक्स वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे देशों से ज़्यादा न हो, वहीं अमेरिका चाहता है कि कपड़ा, समुद्री माल और सस्ते सामान की सप्लाई चेन में मज़दूरी के नियमों की पक्की गारंटी मिले। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पिछले महीने G7 की मुलाकात में अफसरों को समझौता जल्दी पूरा करने को कह चुके हैं।

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ब्रिटेन ने दिखा दिया कि लागू समझौता पहले ही दिन कैसा दिखता है। असली काम अब यह है कि दूसरा और तीसरा समझौता भी घड़ी की सुई से पहले ज़मीन पर उतर आए।

एक नज़र में

  • ब्रिटेन CETA: 15 जुलाई से लागू; पहले दिन 14 करोड़ डॉलर+ का बिना टैक्स निर्यात, ~50 खेप
  • कपड़ा: ब्रिटेन में 12% ड्यूटी एक झटके में खत्म
  • अमेरिका: ढांचा तय; “आखिरी 1%” बाकी; अंतरिम राहत 22 जुलाई के आसपास खत्म
  • अटका कहां: भारत का टैक्स दूसरे देशों से ज़्यादा न हो; अमेरिका को मज़दूरी नियमों की गारंटी चाहिए

ब्रिटेन इस बात का जीता-जागता सबूत है कि लागू समझौते का फायदा कैसा होता है। पहले ही दिन भारतीय कपड़े पर लगने वाला 12% ब्रिटिश टैक्स हट गया, और अमृतसर से लेकर अहमदाबाद तक से पहली खेपें रवाना हुईं — जिनमें कपड़ा, इलेक्ट्रॉनिक्स, दवाइयां और जेम्स-ज्वेलरी सब शामिल थे। साथ में एक और राहत यह कि ब्रिटेन में कुछ समय के लिए काम करने गए भारतीय पेशेवरों को अब पांच साल तक दोनों देशों में सोशल सिक्योरिटी का पैसा नहीं कटवाना पड़ेगा। यूरोपियन यूनियन के साथ समझौता भी दस्तखत के करीब है।

सीधी बात यह है कि बाज़ार मिल जाना सिर्फ न्योता है; असली कमाई तो ऑर्डर से आती है। अमेरिका के साथ समझौता हो गया तो भारत को अपने सबसे बड़े बाज़ार में बढ़त मिलेगी और ब्रिटेन (लागू), यूरोप (करीब) और अमेरिका (बाकी) — तीनों का दुर्लभ मेल बन जाएगा। आगे का रास्ता उसी छोटे-छोटे इंतज़ाम से होकर जाता है — सामान कहां का बना, इसका सर्टिफिकेट झट से मिले, नियम-कायदे एक-दूसरे को मंज़ूर हों, और छोटे-मंझोले कारोबारियों तक भी कर्ज़ और मदद पहुंचे।

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